Bihar Chunav 2025: बिहार में NDA गठबंधन की एकजुटता पर खतरा, JDU ने बनाई BJP की रणनीति से दूरी, समझिए मामला
Bihar Chunav 2025: बिहार विधानसभा चुनाव की दस्तक के साथ ही एनडीए गठबंधन के भीतर छुपी दरारें सतह पर आती दिख रही हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस बार चुनावी नैरेटिव को "घुसपैठ" और कथित जनसांख्यिकीय संकट के मुद्दे पर केंद्रित किया है।
सीमांचल के मुस्लिम बहुल जिलों अररिया, पूर्णिया, कटिहार और किशनगंज में यह एजेंडा भाजपा को तात्कालिक लाभ दिला सकता है, लेकिन राज्यव्यापी राजनीति में यह दोधारी तलवार साबित हो सकती है।

ध्रुवीकरण की राजनीति!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने हाल के भाषणों में विपक्ष को "घुसपैठियों का संरक्षक" करार देते हुए चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान को समर्थन दिया। उनका तर्क है कि मतदाता सूची को "विदेशी घुसपैठियों" से मुक्त करना ज़रूरी है।
लेकिन चुनाव आयोग ने स्पष्ट कर दिया कि बिहार में ऐसे किसी घुसपैठ के प्रमाण नहीं मिले। यह तथ्य भाजपा के दावे को कमजोर करता है और विपक्ष को अवसर देता है कि वह भाजपा पर "ध्रुवीकरण की राजनीति" का आरोप लगाए।
JDU ने बनाई मुद्दों से दूरी
सबसे बड़ी चुनौती भाजपा के अपने ही सहयोगी दलों से है। जेडीयू, जो लंबे समय से धर्मनिरपेक्ष और विकासोन्मुखी राजनीति की पैरवी करती रही है, ने इस मुद्दे से दूरी बना रखी है। पार्टी नेताओं का कहना है कि बिहार की असली ताकत सड़क, बिजली, शिक्षा और रोज़गार जैसे विकास के मुद्दे हैं, न कि सांप्रदायिक बहस। लोजपा (रामविलास) ने भी अब तक चुप्पी साधी है, जिससे यह संकेत जाता है कि एनडीए का पूरा कुनबा भाजपा की चुनावी भाषा से सहज नहीं है।
विपक्ष को मिला मौका
विपक्ष ने भी इस अवसर का लाभ उठाते हुए भाजपा को घेरने में देर नहीं की। आरजेडी का तर्क है कि भाजपा अपनी 20 साल की नाकामी छिपाने के लिए "घुसपैठिया" शब्द का सहारा ले रही है। कांग्रेस ने तो आंकड़ों के साथ चुनौती पेश की कि यूपीए सरकार के दौरान 2005-2014 के बीच 77,156 बांग्लादेशियों को वापस भेजा गया, जबकि एनडीए के तहत यह संख्या बेहद कम रही।
क्या है एक्सपर्ट कमेंट
राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि सीमांचल जैसे इलाकों में "घुसपैठिया" नैरेटिव भाजपा के कोर वोटरों को उत्साहित कर सकता है, लेकिन पूरे बिहार में इसका असर सीमित रहेगा। यहां सामाजिक न्याय, बेरोज़गारी, कृषि संकट और महंगाई जैसे मुद्दे अब भी निर्णायक हैं। जेडीयू की नाराज़गी भाजपा के लिए जोखिम को और बढ़ाती है, क्योंकि अगर नीतीश कुमार का आधार वोट खिसकता है, तो भाजपा अकेले दम पर सत्ता तक पहुंचने का सपना मुश्किल हो सकता है।
खटपट सुलझाना एनडीए के लिए ज़रूरी
चुनाव से पहले यह खटपट सुलझाना एनडीए के लिए जरूरी है। गठबंधन का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा अपने सहयोगियों की संवेदनशीलताओं को कितनी समझदारी से साध पाती है। अगर भाजपा "घुसपैठिया" एजेंडे को राज्यव्यापी मुद्दा बनाने पर अड़ी रहती है और जेडीयू विकास व सामाजिक समरसता पर जोर देता है, तो मतदाता में यह संदेश जाएगा कि गठबंधन में एकरूपता नहीं है। यह असहजता चुनावी नतीजों में नुकसानदेह साबित हो सकती है।
ध्रुवीकरण के सहारे सत्ता पाना मुश्किल
बिहार की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां जातीय और विकास दोनों ही समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। केवल ध्रुवीकरण के सहारे सत्ता पाना कठिन है। भाजपा को यह समझना होगा कि सहयोगियों को साथ लेकर चलना ही बिहार जैसे जटिल सामाजिक ताने-बाने वाले राज्य में कामयाबी की कुंजी है। "घुसपैठिया बनाम विकास" की यह लड़ाई एनडीए को उस मुकाम पर ला सकती है। जहां मतदाता उसे एक बिखरे गठबंधन के रूप में देखेगी। यही चुनाव में हार की सबसे बड़ी वजह बन सकती है।
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