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"मीट खाने वाले खुद को एनिमल लवर कैसे कहते हैं?" सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने क्यों दी ऐसी दलील

supreme court stray dogs case: दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) में आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सुनवाई के दौरान एक दिलचस्प बयान सामने आया। केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्होंने ऐसे कई लोगों को देखा है जो सोशल मीडिया पर मांस खाते हुए वीडियो पोस्ट करते हैं और फिर खुद को 'एनिमल लवर' यानी पशु प्रेमी बताते हैं।

मेहता ने यह टिप्पणी आवारा कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 11 अगस्त को जारी आदेश के समर्थन में की। इस आदेश में अदालत ने आठ हफ्तों के भीतर दिल्ली-एनसीआर की सभी सड़कों से कुत्तों को उठाकर शेल्टर में रखने और उन्हें दोबारा सड़कों पर न छोड़ने के निर्देश दिए थे।

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अदालत ने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर कोई व्यक्ति या संगठन इस प्रक्रिया में बाधा डालेगा, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

Tushar Mehta Remark: 37 लाख डॉग बाइट केस, 305 मौतें

तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि एक साल में देशभर में 37 लाख डॉग बाइट यानी कुत्तों के काटने के मामले दर्ज हुए हैं, यानी हर दिन करीब 10 हजार लोग इसका शिकार होते हैं। उन्होंने कहा कि WHO के आंकड़ों के मुताबिक, रैबीज से होने वाली मौतें दर्ज आंकड़ों से भी ज्यादा हो सकती हैं। सरकारी डेटा के अनुसार, एक साल में 305 लोगों की जान रैबीज के कारण गई है।

"कोई पशु विरोधी नहीं है, लेकिन समाधान चाहिए"

मेहता ने अदालत से कहा, "यह मेरा निजी मत है, सरकार का आधिकारिक रुख नहीं। लेकिन सच्चाई यह है कि लोग अपने बच्चों को पार्क या खुले मैदान में खेलने तक नहीं भेज पा रहे हैं। समाधान सिर्फ नियम बनाने से नहीं आएगा। यहां एक बहुत शोर मचाने वाला छोटा वर्ग है और एक खामोश बहुसंख्यक वर्ग है, जो इस समस्या से पीड़ित है।"

बेंच में बदलाव और आदेश पर रोक की मांग

इस मामले में पहले चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) भूषण आर. गवई ने 11 अगस्त को दिए गए आदेश को लेकर स्वतः संज्ञान लिया था, लेकिन बुधवार को उन्होंने यह केस जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच से वापस ले लिया। इसके बाद नई बेंच जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता में मामले की सुनवाई हुई और अंतरिम आदेश पर रोक लगाने की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट की पिछली बेंच ने अपने 11 अगस्त के आदेश में कहा था कि किसी भी हाल में शिशु और छोटे बच्चे आवारा कुत्तों का शिकार न बनें। अदालत ने कहा था, "हम यह निर्देश बड़े जनहित को ध्यान में रखते हुए जारी कर रहे हैं।"

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