बिहार: थर्ड डिविजन मैट्रिक पास युवक ने बनाया एप्प, IIT प्रोफेशनल को दे रहा रोज़गार
दिलखुश खुद तो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन उनकी टीम में आईआईटी, आईआईएम और ट्रिपल आईटी की डिग्री वाले इंजीनियर और मैनेजर काम कर रहे हैं।
पटना, 24 अगस्त 2022। बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है, यहां की धरती से लाल पूरे विश्व में अपना परचम लहरा रहे हैं। अब बिहार के सहरसा ज़िले का युवक सुर्खियों में हैं क्योंकि वह कभी रिक्शा चलाया करता था लेकिन अब उसने एक रोडवेज़ एप्प बनाया है जिसके ज़रिए कैब बुकिंग कर लोग किराये में 60 फीसद तक रुपयों की बचत कर पा रहे हैं। एप्प बनाने वाले दिलखुश का दावा है कि उसके एप्प से कैब संचालकों की आय में भी क़रीब 15 हज़ार रुपये का इज़ाफ़ा हो सकता है। कैब सेवा देने वाली रोडबेज एप्प को ग्रामीण इलाकों में लोग काफी पसंद कर रहे हैं।

दिलखुश की टीम में पढ़े लिखे लोग शामिल
दिलखुश खुद तो ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन उनकी टीम में आईआईटी, आईआईएम और ट्रिपल आईटी की डिग्री वाले इंजीनियर और मैनेजर काम कर रहे हैं। उनकी 16 लोगों की टीम है इसमें से चार सदस्यों ने हिंदुस्तान के उच्च शिक्षण संस्थानों तालीम हासिल की है। जोश टॉक में युवाओं को स्टार्ट अप के लिए मोटिवेट करने के लिए हाल ही में दिलखुश को बुलाया गया था। दिलखुश ने अपने स्टार्ट अप का ज़िक्र करते हुए बताया कि पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दामों को देखते हुए उन्हें कैब सर्विस प्रोवाइड करने का आईडिया आया।

कैब के किराए में 60 फिसद तक की बचत
दिलखुश ने जब मार्केट रिसर्च किया तो उन्होंने पाया की ज़्यादातर लोगों को कैब से सफ़र करने पर दोनों तरफ़ का किराया देना होता है, जबकी सफर एकतरफा होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए दिलखुश ने एकतरफा कैब की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए नेटवर्क तैयार कर एप्प डेवलप किया। इस एप्प से बुकिंग करने पर लोगों को एक तरफ़ का ही किराया देना होता है। इस तरह सफर पर जाने वाले लोगों को कैब के किराये में क़रीब 60 फीसद तक की बचत हो जाती है। इस एप्प के ज़रिए लंबी दूरी पर सफर करने वाले लोगों को पांच घंटे पहले पहले बुकिंग करनी होती है ताकि कैब ड्राइवर को जाने और आने दोनों तरफ़ की सवारी मिल सके।

थर्ड डिवीजन से किया मैट्रिक पास
दिलखुश कुमार की निजी ज़िंदगी की बात की जाए तो वह पैसे की अभाव में ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए। उनकी शुरुआती ज़िंदगी बहुत ही तंगी में गुज़री। आर्थिक तंगी इतनी ज्यादा थी कि सुविधा के अभाव में वह सही तालीम भी हासिल नहीं कर पाए। थर्ड क्लास से मैट्रिक पास किया और बारहवीं में सेकेंड डिवीजन से पास हुए। आर्थिक तंगी का ये आलम था कि एक कपड़े पहने हुए पूरा सप्ताह गुज़ार देते थे।

कम उम्र में हुई थी दिलखुश की शादी
दिलखुश कुमार के पिता ड्राइवर थे, वह इतना ही कमा पाते थे कि बच्चे को दो वक्त की रोटी खिला सकें। वहीं दिलखुश कुमार की कम उम्र में शादी हो जाने की वजह से परिवारिक बोझ और ज्यादा बढ़ गया था। आर्थिक स्थिति को देखते हुए दिलखुश ने पढ़ाई छोड़ कर नौकरी की तलाश शुरू कर दी थी। नौकरी की तलाश में वह जॉब फेयर गए जहां पर स्कूल में चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन भरा जा रहा था, उन्होंने आवेदन भर दिया। इत्तेफ़ाक से उन्हें पटना से इंटरव्यू के लिए बुलाया गया।

दिलखुश नहीं दे पाए थे इंटरव्यू में जवाब
दिलखुश कुमार किसी तरह से बिना प्रेस के पुराने कपड़े पहने हुए इंटरव्यू देने पहुंच गए। इंटरव्यूअर ने उनकी वेश भूषा देख कर रिजेक्ट करने का मन बना लिया था। उन्हें देखकर साक्षात्कारकर्ता के ज़ेहन में तरह-तरह के सवाल आने लगे कि क्या वह काम कर पाएगा , ठीक कैंडिडेट है या नहीं। वहीं साक्षात्कारकर्ता ने उसकी परीक्षा के लिए आईफोन दिखाते हुए कंपनी का नाम पूछ लिया। दिलखुश कुमार ने पहली बार आईफोन देखा था तो वह जवाब नहीं दे पाए। इस बात से ही उन्हें अंदाज़ा हो गया कि उनका चयन नहीं होगा।

सरकारी नौकरी पाने की कोशिश में थे दिलखुश
पटना से घर लौटने के बाद दिलखुश कुमार काफ़ी उदास हो गए कि आगे क्या करेंगे, कैसे करेंगे ? फिर उन्होंने गाड़ी ड्राइव करने का फ़ैसला लिया। इस बाबत उन्होंने अपने पित जी कहा कि उन्हें ड्राइव करने सिखा दें लेकिन उनके पिता नहीं चाहते थे कि दिलखुश ड्राइवर बने, इसलिए वह ड्राइविंग सिखाने से कतराने लगे। लेकिन दिलखुश ने पिता जी को सरकारी नौकरी में ड्राइवर की सीटें आने का हवाला दे कर ड्राइविंग सीख ली। कहीं किस्मत की बाज़ी पलटी और उन्हें सरकारी ड्राइवर की ही नौकरी मिल जाए, लेकिन नौकरी नहीं मिली।

दिल्ली में दिलखुश ने रिक्शा चलाया
ड्राइविंग सीखने के बाद दिलखुश कुमार ने कुछ दिनों तक तीन हज़ार रुपये प्रति महीना ड्राइवर की नौकरी की। बाद में उन्होंने गांव में गाड़ी चलाना छोड़ कर दिल्ली का रुख कर लिया तकि दिल्ली में ज़्यादा पैसे मिलेंगे। लेकिन दिल्ली पहुंचने के बाद उनकी दूसरी मुश्किल बढ़ गई कि उन्हें दिल्ली में रास्ता नहीं मालूम था। ऐसे में कोई भी उन्हें ड्राइवर की नौकरी पर नहीं रखता। इसके बाद उन्होंने एक जानने वाले से दिल्ली का रास्ता समझने का उपाय पूछा तो परिचित ने रिक्शा चलाने का मशवरा दिया। दिलखुश को उनका आइडिया पसंद आया और वह 20 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से रिक्शा किराये पर लेकर चलाने लगे। 13 दिन तक तो रिक्शा चलाया ही था कि उनके सेहत ने जवाब दे दिया और फिर वह दिल्ली से काम छोड़ कर वापस गांव आ गए।

2016 में गांव आ गए थे दिलखुश
गांव वापस लौटने के बाद फिर से दिलखुश को नौकरी की तलाश सताने लगी। सेहत ठीक होने के बाद उन्होंने फिर से रोज़गार की तलाश शुरू की। चूंकि दिलखुश कुमार को बिजली के क्षेत्र में शुरू से ही दिलचस्पी थी। इसलिए उन्होंने अनुबंध के आधार पर एक कंस्ट्रक्शन कंपनी के लिए काम करना शुरू किया। काम सही ढंग से चलने लगा। आमदनी अच्छी होने पर होने 2016 में उन्होंने एक कार ख़रीदी और गांव वापस आ गए। फिर उन्होंने देखा कि गांव में कैब व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं है। कैब वाले ज्यादा चार्ज भी वसूल रहे हैं। इन सब को देखते हुए उनके दिमाग़ में आईडिया आया और उन्होंने कैब सर्विस के साथ-साथ एप्प भी डेवलप किया और आज वह कामयाब इंसान की फेहरिस्त में शुमार हैं।
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