जानिए! क्यों वन भैंसो के प्रति उदासीनता पड़ रही है छत्तीसगढ़ के 4 IFS को महंगी

बिलासपुर , 17 मार्च। छत्तीसगढ़ के 4 वन अधिकारियों को वन्य जीवों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों भागना महंगा पड़ सकता है कि क्योंकि देश के अपने किस्म के पहले मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति आर.सी.एस. सामंत की पीठ ने केंद्र से, याचिकाकर्ता रायपुर के ब्यास मुनि दिवेदी की याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ता की तरफ से बताया गया कि छत्तीसगढ़ वन विभाग, असम के मानस नेशनल पार्क से से एक नर और एक मादा यानि दो वन भैंसों को पकड़ कर लाया है, जिसके लिए पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय भारत सरकार ने अनुमति दी थी कि वन भैसों को समुचित प्राकृतिक वास में छोड़ा जायेगा। परंतु वन अधिकारियों ने दोनों वन भैसों को छत्तीसगढ़ के बारनवापारा अभ्यारण के बाड़े में बंधक बना रखा है, जो कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के प्रावधानों के तहत अपराध है, जिसके लिए कम से कम 3 साल जो कि 7 साल हो सकती है।

क्या है मामला ?

क्या है मामला ?

गौरतलब है कि वन भैसा, बाघ के समान ही अनुसूची-एक का वन्य प्राणी है, इनको तब तक बंधक नहीं बनाया जा सकता जब तक कि यह सुनिश्चित नहीं हो जाये कि उन को पुनर्वासित नहीं किया जा सकता, जैसे की बाघ के मामले में ऐसी चोट लगने से जो ठीक न हो सके, जिस से वह शिकार न कर सके। वन भैसों के मामले में तो केंद्र से अनुमती ही इस शर्त के साथ मिली थी कि उन्हें उचित रहवास वाले वन में छोड़ा जायेगा, फिर भी उन्हें बंधक बना रखा गया है।

ब्यास मुनि ने बताया कि क्योंकि वन भैंसे असम से छत्तीसगढ़ लाने में 4 आई.एफ.एस. जिम्मेदार है अतः उनके विरुद्ध अभियोजन की अनुमति पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ही दे सकता है। इसलिए अभियोजन के लिए उन्होंने सितंबर 2021 में अनुमति देने की मांग मंत्रालय से की थी, बाद में कई रिमाइंडर भी भेजे गए, परंतु मंत्रालय द्वारा कोई कार्यवाही नहीं किए जाने पर कोर्ट से अभियोजन की अनुमति के आवेदन पर निर्णय लेने हेतु आदेशित करने की मांग की गई, जिस पर कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा है।

छत्तीसगढ़ वन विभाग वर्तमान में पदस्थ प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) पीवी नरसिम्ह राव आई.एफ.एस. और तत्कालीन अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) वर्तमान में सदस्य सचिव बायो-डाइवर्सिटी बोर्ड अरुण कुमार पांडे, आई.एफ.एस. के कार्यकाल के दौरान अप्रैल 2021 में असम से छत्तीसगढ़ में वन भैसा लाये गए थे , जिन्हें बारनवापारा अभ्यारण में बाड़े में कैद कर रखा है, इनके विरुद्ध अभियोजन की अनुमति मांगी गई है।

पहले पदस्थ रिटायर्ड आई.एफ.एस. प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) कौशलेंद्र कुमार सिंह ने योजना बनाई थी कि असम से पांच "मादा" वन भैंसों को पकड़ कर छत्तीसगढ़ लाया जाएगा और यहां पर बंधक बनाकर उनसे प्रजनन कराया जाएगा ,इस प्रकिया से जो वन भैसे पैदा होंगे,उनको जंगल में छोड़ा दिया जाएगा। वन अधिकारी असम के वन भैसों का उदंती सीतानदी अभ्यारण में रखे गए इन वन भैसों से मेल कराकर उससे नई जीन पूल तैयार करना चाहते थे। याचिकाकर्ता ने इनके विरुद्ध अभियोजन की अनुमति मांगी है।

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने किया विरोध

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने किया विरोध

ज्ञात हो कि देश के प्रतिष्ठित संस्थान वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया असम से वन भैंसों छत्तीसगढ़ लाने के खिलाफ रहा है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के मुताबिक छत्तीसगढ़ के वन भैंसों का जीन पूल पूरे विश्व में सबसे यूनिक है, इसलिए दो जीन पूल यानि छत्तीसगढ़ और असम के वन भैसों का जीन पूल को नहीं मिलाना चाहिए।

वन भैसों को आजीवन रहना होगा कैद

वन भैसों को आजीवन रहना होगा कैद

मिली जानकारी के मुताबिक अधिकारियों ने बाद में यह निर्णय लिया कि असम से 5 मादा वन भैसों को लाने के साथ एक नर वन भैसा भी लाया जानें चाहिए, इसके लिए पूर्व में पदस्थ प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) वर्तमान पदस्थापना प्रधान मुख्य वन संरक्षक, स्टेट फॉरेस्ट रिसर्च ट्रेंनिंग इंस्टीट्यूट रायपुर अतुल कुमार शुक्ला की तरफ से 1 वन ऐसा लाने की अनुमति मांगी गई थी। याचिकाकर्ता ने इनके खिलाफ भी अभियोजन की अनुमति मांगी है।

याचिकाकर्ता ने बताया कि वन विभाग के दस्तावेज पूरी तरह यह स्पष्ट करते है कि असम के मानस नेशनल पार्क से लाए गए 2 वन भैसों को आजीवन बाड़े में कैद कर प्रजनन कराने की योजना है। वन विभाग 4 मादा वन भैसों को असम से और लाने वाला है और इन सभी वन भैसों को और इन से पैदा हुए वन भैसों को आजीवन कैद में रहना होगा, इन्हें वन में छोड़ने का कोई भी प्लान वन विभाग के पास नहीं है।

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