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Delhi Pollution: राजधानी में सांसों पर संकट, सरकारी इंतजाम नाकाम, प्रदूषण से निपटने के लिए रणनीति कब बनेगी?

Delhi Pollution: देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर गंभीर वायु प्रदूषण की चपेट में है। कुछ ही घंटों के भीतर एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) का "वेरी पुअर" से "सीवियर" श्रेणी में पहुंच जाना इस बात का संकेत है कि हालात अचानक नहीं बिगड़े, बल्कि यह गिरावट काफी हद तक पहले से अनुमानित थी।

इसके बावजूद प्रशासनिक प्रतिक्रिया हमेशा की तरह संकट गहराने के बाद ही सामने आई, जिससे एक बार फिर यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या राजधानी के प्रदूषण से निपटने के लिए कोई ठोस रणनीति है भी या नहीं।

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GRAP-IV लागू, कड़े प्रतिबंधों का दौर

हालात बिगड़ने के बाद शनिवार को दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) का सबसे सख्त चरण-स्टेज IV-लागू कर दिया गया। इसके तहत निर्माण गतिविधियों पर पूर्ण रोक, भारी वाहनों की आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध और स्कूलों की कक्षाओं को ऑनलाइन मोड में स्थानांतरित करने जैसे फैसले लिए गए।
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने यह भी कहा है कि दिल्ली से सटे प्रभावित जिलों में 50 प्रतिशत कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम की अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ये कदम "डैमेज कंट्रोल" से आगे नहीं बढ़ते और स्थायी समाधान की जगह अस्थायी राहत भर देते हैं।

AQI में गिरावट चौंकाने वाली

जिस तेजी से AQI कुछ घंटों में खतरनाक स्तर तक पहुंचा, उसने यह साफ कर दिया कि हालात पूरी तरह अनपेक्षित नहीं थे। मौसम विज्ञान और प्रदूषण डेटा पहले ही यह संकेत दे रहे थे कि हवा की रफ्तार कम रहेगी, तापमान गिरेगा और प्रदूषक वातावरण में फंसे रहेंगे।

इसके बावजूद निवारक कदम समय रहते लागू नहीं किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बेहतर पूर्वानुमान (प्रिडिक्टिव) सिस्टम और रियल-टाइम डेटा के आधार पर पहले से कार्रवाई की जाती, तो स्थिति इतनी गंभीर होने से रोकी जा सकती थी।

WHO मानकों से कोसों दूर दिल्ली की हवा

स्विस एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग कंपनी 'आईक्यूएयर' की रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली लगातार दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में शामिल रहती है। भारत के छह शहर दुनिया के दस सबसे प्रदूषित शहरों में गिने जाते हैं और दिल्ली अब भी इस सूची में शीर्ष पर बनी हुई है। सर्दियों में हालात और बिगड़ जाते हैं, जब पराली जलाने से निकला धुआं, वाहनों और उद्योगों के उत्सर्जन के साथ मिलकर जहरीला कॉकटेल बना देता है। इस दौरान पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कणों का स्तर कई बार विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सुरक्षित सीमा से 50-60 गुना तक अधिक दर्ज किया गया है।

स्वास्थ्य पर भारी असर

वायु प्रदूषण केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। 'द लांसेट प्लैनेटरी हेल्थ' की रिपोर्ट के मुताबिक 2009 से 2019 के बीच भारत में करीब 38 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं। यूनिसेफ ने भी चेतावनी दी है कि प्रदूषित हवा बच्चों के लिए बेहद खतरनाक है। बच्चों की कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली और नाजुक फेफड़े उन्हें अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और अन्य गंभीर श्वसन रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं।

क्या है सरकारी समाधान?

सरकार हर साल निर्माण पर रोक, डीजल जनरेटर पर प्रतिबंध, ऑड-ईवन और यहां तक कि क्लाउड सीडिंग जैसे उपाय करती हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये उपाय संकट टालने की कोशिश तो करते हैं, उसका समाधान नहीं। विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि दीर्घकालिक रणनीति के तहत वाहनों और उद्योगों के उत्सर्जन में वास्तविक कटौती, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना और कृषि अपशिष्ट प्रबंधन के स्थायी विकल्प अपनाना ही एकमात्र रास्ता है।

सवाल बरकरार

लांसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत में ऐसा कोई शहर नहीं है जहां सालाना औसत वायु गुणवत्ता WHO के मानकों पर खरी उतरती हो। ऐसे में दिल्ली की स्थिति केवल एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतावनी है। सवाल यह है कि क्या राजधानी हर साल "आपातकालीन उपायों" के भरोसे ही सांस लेती रहेगी, या फिर प्रदूषण से निपटने के लिए एक दूरदर्शी, वैज्ञानिक और स्थायी नीति कभी जमीन पर उतरेगी? फिलहाल, दिल्ली की जहरीली हवा इस सवाल का जवाब खुद मांग रही है।

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