Valentine Special: पत्नी की मौत के बाद बुज़ुर्ग ने लिखी इश्क की नई इबारत, रोमियो-जूलियट की संज्ञा दे रहे लोग
Valentine Day को लेकर कई रोचक खबरें पढ़ने को मिल रही हैं। बिहार के एक बुजुर्ग की प्रेम कहानी पढ़ने के बाद आप भी कहेंगे कि यह तो आज के युग के रोमियो-जूलिएट, हीर-रांझा जैसी कहानी है।

Valentine Special: युवाओं में वैलेंटाइन डे मनाने के बहुत ही क्रेज़ है, प्रेम प्रसंग की कई रोचक खबरें पढ़ने को मिल रही है। आज हम आपको एक ऐसी अमर प्रेम कहानी बताने जा रहे हैं, जिसमें एक बुज़ुर्ग ने अपनी पत्नी की मौत के बाद हर रोज उसकी अस्थी पर गुलाब का फूल चढ़ाते और अगरबत्ती दिखाते। बुज़ुर्ग की ख्वाहिश थी कि जब उनका निधन हो तो उनकी पत्नी की अस्थि कलश सीने पर रख कर अंतिम संस्कार किया जाए, ताकि उनका प्रेम अमर रहे। बुज़ुर्ग साहित्यकार भोलानाथ आलोक की जैसी ख्वाहिश थी, उस तरह की उनका अंतिम संस्कार किया गया।

बुज़ुर्ग ने लिखी इश्क की नई इबारत
लैला-मजनू, हीर-रांझा, रोमियो-जूलियट जैसी ही प्रेम कहानी स्व.भोलानाथ आलोक की थी। आपको यह सब बिल्कुल फिल्मी लग रहा होगा लेकिन नहीं, हक़ीकत में ऐसा ही हुआ है। अब आप सोच रहे होंगे की पत्नी के मरने के बाद भोलानाथ ने अस्थि कलश पर फूल चढ़ाए और अगरबत्ती जलाए, लेकिन जब उनकी मौत हुई तो उनकी ख्वाहिश किसने पूरी की।25 मई 1990 को 90 वर्षीय साहित्यकार भोलानाथ आलोक की पत्नी पद्मा रानी का निधन हुआ था। पत्नी के निधन के बाद 32 सालों तक उन्होंने पत्नी से प्रेम की निशानी के तौर पर अस्थि कलश संभाल कर रखी। पूर्णिया के सिपाही टोला में उन्होंने अपने मकान में लगे आम के पेड़ में अस्थि कलश को लटकाकर रखा था। रोज़ाना गुलाब चढ़ाने के बाद अगरबत्ती दिखाकर प्रणाम करते थे।

दामाद अशोक सिंह ने पूरी की आखरी ख्वाहिश
24 जून 2022 को भोलानाथ के निधन के बाद उनकी आखरी ख्वाहिश उनके दामाद अशोक सिंह ने पूरी की। बुजुर्ग भोलानाथ आलोक ने अपनी ज़िंदगी में ही डायरी में अपनी ख्वाहिश लिखी थी कि उनके निधन पर पत्नी का अस्थि कलश उनके शव की छाती पर रखकर दाह संस्कार किया जाए। अशोक सिंह (भोलानाथ आलोक के दामाद) ने कहा कि मेरे ससुर के प्रेम समर्पण से हम लोगों को सीख मिलती है। पत्नी की मौत के बाद भी वह उनकी अस्थि कलश की पूजा करते रहे। ससुर जी की मौत के बाद उनकी इच्छा के मुताबिक दाह संस्कार किया गया।
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ससुर की परंपरा को दामाद ने कायम रखा
अशोक ने कहा कि दुनिया की नज़र में बाबू जी की मौत के साथ उनकी प्रेम कहानी खत्म हो गई। लेकिन हम लोगों के लिए प्रेम का एक नया चेप्टर शुरू हो गया। ससुर जी की मौत के बाद उनकी और सासु मां की अस्थियों को मिलाकर कर उसी आम के पेड़ पर बांध दिया है, जहां बाबू जी ने मां की अस्थि कलश को रखा था। बाबू जी के जाने के बाद अब हम लोगों ने उनकी परंपरा को कायम रखा है। घर के सभी लोग अस्थि कलश के पास मत्था टेक कर ही घर से जाते हैं और आने के बाद भी मत्था टेकते हैं। अशोक ने कहा कि अस्थियों की पोटली देखने पर ऐसा महसूस होता है कि वह हम लोगों के साथ ही है। ऐसा लगता है कि पाक मोहब्बत की कहानी फिर से लिखी जा रही है। वही लोग इस प्रेम कहानी को रोमियो-जूलियट की संज्ञा दे रहे है।
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