Budget 2023: क्या होता है वित्तीय घाटा और कैसे सरकार करती है कमाई?
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आज आम बजट पेश करने जा रही हैं। ऐसे में आइए समझते हैं कि वित्तीय घाटा क्या होता है और कैसे सरकार लोगों से कमाई करती है।

Budget 2023 Fiscal Deficit: भारत में लोगों की कुल आय की बात करें तो वित्त वर्ष 2023 में यह तकरीबन 22.04 लाख करोड़ रुपए है, जबकि कुल खर्च की बात करें तो यह 39.4 लाख करोड़ है। ऐसे में आय और खर्च के बीच का जो अंतर होता है उसे ही वित्तीय घाटा या फिर Fiscal Deficit कहते हैं। लिहाजा इस आंकड़े के अनुसार भारत का वित्तीय घाटा वित्त वर्ष 2023 का 6.40 फीसदी यानि तकरीबन 17 लाख करोड़ रुपए का है। अगर पिछले 10 साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो यही थोड़ा ऊपर-नीचे होता रहता है। वित्तीय घाटा लगभग 15 लाख करोड़ रुपए के आस-पास ही रहता है।

कर्ज को कम करने की रणनीति
ऐसे में सरकार के सामने वित्तीय घाटे को कम करने का एकमात्र विकल्प आय को बढ़ाना ही है। वर्ष 2004 से 2012 की बात करें तो भारत में कर्ज का बोझ काफी बढ़ गया था। पर्सनल टैक्स, कॉर्पोरेट टैक्स और जीएसटी ही सरकार की कमाई का मुख्य स्रोत हैं। पर्सनल टैक्स की बात करें सरकार पर हमेशा ही यह दबाव रहता है कि वह इस कर में वृद्धि ना करें. पिछले 2-3 सालों की बात करें तो सरकार ने इसमे कोई बढ़ोत्तरी नहीं की है। ऐसे में सरकार ने टैक्स की चोरी को कम करने पर ध्यान दिया और आधार-यूपीआई जैसे विकल्पों को लेकर आई।

डिजिटाइटेशन ने बदला समीकरण
लोगों पर आधार को पैन से लिंक करने का दबाव डाला, ऑनलाइन पेमेंट पर जोर दिया गया। जिससे कि टैक्स की चोरी को रोका जा सके। सरकार के इस कदम से एक बड़ी सफलता यह मिली की अब लोगों के खर्च पर आसानी से नजर रखी जा सकती है। इस कदम से सरकार के कर संकलन में बढ़ोत्तरी हुई है और जीएसटी कलेक्शन में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। छोटे बेस के चलते जीएसटी कलेक्शन रिकॉर्ड 10.06 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचने का अनुमान है।

सरकार ने कैसे आय को बढ़ाया, बढ़ाई कमाई
ऊर्जा, रियल स्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर पर कर्च काफी बढ़ रहा था। उस समय तकरीबन 15 लाख करोड़ रुपए का कर्ज सरकार पर बढ़ गया था। लेकिन पिछले 10-12 सालों में 10 से 12 लाख करोड़ रुपए का कर्ज कम किया गया है। ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि अगर जीडीपी और कर का अनुपात 3 फीसदी रहता है तो 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल करना तकरीबन नामुमकिन है। ऐसे में सरकार ने अपनी कमाई को बढ़ाने के विकल्प को तलाशना शुरू किया। इसी कड़ी में सरकार वर्ष 2016 में रेरा को लेकर आई, उसके बाद नोटबंदी, जीएसटी, कॉर्पोरेट दरों में कमी की गई, पीएलआई योजना को लाया गया, लेबर कोड को लाया गया, इंश्योरेंस और डिफेंस में एफडीआई को बढ़ाया गया, खनन सुधार किए गए, टेक्नोलॉजी टैक्स बढ़ाए गए। यूपीआई समेत तमाम ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से टैक्स वसूले जा रहे हैं, ये तमाम चीजें इसलिए की गई ताकि कर को बढ़ाया जाए।

डिजिटाइजेशन से बढ़ा टैक्स कलेक्शन
इन तमाम नीतियों के चलते सरकार को इसका काफी बड़ा लाभ मिला और जीडीपी-कर का अनुपात 3 फीसदी से बढ़कर 4.5 फीसदी तक पहुंच गया। जानि अब 4.5 फीसदी आबादी कर का भुगतान करने लगी है। जिसने सरकार की कमाई को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। यही वजह है कि सरकार की कमाई में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। सरकार की कमाई की बात करें तो 95 फीसदी पैसा सरकार को कर से मिलता है। बाकी का 5 फीसदी अन्य स्रोत से आता है।

मेक इन इंडिया का हो रहा फायदा
कॉर्पोरेट टैक्स की बात करें तो इसमे कमी करने के बाद भी इसका कलेक्शन बढ़ा है। सरकार लगातार लोगों से भारत में निवेश करने के लिए निमंत्रण दे रही है। विदेशी निवेशकों को न्योता दिया जा रहा है। एप्पल, सैंसमंग समेत तमाम बड़ी कंपनियों को भारत में निवेश करने का सरकार न्योता दे रही है। सरकार के सामने बड़ी चुनौती यह रहती है कि खर्च कभी भी कम नहीं होते हैं, सरकार पर कभी सब्सिडी का बोझ बढ़ जाता है तो कभी टैक्स को कम करने का दबाव होता है तो कभी निर्माण क्षेत्र में खर्च बढ़ जाता है।

12 लाख करोड़ रुपए का कर्ज हुआ कम
ऐसे में सरकार के सामने वित्तीय घाटे को कम करने का एकमात्र विकल्प आय को बढ़ाना ही है। वर्ष 2004 से 2012 की बात करें तो भारत में कर्ज का बोझ काफी बढ़ गया था। ऊर्जा, रियल स्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर पर कर्च काफी बढ़ रहा था। उस समय तकरीबन 15 लाख करोड़ रुपए का कर्ज सरकार पर भढ़ गया था। लेकिन पिछले 10-12 सालों में 10 से 12 लाख करोड़ रुपए का कर्ज कम किया गया है।












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