बिहार की लोककला 'पिडिया-लेखन' को मिला GI टैग, दीवारों से कैनवास तक कैसे पहुंची विनीता कुमारी की पहचान?

Pidia Lekhan GI Tag: बिहार की पारंपरिक लोककलाओं में शामिल पिडिया-लेखन अब नई पहचान के साथ देश और दुनिया के सामने आ रही है। हाल ही में इस कला को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिलने के बाद इसकी सांस्कृतिक अहमियत और बढ़ गई है। इस उपलब्धि के पीछे वर्षों की मेहनत करने वाली कलाकार विनीता कुमारी भी चर्चा में हैं।

रोहतास जिले की रहने वाली विनीता पिछले कई सालों से दिल्ली में रह रही हैं, लेकिन उन्होंने अपनी लोक परंपरा से कभी दूरी नहीं बनाई। उन्होंने गांवों की दीवारों पर बनने वाली इस कला को कागज और कैनवास तक पहुंचाया और फिर राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसकी पहचान बनाई। अब GI टैग मिलने के बाद इस कला से जुड़े कलाकारों और बिहार की सांस्कृतिक विरासत को नई ताकत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

Pidia Lekhan GI Tag

गांव की संस्कृति को दिखाती है यह कला

पिडिया-लेखन बिहार की एक पारंपरिक लोककला है, जिसे खास तौर पर गांवों में महिलाएं त्योहारों और शुभ अवसरों पर बनाती रही हैं। मिट्टी और गोबर से तैयार दीवारों पर प्राकृतिक रंगों की मदद से सूर्य, चंद्रमा, पेड़-पौधे, पक्षी, डोली और इंसानी आकृतियां बनाई जाती हैं। इन चित्रों में भाई-बहन का स्नेह, परिवार की एकजुटता और गांव के जीवन की झलक साफ दिखाई देती है। इसलिए इसे सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का अहम हिस्सा माना जाता है।

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दिल्ली में रहते हुए भी नहीं छोड़ी अपनी जड़ें

विनीता कुमारी ने शहर में रहने के बावजूद अपनी लोककला को हमेशा प्राथमिकता दी। उन्होंने महसूस किया कि अगर इस कला को सिर्फ गांवों तक सीमित रखा गया तो आने वाली पीढ़ियां इससे दूर हो सकती हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने इसे नए रूप में लोगों के सामने पेश करना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी मेहनत रंग लाने लगी और पिडिया-लेखन बड़े मंचों तक पहुंचने लगा।

विनीता इस सफर का सबसे बड़ा श्रेय अपने पति भुवनेश्वर भास्कर को देती हैं। आरा में रहने के दौरान उन्होंने गांव की महिलाओं से इस लोककला की जानकारी जुटाई और उस पर अध्ययन भी किया। बाद में उन्हें लगा कि इस परंपरा की असली पहचान महिलाओं के अनुभवों में छिपी है। उन्होंने विनीता को आगे आने के लिए प्रेरित किया। यही प्रेरणा आगे चलकर एक बड़े अभियान की नींव बनी।

दीवारों से कैनवास तक का आसान नहीं था सफर

पिडिया-लेखन को दीवारों से निकालकर कागज और कैनवास पर उतारना काफी चुनौतीपूर्ण था। शुरुआत में कई बार चित्र वैसा रूप नहीं ले पाते थे जैसा गांव की दीवारों पर दिखाई देता था। इसके बावजूद विनीता ने लगातार अभ्यास जारी रखा। समय के साथ उन्होंने इस कला की पारंपरिक शैली को बरकरार रखते हुए उसे नए माध्यमों पर सफलतापूर्वक ढाल लिया। इसी प्रयास ने पिडिया-लेखन को नई पहचान दिलाने का रास्ता तैयार किया।

2019 के बाद मिलने लगे बड़े मौके

साल 2019 में विनीता कुमारी को संगीत नाटक अकादमी के एक कार्यक्रम में अपनी कला दिखाने का अवसर मिला। इस मंच से मिली पहचान के बाद उन्हें देश के अलग-अलग शहरों में आयोजित प्रदर्शनियों में बुलाया जाने लगा। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में भी उन्होंने पिडिया-लेखन का प्रदर्शन किया। इससे इस लोककला को नए दर्शक मिले और इसकी पहचान लगातार बढ़ती चली गई।

GI टैग से बढ़ेंगी नई संभावनाएं

पिडिया-लेखन को GI टैग मिलने से इस लोककला के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विनीता का कहना है कि इससे कलाकारों को पहचान मिलेगी और उनके लिए रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे। साथ ही बिहार की यह सांस्कृतिक धरोहर देश के साथ-साथ दुनिया के सामने और मजबूती से अपनी जगह बना सकेगी। आने वाले समय में इस कला से जुड़ने वाले नए कलाकारों को भी इसका सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।

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