Motivational Story: 4 रु मजदूरी से शुरू किया सफर, इंजीनियर से सीखी बारीकियां, बनाई करोड़ों की कंपनी 'राज पंखा'
Motivational Story: कभी गांधी सेतु निर्माण में रोज़ाना 4 रुपए की दिहाड़ी पर चाय पिलाने वाले युवक ने आज 'राज पंखा' ब्रांड के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई है। बिहार के वैशाली जिले से एक साधारण मजदूर से सफल उद्योगपति बनने कामराज देश के कई राज्यों में अपने उत्पाद भेज रहे हैं। यह कहानी सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं, बल्कि जुझारूपन, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की जीती-जागती मिसाल है।
कैसे चाय से मिली सीख बन गई करोड़ों की कंपनी की नींव
कामराज का सफर महज़ किस्मत नहीं था, बल्कि उनके ठोस इरादों और सीखने की ललक का परिणाम था। 90 के दशक में गांधी सेतु के निर्माण के दौरान गेमन इंडिया कंपनी के इंजीनियरों को चाय पिलाते समय उन्होंने बिजली के काम की बारीकियां सीखीं। यह वह मोड़ था, जिसने उनके भविष्य की दिशा तय की।

11 साल की मजदूरी के बाद खुली पहली दुकान
कामराज ने 11 साल तक विभिन्न छोटे-मोटे काम किए और धीरे-धीरे एक पंखा मरम्मत की दुकान खोली। यह दुकान उनके सपनों की पहली ईंट थी। दिन-रात की मेहनत से दुकान को फैक्ट्री में बदलने के लिए उन्होंने बचत की और आखिरकार, एक पंखा निर्माण इकाई स्थापित कर दी।
बैंक लोन और MSME योजनाओं से मिला नया पंख
कामराज बताते हैं कि तीन साल पहले तक उन्होंने अपने बलबूते ही कंपनी चलाई। लेकिन जब उत्पादन और मांग बढ़ी, तो उन्होंने बैंक से 35 लाख रुपये का MSME लोन लिया। यह लोन उनके विस्तार की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ नए रोजगार के अवसर भी लेकर आया।
'राज पंखा', स्थानीय मेहनत, राष्ट्रीय पहचान
आज कामराज की फैक्ट्री में दर्जनों कर्मचारी काम करते हैं। 'राज पंखा' ब्रांड अब न सिर्फ वैशाली में, बल्कि बिहार और झारखंड के कई जिलों में मांग में है। ये पंखे गुणवत्ता, किफ़ायत और लोकल प्रोडक्शन के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।
पिता अशिक्षित, बच्चे शिक्षित, अपनी पीढ़ी को दी नई उड़ान
कामराज भले ही खुद स्कूल नहीं जा सके, लेकिन उन्होंने अपने तीनों बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई। एक बेटा इंजीनियर है, दूसरा सरकारी नौकरी में और बेटी शिक्षिका है। यह उनकी सोच और प्राथमिकताओं को दर्शाता है, जहां शिक्षा का महत्व और परिवार की तरक्की सबसे ऊपर है।
कामराज की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सोचते हैं कि संसाधनों की कमी सपनों को रोक सकती है। यह कहानी बताती है कि जज्बा हो, तो चाय पिलाते-पिलाते भी सीखा जा सकता है, और एक दिन खुद की चाय बनाना भी छोड़ा जा सकता है। अगर आप भी कोई स्थानीय व्यवसाय शुरू करने का सोच रहे हैं, तो कामराज की यह यात्रा आपको हौसला और दिशा दोनो दे सकती है।












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