Chhath Puja 2022: अलग-अलग लोगों ने बनाई एक तरह की आकृति, 70 सालों से चली आ रही परंपरा
Chhath Puja 2022: ग्रामीण बताते हैं कि छठ पूजा के दिन सिरसोता पर दो से तीन की तादाद में कचनार गांव की व्रती महिलाएं एक साथ पूजा-अर्चना करती हैं। ग्रामीणों का मानना है कि छठ मैया से मांगी मनन्त पूर्ण होने पर लोग अपनी...
Chhath Puja 2022: बिहार में लोक आस्था का महापर्व छठ काफी धूम धाम से मनाया जाता है, सामाजिक सौहार्द और सद्भाव के पर्व की तैयारी ज़ोरों पर चल रही है। प्रदेश के विभिन्न ज़िलों से छठ पूजा की कई दिलचस्प खबरें देखने को मिल रही है। इसी कड़ी में आज हम आपको सीवान जिले के कचनार गांव (सिसवन प्रखंड) की खबर से रूबरू करवाने जा रहे हैं। जहां छठ घाट पर 462 छोटी आकृति भी बनी है। गौरतलब है कि अलग-अलग लोगों द्वारा बनाई आकृतियां एक तरह की हैं, ना ही उसमे आकार अलग है और ना प्रकार, सभी आकृति एक जैसी दिखती।

अलग-अलग लोगों ने बनाई एक तरह की आकृति
70 सालों से आकृति बनाने की परंपरा चली आ रही है, इसे छठ माता का 'सिरसोता' कहते हैं। वहीं ग्रामीण भाषा में छठ माता की प्रतिमा भी कहा जाता है। अब आपके ज़ेहन में यह सवाल उठ रहा होगा कि जब अलग-अलग लोगों ने आकृति बनाई तो फिर इनके आकार और प्रकार एक जैसे क्यों बनाए गए। इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह है कि इसमे कहीं से भी अमीर-गरीब का फर्क नज़र नहीं आए। जिस तरह से छठ घाट पर सभी लोग एक सामान होते हैं, वैसे ही 'सिरसोता' में भी कोई फर्क नहीं बनाया जाए। इसलिए अलग-अलग लोगों के द्वारा बनाने के बाद भी सभी आकृतियां एक जैसी हैं।

एक लाइन में स्थापित किया गया है सिरसोता
सीवान जिले के कई गांव में छठ माता का 'सिरसोता' बनवाया जाता है, लेकिन कचनार गांव का 'सिरसोता' का ही ज़िक्र क्यों हुआ, इसकी वजह यह है कि विभिन्न गांव में बनवाये गए सिरसोते की तादाद कचनार गांव के सिरसोते से बहुत ही कम है। इसके साथ ही दूसरे गांव में बनवाये गए सिरसोते की आकार और प्रकार भी एक जैसे नहीं हैं। कचनार एक मात्र गांव है जहां के घाट पर बने सभी 462 सिरसोता एक लाइन में स्थापित किए गए हैं और सभी एक जैसे हैं किसी में कोई फ़र्क नहीं है। पिछले 70 सालों से यह सिलसिला लगातार जारी है।

व्रती महिलाएं एक साथ करती हैं पूजा-अर्चना
ग्रामीण बताते हैं कि छठ पूजा के दिन सिरसोता पर दो से तीन की तादाद में कचनार गांव की व्रती महिलाएं एक साथ पूजा-अर्चना करती हैं। ग्रामीणों का मानना है कि छठ मैया से मांगी मनन्त पूर्ण होने पर लोग अपनी मर्ज़ी से सिरसोता बनवाते हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो पहले कचनार गांव में मिट्टी के बहुत ही कम तादाद में सिरसोते बने थे। आबादी बढ़ने के बाद गांव के बुज़ुर्गों ने यह फैसला लिया कि पुराने सिरसोते तोड़कर नया निर्माण करवाया जाए। ताकि सभी लोग आपसी इत्तेहाद के साथ छठ पूजा कर सकें। साल 2018 में पुराने सिरसौता को तोड़कर नया निर्माण कराया गया।

पूजा के दौरान दूसरे जिले से भी आते हैं लोग
स्थानीय लोगों ने छठ घाट के मद्देनज़र 2011 में मंदिर निर्माण कार्य में हाथ लगाया था। उमाकांत उपाध्याय की अगुआई में चार सालों में मंदिर निर्माण कार्य पूरा किया गया। इसके बाद बनारस से भगवान सूर्य की तीन फीट की प्रतिमा लाकर स्थापित किया गया। ग्रामीणों की मांनें तो सीवान के अलावा आस-पास के ज़िलों से भी लोग छठ पूजा के दौरान यहां आते हैं। पूजा के दौरान कचनार गांव के घाट पर काफी लोगों की भीड़ जमा होती है। है. ग्रामीण बताते हैं कि सीवान, छपरा और गोपालगंज जिले में सबसे अधिक भीड़ छठ पूजा में यहीं होती है। चचनार में अभी 462 सिरसौता है, भविष्य में तादाद और भी बढने की उम्मीद है, क्योंकि मन्नत पूरी होने पर लोग अपनी खुशी से सिरसोता बनवाते हैं।
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