Navratri Special: विश्व भर में मशहूर है बिहार के ये 4 मंदिर, एक की तो ग़ज़ब है मान्यता
बिहार के दरभंगा जिले के काली मंदिर (सैदनगर) में तांत्रिक विधि से पूजा होती है। स्थानीय लोग बताते हैं कि दूसरे प्रदेश के साथ-साथ विदेशों से साधक यहां आते हैं। नेपाल और झारखंड, पश्चिम बंगाल, आसाम जैसे प्रदेशों के...
पटना, 26 सितंबर 2022। आज से नवरात्रि शुरू हो गई है, नवरात्रि के 9 दिन काफी खास माना जाता है। इन 9 दिनों में विभिन्न तरीकों से माता की पूजा अर्चना की जाती है। इसी कड़ी में आज हम आपको बिहार के 4 ऐसे मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं जो पूरे विश्व में मशहूर है। इसके साथ ही इन मंदिरों की अलग-अलग मान्यता भी है। आइए विस्तार से जानते हैं बिहार के इन 4 मंदिरों के बारे में जहां श्रद्धालुओं की खास आस्था है, मान्यता है कि इन मंदिरों में जो भी इंसान अपनी मुरादें लेकर गया है, उसे कामयाबी ज़रूर मिली है।

'पशु की बलि चढ़ाकर माता को लगाया जाता है भोग'
बिहार के दरभंगा जिले के काली मंदिर (सैदनगर) में तांत्रिक विधि से पूजा होती है। स्थानीय लोग बताते हैं कि दूसरे प्रदेश के साथ-साथ विदेशों से साधक यहां आते हैं। नेपाल और झारखंड, पश्चिम बंगाल, आसाम जैसे प्रदेशों के तांत्रिक और उपासक यहा तंत्र विद्या को सिद्ध करने आते हैं। 9 दिनों तक यहां कठोर साधना की जाती है। साधारण तौत पर यही माना जाता है कि पूजा पाठ के दौरान लोग मांसाहारी भोजन से काफी दूर रहते हैं। लेकिन दरभंगा के सैदनगर स्थित काली मंदिर में नवरात्रि के 3 दिनों तक मां काली को मांसाहारी भोग लगाए जाते हैं। पंडितों की मानें तो यह एक खास आस्था है। माता को पशु की बलि चढ़ाकर उसी का भोग लगाया जाता है।

1972 में सैदनगर दुर्गा पूजा की स्थापना की गई थी
बुज़र्गों की मानें तो 1972 में सैदनगर दुर्गा पूजा की स्थापना की गई थी, उस वक्त से लेकर आज तक यहां भव्य रूप से पूजा अर्चना की जाती रही है। इस बार खास तरह से पूजा अर्चना की जा रही है क्योंकि मंदिर की 50वीं वर्षगांठ मनाई जा रही है। इसके मद्देनज़र सारी तैयारियां पूरी कर ली गई है। पूरे पंडाल को सजाने के साथ-साथ मंदिर के बगल के तालाब भी शानदार तरीके से सजाया गया है। आज दोपहर में कलश शोभा यात्रा निकाली जाएगी। इस बाबत महिला और श्रद्धालुओं के लिए खास इतज़ाम किए गए हैं।

'माता सती के 52 टुकड़ों में से बायां आंख यहां गिरा था'
बिहार के मुंगेर जिले में 52 शक्तिपीठों में से एक मां चंडिका गंगा नदी किनारे है। मान्यता है कि यह मंदिर काफी चमत्कारी और शक्तिशाली। माता सती के 52 टुकड़ों में से बायां आंख यहां गिरा था, आज भी सोने की कवज से ज़डा नेत्र यहां सुरक्षित मोजूद है। मां चंडिका स्थान के पुजारी गजेंद्र बाबा की मानें तो पौराणिक कथाओं में माता चंडिका के सबसे बड़े भक्त महाभारत काल के योद्धा दानवीर कर्ण थे। राजा दानवीर कर्ण उस ज़माने में हर रोज यहां आते थे। एक कढ़ाई नुमा आकार में इस जगह पर घी खौलता रहता था। अपनी पूजा से माता को खुश करने के लिए राजा कर्ण खौलते घी की कढ़ाई में अपनी आहुति देते थे।

आंख की रोशनी वापस आने की है मान्यता
राजा कर्ण की पूजा-अर्चना से खुश होकर माता उन्हें ज़िंदा करती थी। वरदान के तौर पर उन्हें रोजाना 50 किलो सोना मिलता था, जो वह गरीबों को दान कर देते थे। मंदिर के बुजुर्ग पुजारी अशोक पांडा की मानें तो नेत्रहीन लोगों को यहां आंख की रोशनी मिल जाती है। उन्होंने बताया कि यहां वैसे रोगी आते हैं जिन्हें डॉक्टर ने जवाब दे दिया, आंख की रोशनी वापस आने की कोई उम्मीद नहीं बची। उन्हें मां को प्रणाम कराकर पुष्प दिया जाता है। इसके साथ ही नेत्र रोगी को गाय का घी और कपूर से आरती लगाकर बनाया हुआ का काजल दिया जाता है। इस काजल को सुबह शाम लगाने से सवा महीने में मरीज़ ठीक हो जाता है। मैया के चमत्कार से उसके आंख की रोशनी वापस आ जाती है।

बौद्ध काल में 1800 बौद्ध भिक्षु ने मांगी थी मन्नत
बिहार के नालंदा जिले में एक अनोखा मंदिर है, जहां नवरात्रि के 9 दिनों तक महिलाओं का मंदिर के गर्भगृह में दाखिल होना वर्जित रहता है। बिहार शरीफ मुख्यालय से महज 15 किमी की दूरी पर घोसरावां गांव (गिरियक प्रखंड) में मौजूद मंदिर में यह प्रथा आदि काल से चली आ रही है। पौराणिक प्रथा के मुताबिक इस मंदिर का नाम आशापुरी रखा गया। गांव के बुज़ुर्गों की मानें तो बौद्ध भिक्षु ने बौद्ध काल में 1800 यहां मन्नत मांगी थी और उनकी मन्नतें पूरी भी हुई थी। पुजारी पुरेन्द्र उपाध्याय ने मंदिर के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि नवरात्र के दिनों में महिलाओं का मंदिर में प्रवेश वर्जित रहता है। प्रतिपदा से लेकर दस दिनों तक विजयादशमी के आरती के पहले तक मंदिर में महिलाएं प्रवेश नहीं कर सकती हैं।

तंत्रियाण पूजा में महिलाओं का प्रवेश वर्जित- पुजारी
पुजारी पुरेन्द्र उपाध्याय ने बताया कि पहले से यह इलाका तांत्रिकों का गढ़ माना जाता है। तांत्रिक लोग यहां आकर सीधी हासिल करते थे। नवरात्र में के दिनों उसी समय से यहां तांत्रिक पूजा यानी तंत्रियाण होती है। तंत्रियाण पूजा में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित माना गया है। प्रथा आज की नहीं है, काफी पहले से चली आ रही है। मंदिर निर्माण की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि पूर्वजों की मानें तो राजा घोष ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसलिए गांव का भी नाम घोसरावां रखा गया।ग्रामीणों की मानें तो आशापुरी मां इस इलाके में खुद प्रकट हुईं थी, जिस जगह पर वह प्रकट हुई थी, उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया गया था।

बूढ़ी काली मंदिर में श्रद्धालुओं की खास आस्था
बिहार के किशनगंज ज़िले में मौजूद बूढ़ी काली मंदिर में श्रद्धालुओं की बहुत ही खास आस्था है। यहां के लोगों का मानना है कि अगर कोई इंसान अपनी मुराद लेकर इस मंदिर में आता है तो उसकी मुराद ज़रूर पूरी होती है। ऐसी मान्यता है इस मंदिर में मां काली की शरण में जाने के बाद हर व्यक्ति की मनोकामना पूरी होती है। स्थानीय लोगों की मानें तो इस मंदिर में मुराद लेकर आया हुआ व्यक्ति कभी निराश नहीं हुआ है। यहां कई अनंत शक्ति का वास है। सच्चे मन से बूढ़ी काली मंदिर में पूजा करने पर भक्तों की सभी मनोकामनाएं मां काली पूरा करती हैं।

मूर्ति दान के लिए कई साल करने पड़ता है इंतज़ार
बूढ़ी काली मंदिर में भक्तों में काफी श्रद्धा और विश्वास है, यही वजह है कि इस मंदिर में मूर्ति दान देने के लिए भक्तों को कई साल का इंतजार करना पड़ता है। मंदिर व्यवस्था समिति की मानें तो मंदिर में अगले 21 साल तक मूर्ति दान की बुकिंग हो चुकी है। आज की तारीख में अगर कोई इंसान इस मंदिर में मूर्ति दान की ख्वाहिश रखता है तो उसे 21 वर्षों तक का लंबा इंतज़ार करना होगा। मंदिर के मौजूदा पुरोहित मलय मुखर्जी ने बताया कि उनके पूर्वज यहां पूजा करते थे, तब से लेकर आज तक पूजा करने की यह पंरपरा कायम है।

1902 में हुई थी बूढ़ी काली मंदिर की स्थापना
मलय मुखर्जी (वर्तमान पुजारी) ने बताया कि मनोकामना पूर्ण होने पर यहां बलि भी दी जाती है। मां काली की प्रतिमा के पास स्थापित बलि वेदी में बलि दी जाती है। मनोकामनाएं पूरी होने पर श्रद्धालुओं ( भक्त) बलि देते हैं। इस मंदिर की स्थापना की तारीख 1902 बताई जाती है, लेकिन बुजुर्गों का कहना है यह मंदिर उससे भी ज्यादा पुराना है।

250 साल पहले मुस्लिम नवाब ने दी थी ज़मीन
बुज़ुर्गों की मानें तो मुस्लिम नवाब असद रज़ा ने 250 साल पहले इस मंदिर की स्थापना के लिए जमीन दी थी। नवाब असद रज़ा के ज़मीन दान करने के पीछे भी कई बातें बताई जाती है। नवाब असद रज़ा के बारे में बताते हैं कि वह किसी भी मामले में तुरंत ही संज्ञान लेते हैं। उस समय में जब उनसे कहा गया था कि मंदिर के लिए ज़मीन चाहिए तो उन्होंने तुरंत ज़मीन दे दी थी। इलाके के लोग उन्हे काफी मान सम्मान भई देते थे।
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