Ram Navami 2022: छत्तीसगढ़ है भगवान राम की कर्मभूमि, हर कदम पर होते हैं प्रभु राम के दर्शन

Ram Navami 2022: Chhattisgarh is the Karmabhoomi of Lord Ram, there is a vision of Lord Ram at every step

रायपुर, 09 अप्रैल। पौराणिक मान्यता के मुताबिक 14 वर्ष के वनवास के दौरान प्रभु राम ने लगभग 10 वर्ष का समय छत्तीसगढ़ में गुजारा था। वनवास काल में उन्होंने छत्तीसगढ़ में प्रवेश कोरिया के सीतामढ़ी हरचौका से किया था। उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ते हुए वह छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों से गुजरे। सुकमा का रामाराम उनका अंतिम पड़ाव था। भगवान राम ने वनवास काल के दौरान लगभग 2260 किलोमीटर की यात्रा की थी। छत्तीसगढ़ से जुड़ी भगवान राम के वनवास काल की स्मृतियों को सहेजने और संस्कृति और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अगुवाई में छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से राम वन गमन पथ पर्यटन परिपथ परियोजना आरंभ की गई है। चंदखुरी के बाद अब शिवरीनारायण में भी विकास कार्य पूरा हो जाने से राज्य में पर्यटन तीर्थों की नयी श्रृंखला आकार ले रही है।

 भांजे के रूप में की जाती है छत्तीसगढ़ में राम की पूजा

भांजे के रूप में की जाती है छत्तीसगढ़ में राम की पूजा

छत्तीसगढ़ सरकार की राम वन गमन पथ परियोजना के तहत 75 स्थानों को चिन्हांकन किया गया है। योजना के अंतर्गत प्रथम चरण में चयनित 9 पर्यटन तीर्थों का तेजी से कायाकल्प कराया जा रहा है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परम्परा में प्रभु श्री राम रचे-बसे है। जय सिया राम के उदघोष के साथ यहां दिन की शुरूआत होती है। इसकी मुख्य वजह है कि छत्तीसगढ़ वासियों के लिए श्रीराम केवल आस्था ही नहीं है बल्कि वह जीवन की एक अवस्था और आदर्श व्यवस्था भी हैं । छत्तीसगढ़ में राम की पूजा भांजे के रूप में की जाती है। रायपुर से मात्र 27 कि.मी. की दूरी पर स्थित चंदखुरी, आरंग को माता कौशल्या की जन्मभूमि और श्रीराम का ननिहाल माना गया है। दक्षिण कोसल छत्तीसगढ़ का एक प्राचीन नाम है।

पहाड़ों से लेकर जंगलों, गुफाओं में गायी जाती हैं श्रीराम की गाथा

पहाड़ों से लेकर जंगलों, गुफाओं में गायी जाती हैं श्रीराम की गाथा

अयोध्या भगवान राम की जन्मभूमि है, लेकिन छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि है। माना जाता है कि वनवास काल के दौरान अयोध्या से प्रयागराज, चित्रकूट सतना गमन करते हुए भगवान राम ने दक्षिण कोसल यानी छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के भरतपुर पहुंचकर मवई नदी को पार कर दण्डकारण्य में प्रवेश किया था । मवई नदी के तट पर स्थापित था प्राकृतिक गुफा मंदिर, सीतामढ़ी-हरचौका में पहुंचकर उन्होनें विश्राम किया। इस तरह प्रभु रामचंद्र के वनवास काल का छत्तीसगढ़ में पहला पड़ाव भरतपुर के पास सीतामढ़ी-हरचौका को माना जाता है। छत्तीसगढ़ की पावनधरा में रामायण काल की कई घटनाएं घटित हुई हैं, जिसका प्रमाण प्रदेश की लोक संस्कृति, लोक कला, दंतकथायें हैं।

कोरिया जिले का सीतामढ़ी प्रभु श्रीराम के वनवास काल के पहले पड़ाव के नाम से भी प्रसिद्ध है। पौराणिक और ऐतिहासिक ग्रंथों में रामगिरि पर्वत का जिक्र आता है। सरगुजा जिले का यही रामगिरि-रामगढ़ पर्वत है। यहां स्थित सीताबेंगरा-जोगीमारा गुफा की रंगशाला को दुनिया की सबसे प्राचीन रंगशाला माना जाता है। मान्यता है कि वन गमन काल में रामचंद्र जी के साथ सीता जी ने यहां कुछ समय बिताया किया था, इसीलिए इस गुफा का नाम सीताबेंगरा पड़ा।

 शिवरीनारायण में खाये थे प्रभु राम ने शबरी के जूठे बेर

शिवरीनारायण में खाये थे प्रभु राम ने शबरी के जूठे बेर

छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा जिले में प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर शिवनाथ, जोंक और महानदी का त्रिवेणी संगम स्थान शिवरीनारायण है। शिवरीनारायण धार्मिक, ऐतिहासिक और पौराणिक नगरी के रूप में प्रसिद्ध है। इस विष्णुकांक्षी तीर्थ का संबंध शबरी और नारायण से होने के कारण इसे शबरी नारायण या शिवरीनारायण कहा जाता है। यहां नर-नारायण और माता शबरी का मंदिर है जिसके पास एक ऐसा वट वृक्ष है, जिसके पत्ते दोने के आकार के हैं।

इस स्थान की महत्ता इस बात से पता चलती है कि देश के चार प्रमुख धाम बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथपुरी और रामेश्वरम के बाद इसे पांचवे धाम की संज्ञा दी गई है। यह स्थान भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान है इसलिए छत्तीसगढ़ के जगन्नाथपुरी के रूप में प्रसिद्ध है। यहां प्रभु राम का नारायणी रूप गुप्त रूप से विराजमान है इसलिए यह गुप्त तीर्थधाम या गुप्त प्रयागराज के नाम से भी जाना जाता है।

प्रसिद्ध है बस्तर की रथ यात्रा

प्रसिद्ध है बस्तर की रथ यात्रा


शिवरीनारायण शैव, वैष्णव धर्म का मुख्य केन्द्र रहा है। यह स्थान भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान होने की वजह से यहां रथयात्रा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की विग्रह मूर्तियों को यहीं से जगन्नाथपुरी भेजा गया था। इसलिए बस्तर में पुरी की तर्ज पर रथ यात्रा का आयोजन होता है। इसमें छत्तीसगढ़ के अलावा बाकि राज्यों के साधु संत और श्रद्धालु शामिल होते हैं।

छत्तीसगढ़ है प्राचीन दक्षिणापथ-

छत्तीसगढ़ है प्राचीन दक्षिणापथ-

रिसर्च के अनुसार त्रेतायुगीन छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल और दण्डकारण्य के रूप में विख्यात था। दण्डकारण्य में प्रभु राम के वनगमन यात्रा की पुष्टि वाल्मीकि रामायण से होती है। तमाम शोध पत्रों से प्राप्त जानकारी मुताबिक प्रभु श्रीराम के द्वारा उत्तर भारत से छत्तीसगढ़ में प्रवेश करने के बाद छत्तीसगढ़ में कई स्थानों का भ्रमण करने के बाद दक्षिण भारत में प्रवेश किया गया था। इसलिए छत्तीसगढ़ को दक्षिणापथ भी कहा जाता है।

राम वन गमन पर्यटन परिपथ के अंतर्गत छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से प्रथम चरण में सीतामढ़ी-हरचौका (जिला कोरिया), रामगढ़ (जिला सरगुजा), शिवरीनारायण (जिला जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया (जिला बलौदाबाजार-भाटापारा), चंदखुरी (जिला रायपुर), राजिम (जिला गरियाबंद), सप्तऋषि आश्रम सिहावा (जिला धमतरी), जगदलपुर (बस्तर) और रामाराम (जिला सुकमा) का विकास किया जा रहा है।

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