Bihar News: प्रशांत किशोर ने सशर्त जमानत स्वीकारने से किया इनकार, जेल में करेंगे आमरण अनशन
Bihar News: जन सुराज पार्टी के प्रमुख और राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने पटना सिविल कोर्ट में एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ लेते हुए सशर्त जमानत को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने उनकी रिहाई के लिए 25,000 रुपए का निजी मुचलका भरने और भविष्य में कथित अपराध को न दोहराने की शर्त रखी थी। जिसे किशोर ने अस्वीकार कर दिया।
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गिरफ्तारी और जमानत का विवाद
प्रशांत किशोर को गांधी मैदान में भूख हड़ताल के दौरान गिरफ्तार किया गया था। उनके खिलाफ दो मामले दर्ज किए गए। बिना अनुमति मार्च निकालने का आरोप। गांधी मैदान में अनधिकृत भूख हड़ताल करने का मामला।

अदालत ने उनकी रिहाई के लिए सशर्त जमानत देने का आदेश दिया। जिसमें कथित अपराध को दोबारा न करने की शर्त शामिल थी। हालांकि किशोर ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है और विरोध करना उनका अधिकार है।
क्या है विवाद का मूल कारण
यह विवाद बिहार लोक सेवा आयोग की 70वीं संयुक्त प्रारंभिक परीक्षा से संबंधित प्रदर्शन से जुड़ा है। अभ्यर्थियों ने परीक्षा के सामान्यीकरण प्रक्रिया पर सवाल उठाए। जिससे पूरी परीक्षा को फिर से कराने की मांग उठी। किशोर ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोला।
कानूनी और राजनीतिक निहितार्थ
प्रशांत किशोर का सशर्त जमानत से इनकार अदालती शर्तों और व्यक्तिगत अधिकारों के बीच टकराव को दर्शाता है। किशोर के वकील ने कहा कि यह अभिव्यक्ति और विरोध के अधिकारों का मामला है। प्रशांत किशोर इस शर्त को मानकर अपने अधिकारों को सीमित नहीं करना चाहते। यदि किशोर जमानत शर्तों पर सहमत नहीं होते तो उन्हें जेल जाना पड़ सकता है। यह उनके राजनीतिक सक्रियता के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
प्रशांत किशोर का बयान
किशोर ने अपने फैसले को लेकर स्पष्ट किया कि मैंने कोई अपराध नहीं किया। यह लोकतंत्र में असहमति जताने का मेरा अधिकार है। किसी भी शर्त को मानना मेरे विरोध के अधिकार को सीमित करेगा।
BPSC विवाद और बढ़ता विरोध
BPSC परीक्षा से जुड़े विवाद पर प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सामान्यीकरण प्रक्रिया सवालों की असमानता को दूर नहीं कर सकती। परीक्षा केंद्रों पर हुई गड़बड़ियों और आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। किशोर का आंदोलन इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में लेकर आया।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और धारा 132 का इस्तेमाल
किशोर पर IPC की धारा 132 (सरकारी आदेशों का विरोध) का आरोप लगाया गया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि सात साल से कम सजा वाले मामलों में जमानत के प्रति लचीला रुख अपनाया जाना चाहिए।
प्रशांत किशोर की कानूनी लड़ाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है। उनका सशर्त जमानत से इनकार इस बात पर प्रकाश डालता है कि विरोध के अधिकारों को लेकर न्यायिक और राजनीतिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
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