क्या है बिहार की 'बावन बूटी' साड़ी जिसे मिला GI टैग? कैसे होती है 52 डिजाइनों की बुनाई और कितनी होती है कीमत?
Bawan Buti Saree GI Tag: नालंदा जिले की सदियों पुरानी और बेहद खास हस्तकरघा परंपरा 'बावन बूटी साड़ी और फैब्रिक' को आखिरकार भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है। यह सिर्फ एक प्रशासनिक पहचान नहीं है, बल्कि इस कला से जुड़े हजारों बुनकर परिवारों के लिए सम्मान और सुरक्षा दोनों का बड़ा कदम माना जा रहा है। इस फैसले के साथ बिहार की तीन महत्वपूर्ण पारंपरिक कलाओं को एक साथ GI टैग मिला है।
इसमें नालंदा की बावन बूटी साड़ी, गया जिले का पथरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पिडिया पेंटिंग शामिल हैं। यह मान्यता चेन्नई स्थित GI रजिस्ट्री द्वारा दी गई है। इस पूरे प्रयास में नाबार्ड और बिहार सरकार की अहम भूमिका रही है, जिन्होंने लंबे समय से इस पारंपरिक कला को पहचान दिलाने के लिए काम किया।

तीन कलाओं को एक साथ मिली बड़ी पहचान
इस बार बिहार की तीन अलग-अलग और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण पारंपरिक कलाओं को GI टैग मिला है, जो अपने-अपने क्षेत्र में अनोखी पहचान रखती हैं। नालंदा की बावन बूटी साड़ी, गया का पथरकट्टी स्टोन क्राफ्ट और भोजपुर की पिडिया पेंटिंग अब कानूनी रूप से सुरक्षित हो गई हैं, जिसका मतलब है कि अब कोई भी इन नामों का गलत उपयोग नहीं कर सकेगा। इससे इन कलाओं की मौलिकता बनी रहेगी और असली उत्पादों की पहचान राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी मजबूत होगी।
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नाबार्ड और बिहार सरकार की अहम भूमिका
इस उपलब्धि के पीछे राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) और बिहार सरकार की लगातार और संगठित कोशिशें रही हैं। नाबार्ड के जिला विकास प्रबंधक अमृत बरनवाल ने इसे नालंदा के बुनकरों के लिए एक ऐतिहासिक और भावनात्मक क्षण बताया है, क्योंकि यह सम्मान उन परिवारों की मेहनत का परिणाम है जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी इस परंपरा को जीवित रखा। इस पूरी प्रक्रिया में वाराणसी की संस्था ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन (HWA) और पद्मश्री डॉ. रजनीकांत का तकनीकी सहयोग भी महत्वपूर्ण रहा, जिसने GI टैग दिलाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद की।
क्या है बावन बूटी साड़ी
बावन बूटी साड़ी नालंदा की एक बेहद पुरानी और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध हस्तकरघा कला है, जिसमें कपड़े पर 52 अलग-अलग पारंपरिक डिजाइन या प्रतीक बेहद बारीकी से बनाए जाते हैं। इन डिजाइनों में कमल का फूल, बोधि वृक्ष, सिंह, बैल और बौद्ध संस्कृति से जुड़े कई धार्मिक और ऐतिहासिक चिन्ह शामिल होते हैं, जो इस साड़ी को एक अलग पहचान देते हैं। यह कला नालंदा के बसवन बिगहा और आसपास के गांवों में पीढ़ियों से बुनकर परिवारों द्वारा संभाली और आगे बढ़ाई जा रही है, जिससे यह सिर्फ एक कपड़ा नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत बन चुकी है।
कैसे तैयार होती है यह खास साड़ी
यह साड़ी पूरी तरह पारंपरिक हाथ से चलने वाले करघे यानी हैंडलूम पर बनाई जाती है, जिसमें हर चरण में बुनकरों की गहरी मेहनत और धैर्य शामिल होता है। सबसे पहले सूत को तैयार किया जाता है, फिर करघे पर ताना और बाना को सही तरीके से सेट किया जाता है, जिसके बाद असली बुनाई की प्रक्रिया शुरू होती है। बुनकर बहुत ही बारीकी से एक-एक कर 52 अलग-अलग डिजाइन कपड़े में जोड़ते हैं, जिससे हर साड़ी में एक अलग कला और पहचान दिखाई देती है। इस पूरी प्रक्रिया में कई दिन से लेकर कई हफ्ते तक का समय लग सकता है, जो डिजाइन और कपड़े की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।
कीमत और बाजार में बढ़ती मांग
बावन बूटी साड़ी की कीमत उसके कपड़े, डिजाइन और बुनाई की बारीकी पर निर्भर करती है, इसलिए इसकी कीमत अलग-अलग स्तर पर देखी जाती है। सामान्य तौर पर कॉटन साड़ी की कीमत लगभग ₹2,000 से ₹6,000 के बीच होती है, जबकि सिल्क और भारी डिजाइन वाली साड़ियां ₹7,000 से ₹20,000 या उससे भी अधिक कीमत तक पहुंच सकती हैं। GI टैग मिलने के बाद इसकी असली पहचान मजबूत हो गई है, जिससे बाजार में इसकी मांग बढ़ने और बुनकरों को उनके काम का बेहतर मूल्य मिलने की पूरी संभावना है।
उपभोक्ताओं की सुविधा के लिए विभिन्न प्रकार की साड़ियों की बुनाई, कपड़े की गुणवत्ता और उनकी जटिलता के आधार पर तय की गई अनुमानित बाजार मूल्य श्रेणियों को नीचे दी गई विवरण तालिका के माध्यम से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है-
| साड़ी की निर्माण शैली | अनुमानित मूल्य सीमा |
|---|---|
| साधारण कॉटन बावन बूटी साड़ी | ₹2,000 से ₹6,000 तक |
| सिल्क तथा वृहद डिजाइन की साड़ियां | ₹7,000 से ₹20,000 या अधिक |
बुनकरों के लिए नई उम्मीद और अवसर
इस GI टैग से सबसे बड़ा और सीधा लाभ उन स्थानीय बुनकरों को मिलेगा जो वर्षों से इस पारंपरिक कला को जीवित रखने में लगे हुए हैं। अब इस कला की नकली और मशीन से बनी नकल पर रोक लगने की संभावना बढ़ गई है, जिससे असली उत्पादों को बेहतर पहचान और सही कीमत मिलेगी। इससे न सिर्फ बुनकरों की आय में सुधार होने की उम्मीद है, बल्कि नई पीढ़ी भी इस परंपरा से जुड़ने के लिए प्रेरित हो सकती है, जिससे यह कला आगे भी जीवित रहेगी।
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