Delhi Metro: सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन का नाम बदलने पर 45 लाख का खर्च! DMRC ने HC में क्यों जताई आपत्ति?
Delhi HC Supreme Court Metro Station Renaming: क्या दिल्ली मेट्रो के स्टेशनों के नाम केवल अंग्रेजी में होने चाहिए या उनका हिंदी भाषा में भी लिखना जरूरी है? इस सवाल को लेकर चल रहा विवाद अब एक कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है।
इस मामले शुक्रवार, 20 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट में 'सुप्रीम कोर्ट' मेट्रो स्टेशन के हिंदी नाम को बदलकर 'सर्वोच्च न्यायालय' करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई हुई।

कोर्ट ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें खर्चे और भविष्य की मुकदमों की बाढ़ का हवाला दिया गया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि 'राजभाषा अधिनियम' (Official Languages Act) का सम्मान करना सर्वोपरि है।
Supreme Court Metro Station PIL: याचिकाकर्ता की दलील में क्या कहा है?
यह याचिका दिल्ली निवासी उमेश शर्मा की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था के नाम का हिंदी अनुवाद मेट्रो स्टेशन पर भी दिखना चाहिए।
याचिका में कहा गया है कि भारत की शीर्ष न्यायिक संस्था के लिए हिंदी में आधिकारिक शब्द 'सर्वोच्च न्यायालय' है। मेट्रो स्टेशन के साइन बोर्ड पर हिंदी में भी 'सुप्रीम कोर्ट' लिखना भाषा के हिसाब से गलत है और यह उस गरिमा के अनुरूप नहीं है जो हिंदी शब्दावली को मिलनी चाहिए।
Delhi High Court का सवाल: जब अन्य स्टेशनों के हिंदी नाम हैं, तो यहां क्यों नहीं?
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की डिवीजन बेंच ने DMRC से कड़े सवाल पूछे। कोर्ट ने पूछा कि जब दिल्ली मेट्रो के कई स्टेशनों के नाम पहले से ही हिंदी में हैं, तो फिर सुप्रीम कोर्ट स्टेशन के हिंदी नाम को 'सर्वोच्च न्यायालय' क्यों नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने DMRC से सीधे सवाल पूछते हुए कहा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी मेट्रो स्टेशन को हिंदी में 'विश्वविद्यालय' कहा जाता है और सेंट्रल सेक्रेटेरिएट स्टेशन का हिंदी नाम 'केंद्रीय सचिवालय' है। ऐसे में देश की सर्वोच्च अदालत से जुड़े स्टेशन के नाम में शुद्ध हिंदी का इस्तेमाल न करना समझ से परे है।
DMRC का तर्क: खर्च बढ़ेगा, खुल सकता है मुकदमों का रास्ता
सुनवाई के दौरान दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन DMRC ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि स्टेशन के नाम में बदलाव करने से सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा। DMRC के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि नाम बदलने की प्रक्रिया में साइनेज, मैप, डिजिटल सिस्टम और अन्य तकनीकी बदलावों पर करीब 40 से 45 लाख रुपये का खर्च आएगा।
DMRC ने यह भी दलील दी कि यदि इस याचिका को स्वीकार किया गया तो इससे इसी तरह की अन्य मांगों की बाढ़ आ सकती है और कई यात्री या संगठन अन्य स्टेशनों के नाम बदलने को लेकर अदालत का रुख कर सकते हैं, जिससे "मल्टीपल लिटिगेशन" की स्थिति पैदा हो सकती है।
दिल्ली मेट्रो की ओर से पेश वकीलों ने नाम बदलने के विरोध में दो प्रमुख दलीलें दीं:
DMRC ने दावा किया कि स्टेशन के नाम में बदलाव करने, मैप अपडेट करने और अनाउंसमेंट सिस्टम बदलने में जनता के खजाने से लगभग ₹40-45 लाख खर्च होंगे। दूसरी ओर अधिकारियों ने चिंता जताई कि अगर इस मांग को मान लिया गया, तो अन्य स्टेशनों के लिए भी इसी तरह की मांगों और मुकदमों की झड़ी लग जाएगी।
कोर्ट की फटकार: पैसे का बहाना नहीं चलेगा, अगली सुनवाई 24 अप्रैल को
हाईकोर्ट ने DMRC के खर्च वाले तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केवल संभावित खर्च या भविष्य में मुकदमों की आशंका के आधार पर किसी वैधानिक दायित्व से पीछे नहीं हटा जा सकता। बेंच ने टिप्पणी की, हमें कानून का सम्मान करना होगा।
आधिकारिक भाषा अधिनियम (Official Languages Act) के अनुपालन से इनकार करने के लिए ये कोई वैध बचाव नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का पालन करना अनिवार्य है, भले ही उससे प्रशासनिक या कानूनी चुनौतियां क्यों न आएं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने DMRC को इस मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई की तारीख 24 अप्रैल तय कर दी। अब सभी की नजरें DMRC के जवाब और कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं।
क्यों अहम है यह मामला?
यह मामला केवल एक मेट्रो स्टेशन के नाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंदी भाषा के सम्मान, आधिकारिक भाषा कानून के पालन और सार्वजनिक संस्थानों में भाषाई पहचान से भी जुड़ा है। यदि कोर्ट याचिका के पक्ष में फैसला देता है, तो इसका असर भविष्य में अन्य सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक स्थलों के नामों पर भी पड़ सकता है।
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