Kargil Vijay Diwas: हाथ में लगी गोली, दुश्मनों से लेते रहे लोहा', कारगिल युद्ध को रिटायर्ड जवान ने किया याद
Kargil Vijay Diwas: देश के इतिहास में कारगिल युद्ध दर्ज है। इस युद्ध पर कई फिल्में बन चुकी हैं। आज कारगिल विजय दिवस के मौके पर आपको बिहार के जांबाज़ बेटों की लड़ाई और कुर्बानी की कहानी बताने जा रहे हैं।
कारगिल युद्ध में बिहार के बेटों ने देश की हिफाजत के लिए काफ़ी कुर्बानियां दी। इन्हीं बेटों में वैशाली ज़िला के चांदी गांव (हाजीपुर प्रखंड) निवासी स्व. प्रदीप सिंह के बड़े बेटे नायक सुरेंद्र सिंह का भी नाम शामिल है।

रिटायर्ड नायक सुरेंद्र सिंह आज की तारीख में अपनी युवा पीढ़ियों को फख्र से कारगिल युद्ध की कहानियां सुनाते हैं। कारगिल का किस्सा सुनाते सुनाते वह बिलकुल जवान की तरह जोश से भर जाते हैं। सुरेंद्र सिंह ने कारगिल की लड़ाई को याद करते हुए एक किस्सा बताया, जब उन्हें कारगिल से बटालिक जाना था।
कारगिल से 9 प्लाटून को बटालिक भेजा जाना था, मेजर श्रमाणंद को सूचना मिली कि 4 या 5 दुश्मन बटालिक में डेरा जमाए है। फिर किया था 9 प्लाटून की जगह 1 प्लाटून ही बटालिक के लिए रवाना हुआ। जब मौके पर पहुंचे तो पता चला की वहा वहां 4 या 5 नहीं बल्कि 25 से 30 दुश्मन मौजूद हैं।
अब क्या दुश्मनों से लोहा तो लेना ही था, उन्होंने फायरिंग कि मेजर के नेतृत्व में नायक सुरेंद्र ने मोर्चा संभाला। थोड़ी देर बाद ही जंग में मेजर शहीद हो गए। जवान गणेश को भी शहादत मिली। नायक सुरेंद्र अपने बटालियन के साथ चोटी पर दुश्मनों से लोहा लेते रहे। इसी दौरान उन्हें (नायक सुरेंद्र) को दाहिने हाथ में गोली लगी।
हाथ में गोली लगने के बाद भी सुरेंद्र डेट रहे, और दुश्मनों को नाकों चने चबवा दिया। करीब पांच दिन से भूखे प्यासे किसी तरह से कैंप पहुंचे और फिर प्राथमिक इलाज किया गया। दुश्मनों के छक्के छुड़ाते हुए जंग में जीत मिली।
रिटायर्ड नायक सुरेंद्र सिंह आज भी अपने हाथ में फंसी गोली को याद कर कारगिल युद्ध का बच्चों को वाकया सुनाते नजर आ जाते हैं। उन्हों उस कपड़े को संभाल कर रखा है, गोली लगने के बाद जिस कपड़े से खून रोकने के लिए हाथ में बांधा था।












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