बिहार की सियासत में INDIA Vs NDA से कैसे बदल सकती है तस्वीर, जानिए क्या-क्या हैं बड़े फैक्टर
INDIA Vs NDA: बिहार हमेशा से ही देश की सियासत को अलग दिशा देने का काम करता रहा है, फिर भी लोकसभा चुनाव में बने गठबंधन विधान सभा चुनाव में टूट भी जाते हैं। इस राज्य में नितीश कुमार के इर्द गिर्द चीजों को रचने की कोशिश होती है।
बिहार के सियासी समीकरण पर वन इंडिया हिंदी से प्रशांत किशोर के पूर्व सहयोगी बद्रीनाथ ने बिहार की सियासत पर खुल कर चर्चा कि। खास बातचीत में उन्होंने बताया कि पिछले लोकसभा चुनाव में मांझी, नीतीश, चिराग, बीजेपी के घटक दल रहे और 39 सीटें जीतने में सफल रहे थे, वह अब बिखर चुके हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब बीजेपी के खिलाफ आ गए हैं, इस पूरे घटनाक्रम में बिहार के राजनीतिक समीकरण में 360 डिग्री का बदलाव देखने को मिल रहा है।

नितीश कुमार कितने हैं प्रासंगिक?
बिहार की सियासत में पासा पलटते-पलटते नीतीश कुमार की लोकप्रियता में काफी गिरावट आई है। इनके बड़े सहयोगी रहे आर सी पी सिंह और उपेन्द्र कुशवाहा बीजेपी के खेमे में जा चुके हैं। चिराग को आगे करके बीजेपी ने पिछले विधानसभा में नीतीश को पहले ही काफी नुकसान पहुंचाया था। फिर पार्टी बचाने के लिए इनको राजद के साथ आना पड़ा। ऐसे में कम विधायकों वाली पार्टी के मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश कुमार के कार्यकर्ताओ में इतना जोश नहीं है, फिर भी INDIA गठबंधन में आने से नीतीश कुमार अपना अस्तित्व बचाने में सफल हुए हैं।
पप्पू यादव की क्या होगी भूमिका ?
पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन कांग्रेस की प्रवक्ता और राज्य सभा सदस्य हैं। उनकी अपनी जन अधिकार पार्टी है और वह काफी सक्रिय रहते हैं। पप्पू यादान ने पूरे बिहार में अपने पार्टी को खड़ा करने की काफी कोशिश की, लेकिन अभी तक कामयाबी नहीं मिल पाई है। उनके अलग चुनाव लड़ने से बिहार में भाजपा को फायदा पहुंचेगा। कांग्रेस पप्पू यादव को एडजस्ट करने की पूरी कोशिश करेगी। मौजूदा राजनीतिक माहौल के मुताबिक ऐसा लगता है कि पप्पू यादव 1 या 2 सीट लेकर INDIA गठबंधन में शामिल हो सकते हैं।
मुकेश सहनी फैक्टर कितना होगा प्रभावी?
मुकेश सहनी पिछले विधान सभा चुनाव में तेजस्वी के प्रेस कांफ्रेस से भागकर राजद का खेल बिगाड़ चुके हैं। मौजूदा वक्त में उनके सभी विधायकों को तोड़कर बीजेपी ने VIP का खेल बिगाड़ दिया है। निषाद समुदाय के आरक्षण के लिए मुकेश सहनी 5 करोड़ के वीआईपी रथ से बिहार में निषाद समाज के आरक्षण के लिए यात्रा कर रहे हैं, जबकि यूपी के संजय निषाद बीजेपी के साथ मजबूती से खड़े हैं। राम और निषाद राज की जोड़ी का काफी जिक्र भी करते हैं।
बीजेपी से मुकेश सहनी की बात नहीं बनती है तो उसके पास संजय निषाद को बिहार चुनाव में राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का मज़बूत विकल्प है। मुकेश सहनी अगर अकेले चुनाव लड़ते हैं तो वर्तमान हालात में थोड़े बहुत वोट मिलने की उम्मीद है। लेकिन कोई ख़ास मजबूती नहीं दिख रही है। क्योंकि ज्यादातर लोगों को बीजेपी ने अपने खेमे में कर लिया है। अगर सहनी INDIA में गए तो भाजपा को काफी नुकसान होगा।
प्रशांत किशोर का कैसा है भविष्य?
जन सुराज यात्रा पर निकले प्रशांत किशोर गावं गावं जाकर लोगों से मिल रहे हैं, वंशवाद की राजनीति पर सवाल खड़े कर रहे हैं। उनके भाषणों में नीतीश और लालू का विरोध काफी ज्यादा होता है। अभी उन्होने किसी पार्टी का गठन तक नहीं किया है। लोकसभा चुनाव में ये मैदान में नहीं भी उतरते हैं, तो उनके द्वारा बनाये जा रहे कार्यकर्त्ता किसी न किसी पार्टी में ज़रूर शामिल होंगे। उनकी तैयारियों को देखते हुए लगता है कि वह लोकसभा नहीं बल्कि विधानसभा चुनाव के लिए ज़मीन मज़बूत कर रहे हैं। प्रशांत किशोर के बयान से साफ़ ज़ाहिर हो रहा है कि वह INDIA में नहीं जाने वाले हैं।
उपेन्द्र कुशवाहा को लेने से NDA कितना हुआ मजबूत?
उपेन्द्र कुशवाहा हमेशा से एक मुखर नेता रहे हैं और बिहार में नीतीश कुमार की जरूरत रहे हैं। आधिकारिक तौर पर किसी भी जाति की ठीक-ठीक जनसंख्या बताना तो मुश्किल है, लेकिन बिहार की राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकारों का मानना है कि बिहार में कुर्मी 2-3% हैं, जबकि कुशवाहा 10-11% हैं। शुरुआत में उपेन्द्र कुशवाहा जनता दल (यूनाइटेड) के सदस्य थे।
नवंबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में कुशवाहा अपने ही चुनाव क्षेत्र से हार गए और वो भी तब, जब जेडी(यू) और भाजपा की भारी जीत हुई। इसके बाद कुशवाहा ने जनता दल (यूनाइटेड) का साथ छोड़कर नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी का हाथ थाम लिया। उन्होंने कुशवाहा जाति का समर्थन जुटाना शुरू किया, उस वक़्त कुशवाहा और कुर्मी समाज जेडी (यू) का मुख्य वोटबैंक हुआ करता था। 31 अक्टूबर 2009 को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती के मौके पर नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को जेडी (यू) में लौटने का न्यौता दिया।
2 फ़रवरी 2010 को शोषित समाज दल के दिवंगत और समाजवादी नेता बाबू जगदेव प्रसाद की जयंती के मौक़े पर नीतीश और कुशवाहा ने सार्वजनिक तौर पर पिछड़ी जातियों के समर्थन की घोषणा की। उसी साल नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेज दिया। इसके बाद राजनीतिक रूप से सशक्त कुशवाहा ने जेडी (यू) के भीतर अपनी ताक़त दिखाना शुरू किया। एक बार फिर उन्होंने 2013 में 3 मार्च को जदयू का दामन छोड़ दिया।
रालोसपा नाम की अलग पार्टी बनाई, रालोसपा शुरू में भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी पार्टी थी। साल 2015 विधानसभा चुनाव के बाद जदयू के NDA में दोबारा शामिल होने पर, उन्हें राजग छोड़ना पड़ा। इसके बाद फिर वह नीतीश की पार्टी में शामिल हुए, उन्हें MLC बनाया गया। अब उपेंद्र कुशवाहा का जनता दल युनाइटेड (JDU) से नाता टूट चुका है, वह NDA के खेमे में हैं।
उपेंद्र कुशवाहा ने जनता दल (यू) का साथ छोड़ा, नई पार्टी राष्ट्रीय लोक जनता दल के गठन की घोषणा की। समर्थकों के साथ दो दिनों की बैठक के बाद उपेंद्र कुशवाहा की ओर से नई पार्टी बनाने का विधेयक पास किया गया। उनके NDA में जाने से नीतीश का थोडा नुकसान होगा, लेकिन बीजेपी को भी ज्यादा नहीं फ़ायदा होगा। इसकी सबसे बड़ी वजह है वह अस्थिरता के दौर में हैं और उनकी बारगेनिंग पॉवर ज्यादा नहीं बची है।
चिराग और पशुपति की क्या होगी भूमिका?
रामबिलास पासवान का कद राष्ट्रीय राजनीति में काफी बड़ा रहा है। वहीं बिहार की राजनीती में एक मजबूत दलित नेता की छवि रही है। कई बार मुस्लिम समुदाय के भी बड़े पैरोकार के रूप में भी उनको देखा गया। नीतीश को रोकने के लिए रामविलास ने कभी मुस्लिम मुख्यमंत्री की शर्त रखी थी। इसके बाद नितीश ने दलितों से महादलित आरक्षण देकर रामविलास पासवान को कमजोर किया। उसके बाद से ही जीतन राम मांझी जैसे नेता बिहार की राजनीति के पटल पर दिखने लगे।
चिराग पासवान द्वारा खुद को मोदी का हनुमान बताये जाने के बाद से ही मुस्लिम समाज उससे किनारा किये हुआ है। इसके बाद भी आरक्षित सीटों पर अभी भी लोजपा (रामबिलास) की काफी मजबूत पकड़ है। यही वजह है कि रामविलास पासवान की मौत के बाद चिराग पूरे बिहार में काफी सक्रिय रहे। इस वजह से ही वह बिहार के एक मजबूत नेता के रूप में उभरे।
पशुपति पारस और चिराग में अगर हाजीपुर सीट पर समझौता नहीं हो पाया तो, यहां पर फ्रेंडली कांटेस्ट देखने को मिलेगा। वहीं चिराग की स्थिति अच्छी रहेगी। क्योंकि राम विलास पासवान की मौत के पहले से चिराग नीतीश कुमार के धुर विरोधी के रूप में स्थापित नेता हैं। बिहार में चिराग एनडीए के काफी सक्रिय नेता रहे हैं। इसलिए चिराग के आने से एनडीए को ज्यादा फायदा होगा।
पशुपति कुमार पारस, केंद्रीय मंत्री रहते अपने व्यक्तिगत ब्रांड को उभारने के असफल रहे हैं। इसी वजह से चिराग को मोदी ने अपने गले से लगाकर गठबंधन में शामिल किया और चिराग के महत्व को जगजाहिर किया। पार्टी टूटने के बाद 1 सांसद वाली लोजपा की सीटें बढ़ने की संभावना प्रबल हुई। बिहार में पशुपति और नीतीश की निरंतरता में राजनीतिक विरोध करने वाले चिराग, मोदी के खिलाफ कभी भी मुखर नहीं हुए। ऐसे में ब्रांड मोदी के साथ चिराग काफी फिट हैं।
ओवैसी को क्या होगा हासिल ?
सीमांचल में ओवैसी को पिछले विधान सभा चुनाव में काफी वोट मिले थे। इनको बिहार की पांच विधान सभा सीटों पर जीत मिली थी, जिनमें अमौर, कोचाधाम, जोकीहाट, बायसी और बहादुरगंज सीट है। लेकिन इनकी पार्टी के विधायक राजद में शामिल हो चुके हैं इससे बिहार में इनका महत्व कम होता दिख रहा है। जब कभी भी कांग्रेस लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन करती है, तो ओवैसी फैक्टर कमजोर हो जाता है।
ओवैसी फैक्टर कमजोर होने की वजह से ही यूपी के जयंत चौधरी ने अखिलेश को कांग्रेस गठबंधन में लेने का सुझाव दिया। अखिलेश भी इस बात को बखूबी जानते थे, इसलिए 2017 के बाद वह वापस कांग्रेस के साथ आने को तैयार हो गए और बैंगलुरु में INDIA की बैठक में शामिल होने गए। इसी बात का एक पहलू बिहार राज्य में भी रिफ्लेक्ट होता है।
जब कभी भी नीतीश और बीजेपी साथ लड़ते थे तो, भाजपा नीतीश को मुस्लिम बाहुल्य इलाके में भेजती थी। नीतीश कुमार को मुस्लिम समाज सपोर्ट करता था। नितीश जब राजद और कांग्रेस के साथ लड़े तो उनको मुस्लिम समाज का भरपूर समर्थन मिला। इस बार बिहार में मुस्लिम वोट के ओवैसी की तरफ जाने की संभावना बहुत कम हो गई हैं।
किन मुद्दों की रहेगी प्रधानता?
महंगाई, बेरोजगारी हर चुनाव के अहम् मुद्दे होते हैं। मोदी जी के हर साल 2 करोड़ जाब वाले स्टेटमेंट को काउंटर करने के लिए तेजस्वी द्वारा पिछले विधान सभा चुनाव में पहली कलम से 10 लाख लोगों को रोजगार देनें की बात का सहारा मिलेगा। बिहार में UCC से ज्यादा हिन्दू मुस्लिम समीकरण साधा जायेगा। उसमे हालिया मेवात दंगे को प्रमुखता से उठाया जायेगा। मेवात में रहने वाले बिहारियों के कई विडियोज़ सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।
कुल मिलाकर देखें तो बिहार ने कई विधान सभा चुनावों से किसी भी दल को बहुमत नहीं दिया है, लेकिन नीतीश के चेहरे वाले गठबंधन को जीत मिलती रही है। बिहार के लोकसभा चुनाव के करीब एक साल बाद होने वाले विधान सभा चुनाव में काफी कुछ लोकसभा चुनाव के नतीजों का असर होता है। इसलिए चुनाव से पहले बनने वाले गठबंधनों की भूमिका काफी अहम होती है।
वर्तमान में बिहार कमोबेश 2015 विधान सभा चुनाव की स्थिति में आ पंहुचा है, अगर सब कुछ वैसे ही रहा और अच्छे प्रबंधन से INDIA चुनाव लड़ा तो बिहार में NDA को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। बीजेपी के पास टक दलों को अपने शर्तों पर रखने काफी स्कोप हैं। उपेन्द्र कुशवाहा, चिराग, पशुपति या संभावित मुकेश सहनी के पास पार्टी के टूटने बिखरने के बाद बारगेनिंग पॉवर का काफी कम हुआ है।
दलित (चिराग) और महादलित (जीतन राम मांझी) को जोड़ने का एक सफल प्रयोग जो बीजेपी ने चुनाव के ऐन वक्त पर किया है बीजेपी के लिए काफी फायदेमंद है। कुल मिलाकर गठबंधन की इस राजनीति में उपजे माहौल के मुताबिक बीजेपी ने बिहार में एक अच्छा समीकरण बनाया है। इस समीकरण से बीजेपी को काफी मजबूती मिली है। INDIA के घटक दल स्थिरता के दौर से गुजर रहा है। इन दलों की बिहार में सरकार है अतः इनकी बारगेनिंग पॉवर ज्यादा है, फिर भी INDIA के सीट बटवारे में काफी मशक्कत देखनी पड़ेगी।












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