अब डोडो पक्षी को फिर से जिंदा करने की कोशिश होगी

ऐसा तो नहीं है कि साढ़े तीन सौ साल पहले विलुप्त हो चुका डोडो पक्षी बहुत जल्द वापस आ जाएगा या हजारों साल पहले धरती पर चलने वाले वे विशालकाय जीव नजर आने लगेंगे लेकिन इन जीवों को वापस लाने में लोगों की दिलचस्पी जरूरी खासी बढ़ती दिख रही है.
जीन तकनीक पर काम करने वाली कंपनी कोलोसल बायोसाइंसेज ने कहा है कि वह डोडो पक्षी को फिर से जिंदा करने की योजना पर काम कर रही है. मंगलवार को कंपनी के सीईओ और संस्थापक बेन लैम ने इसका ऐलान किया. उन्होंने कहा, "डोडो पक्षी इस बात का प्रतीक है कि इंसान ने जीवों को खत्म कर दिया है."
साथ ही कंपनी ने यह भी कहा कि उसे 15 करोड़ डॉलर का निवेश मिला है. 2021 में स्थापित इस कंपनी ने अब तक 22.5 करोड़ डॉलर जुटा लिए हैं. इसमें धन लगाने वालों में यूएस इनोवेटिव टेक्नोलजी फंड से लेकर अमेरिकी जासूसी एजेंसी सीआईए की ओर से पैसा लगाने वाली कंपनी इन-क्यू-टेल तक कई बड़े नाम शामिल हैं.
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लैम ने कहा कि ऐसा नहीं है कि डोडो को वापस लाने से कोई कमाई होगी लेकिन इस प्रक्रिया में जो तकनीकें विकसित होंगी उनके बहुत सारे इस्तेमाल हो सकते हैं. जैसे कि चिकित्सा जगत में जीन तकनीक की खासी संभावनाएं देखी जा रही हैं. लैम ने बताया कि उनकी कंपनी ऐसी तकनीक विकसित करने की कोशिश कर रही है जिसके जरिए जीनोम के अलग-अलग हिस्सों को एक साथ बदला जा सके. इसके अलावा वे एक 'कृत्रिम गर्भाश्य' बनाने पर भी काम कर रहे हैं.
कैसा था डोडो?
डोडो पक्षी 17वीं सदी तक भी दुनिया में मौजूद था. टर्की के आकार का यह पक्षी उड़ नहीं सकता था. रिकॉर्ड दिखाते हैं कि 1681 में आखिरी डोडो पक्षी का शिकार मॉरिशस में किया गया था.
कोलोसल की वैज्ञानिक सलाहकार टीम में शामिल एक मॉलीक्यूलर बायोलॉजिस्ट बेथ शापिरो कहती हैं कि डोडो का सबसे नजदीकी रिश्तेदार निकोबारी कबूतर है. शापिरो करीब दो दशकों से डोडो पर अध्ययन कर रही हैं. उनकी टीम की योजना है कि निकोबारी कबूतर और डोडो के जीन का अध्ययन कर उनकी तुलना की जाए ताकि समझा जा सके कि डोडो किन जेनेटिक गुणों के कारण ऐसा था.
उसके बाद टीम निकोबारी कबूतर की जीन्स में बदलाव करके उन्हें डोडो जैसा बनाने की कोशिश करेगी. ऐसा संभव है कि बदलाव के बाद इन जीन्स को कबूतरों और मुर्गों जैसे पक्षियों के अंडों में डाला जाए. शापिरो कहती हैं कि इस तरह जो पक्षी पैदा होंगे, उनमें कुदरती तौर पर डोडो के अंडे देने की संभावना हो सकती है. हालांकि यह पूरी प्रक्रिया और इसकी अवधारणा सैद्धांतिक है.
गंभीर असहमतियां
प्राणी जैसे होते हैं वे जीन्स और वातावरण दोनों की वजह से होते हैं. शापिरो कहती हैं कि 17वीं सदी के बाद से वातावरण में नाटकीय बदलाव हो चुके हैं इसलिए "जो विलुप्त हो चुका है, सौ फीसदी वैसा ही" जीव पैदा करना संभव नहीं होगा.
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वैसे, बहुत से वैज्ञानिक इस पूरे विचार से ही असहमत हैं कि विलुप्त जीवों को दोबारा धरती पर लाने की कोशिश की जाए. वे कहते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में जो ऊर्जा और धन लग रहा है वह धरती पर अब भी मौजूद जीवों की कीमत पर खर्च किया जा रहा है.
ड्यूक यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले ईकोलॉजिस्ट स्टुअर्ट पिम कहते हैं, "ऐसा कहना खतरनाक है कि जिसे हम नष्ट कर सकते हैं उसे वापस धरती पर पैदा भी कर सकते हैं. और वूली मैमथ को आप धरती पर कहां रखेंगे? एक पिंजरे में ही न?" पिम कहते हैं कि जिस ईकोसिस्टम में मैमथ होते थे, वह भी बहुत समय पहले खत्म हो चुका है.
कनाडा के हेलफैक्स की डलहौजी यूनिवर्सिटी में बायोलॉजिस्ट बोरिस वर्म कहते हैं, "विलुप्त होने के खतरे में पड़े जीवों को बचाना प्राथमिकता होनी चाहिए. अधिकतर मामलों में इसमें कहीं कम पैसा खर्च होगा."
वीके/एए (एपी)
Source: DW
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