Bihar Election Result: कांग्रेस पुरानी गलतियों में फंसी? खुद डूबी, दूसरों को डुबोया! फिर EVM पर ठीकरा क्यों?
Bihar Election Result: 2004 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 145 सीटें मिली थीं, जबकि उसके नेतृत्व वाले UPA गठबंधन को कुल 218 सीटें हासिल हुईं। बहुमत न होने के बावजूद कांग्रेस ने अन्य दलों की सहायता से सरकार बनाई और उसे 2009 तक स्थिरता के साथ चलाया। यह वह दौर था जब गठबंधन राजनीति अपने चरम पर थी और कांग्रेस ने सहयोगी दलों को साथ लेकर पूर्ण कार्यकाल पूरा किया।
भाजपा की हार और लालकृष्ण आडवाणी का EVM विवाद
दूसरी ओर, सत्ता हासिल न कर पाने के बाद भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी चुनावी नतीजों को स्वीकार नहीं कर पाए। उन्होंने खुलेआम EVM को कटघरे में खड़ा किया और यह हैंगओवर उनके भीतर 2009 तक जारी रहा। उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि भाजपा चुनाव हार सकती है। इस मानसिक स्थिति का असर भाजपा पर भी दिखा, क्योंकि पार्टी 2004 के सदमे से निकलने में समय ले रही थी।

2009 में कांग्रेस की दोबारा विजय और मजबूत सरकार
आडवाणी की लगातार शंकाओं के बीच कांग्रेस ने 2009 के लोकसभा चुनाव में दोबारा मजबूत प्रदर्शन किया। कांग्रेस को 206 सीटें मिली और पूरा UPA गठबंधन 262 सीटों तक पहुंच गया। कांग्रेस ने आसानी से दोबारा सरकार बनाई और 2014 तक शासन किया। यह दो कार्यकाल कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से स्थिर और निर्णायक रहे।
भाजपा का आत्मविश्लेषण और विपक्ष के रूप में उभार
लेकिन 2009 की हार के बाद भाजपा ने अपनी हार को स्वीकार किया और पूरी तरह विपक्ष की भूमिका निभाने में लग गई। उसने जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाया-सड़क से लेकर सदन तक। कांग्रेस की घेराबंदी लगातार होती रही और इसका परिणाम भाजपा को 2014 के भारी बहुमत के रूप में मिला। यह वह मोड़ था जिसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी।
कांग्रेस का आत्ममंथन से इंकार और पुरानी सोच
आज कांग्रेस उसी स्थिति में दिखाई देती है जिसमें भाजपा 2004 में थी। कांग्रेस आज भी यह स्वीकार नहीं कर पा रही है कि वह चुनाव हार सकती है। वह हर चुनावी हार को EVM, वोट चोरी या चुनावी घोटाले का नाम देती है। जनता के वास्तविक मुद्दों से कांग्रेस और राहुल गांधी अभी तक सही तरीके से नहीं जुड़ पाए हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कई चुनाव हार चुकी है, जिससे सवाल उठता है कि क्या उन्हें जनता की समस्याओं का सही अंदाज़ नहीं है या उनके आस-पास मौजूद लोग उन्हें इन मुद्दों से दूर रखते हैं। जैसे ही कांग्रेस और RJD के खराब प्रदर्शन की खबर बाहर आई तो EVM, SIR और चुनाव आयोग पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया
कांग्रेस के साथ गठबंधन का जोखिम और क्षेत्रीय दलों का रुख
इसके कई उदाहरण हैं जहां-जहां क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस के साथ आईं, वहां दोनों दलों को हार का सामना करना पड़ा। जीत के सिर्फ कुछ ही अपवाद मिलते हैं। शायद इसी वजह से ममता बनर्जी कांग्रेस से दूरी बनाए रखती हैं।
जो क्षेत्रीय पार्टियां अभी भी कांग्रेस के साथ गठबंधन करती हैं, वे राहुल गांधी के प्रचार को सीमित रखने और अपने नेताओं को ही प्रमुख चेहरे के रूप में उभारने की शर्त रखती हैं। लेकिन हाल के बिहार चुनाव की हार के बाद अब ज्यादातर क्षेत्रीय दल अपने दम पर चुनाव लड़ना पसंद करेंगे। यदि गठबंधन हुआ भी, तो मात्र कुछ सीटों का साझा फॉर्मूला ही बनेगा।
कांग्रेस के सामने चुनौतियां और ज़रूरी बदलाव
जब तक कांग्रेस अपनी हार को स्वीकार नहीं करेगी और व्यावहारिक राजनीति की ओर वापस नहीं लौटेगी, स्थिति नहीं बदलेगी। उसे जनता के मुद्दों को समझने, नेतृत्व में बदलाव करने, चाटुकारों से दूरी बनाने और अनावश्यक विवादों से बचने की जरूरत है। वरना कोई भी क्षेत्रीय पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से पहले कई बार सोचेगी-कांग्रेस की वर्तमान स्थिति तो खुद ही बहुत कुछ कह देती है।
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