तेजस्वी यादव की वो 3 बड़ी चूक जो बिहार चुनाव में महागठबंधन को भारी पड़ी

पटना- 31 वर्ष की आयु में लालू यादव की विरासत को आगे बढ़ाते हुए तेजस्वी यादव की अगुवाई में बिहार में महागठबंधन ने जिस तरह का प्रदर्शन किया है, वह काबिले तारीफ है। यह भी सच है कि अगर वह कांग्रेस की ज्यादा सीटों पर लड़ने की जिद के सामने नहीं झुके होते तो शायद परिणाम इससे भी बेहतर हो सकते थे। वह सिर्फ 10 सीटों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंचने से चूक गए हैं। क्योंकि, एलजेपी अध्यक्ष चिराग पासवान ने इस चुनाव के लिए उनसे कहीं ज्यादा मेहनत की थी। वह पिछले एक साल से बिहार में नीतीश कुमार और जदयू के लिए गड्ढा खोदने में जुट गए थे। लेकिन, फिर भी लोजपा को सफलता में सिर्फ 1 सीट मिली है। लेकिन, तेजस्वी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनता दल 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ा दल बना है। अगर बिहार में पूरे चुनाव मुहिम और इसकी शुरुआत से कुछ महीने पहले के सियासत का विश्लेषण करें तो आगे की राजनीति के लिए वो इस चुनाव से 3 सबक सीख सकते हैं।

Recommended Video

    Bihar Election Results 2020: Seemanchal ने लगाई Tejashwi Yadav के सपने में सेंध ! | वनइंडिया हिंदी
    Bihar election result 2020:3 major mistakes of Tejashwi Yadav that damaged the Grand Alliance

    शब्दों का इस्तेमाल
    बिहार के पुराने पत्रकारों में एक किस्सा प्रचलित है कि 1995 के चुनाव के आखिरी दिन लालू यादव ने अनौपचारिक चर्चा में कुर्मी-कोयरी को लेकर एक हल्की टिप्पणी कर दी थी। संयोग से उनकी टिप्पणी सार्वजनिक हो गई। कुर्मी-कोयरी के नेता माने जाने वाले नीतीश कुमार की उनसे इससे पहले ही राजनीतिक अनबन हो चुकी थी। खैर, चुनाव हो चुका था इसलिए लालू की राजनीतिक सेहत पर उसका असर उस चुनाव में तो नहीं पड़ा, लेकिन वर्ष 2000 के चुनाव में राजद को पहला झटका लगा और 2005 में नीतीश कुमार ने लालू-राबड़ी को सत्ता से बेदखल कर दिया।

    अगर 2020 का चुनाव देखें तो उसी तरह की एक चूक तेजस्वी यादव से भी हुई है। उन्होंने रोहतास जिले के सासाराम की एक रैली में अपने पिता के शासनकाल की बखान करते हुए कह दिया कि "लालूजी का राज था तो गरीब सीना तानकर बाबू साहेब के सामने चलता था...." भीड़ में तो इस टिप्पणी पर खूब तालियां बजीं। लेकिन, बिहार में 'बाबू साहेब' शब्द का इस्तेमाल लोग अक्सर राजपूत जाति के लोगों के लिए करते हैं; और रघुवंश प्रसाद सिंह की वजह से उसका एक तबका हमेशा से लालू का समर्थन भी करता आया है। अपने निधन से ठीक पहले रघुवंश बाबू भी बड़े मायूस होकर राजद से इस्तीफा दे चुके थे। जाहिर है कि एनडीए ने इसे चुनाव में मुद्दा बनाया और तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी नेताओं को बार-बार इसपर सफाई देनी पड़ी।

    इन चुनावों में तेजस्वी यादव ने कई बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर 'शारीरिक और मानसिक तौर पर थका हुआ राजनेता' बताने की कोशिश की। 31 साल के तेजस्वी की जुबान से 69 बसंत देख चुके नीतीश के लिए निकले इन शब्दों को बिहार एक वर्ग खासकर वरिष्ठों को काफी नागवार गुजरा। क्योंकि, बिहार में आमतौर पर उन दोनों के निजी रिश्ते को चाचा-भतीजे के संबंधों के तौर पर देखने की आदत पड़ी हुई है। चुनाव के बाद के सर्वे में भी यह बताया गया है कि तेजस्वी को युवाओं का ज्यादा साथ मिला है, वरिष्ठों या बुजुर्गों का उतना नहीं।

    फोटो हटाना नहीं आया काम
    इन चुनावों में तेजस्वी यादव ने शुरू से भरपूर कोशिश की थी कि प्रचार से जुड़ी तस्वीरों में उनके पिता लालू यादव ना दिखाई पड़ें। क्योंकि, लालू यादव भ्रष्टाचार के मामले में झारखंड की जेल में वर्षों की सजा काट रहे हैं और एनडीए ने उनकी यह छवि बखूबी स्थापित कर दी है । लेकिन, तस्वीर हटाने भर से बात नहीं बनी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी अपनी रैलियों में 'जंगलराज' को मुद्दा बनाया। वजह ये थी कि 15 साल के लालू-राबड़ी के शासन काल में खराब कानून-व्यवस्था का खौफ आज भी युवा वोटरों को छोड़कर बाकी लोगों के दिल और दिमाग से हटा नहीं है। तेजस्वी यादव ने इन बातों को इतिहास बताकर खारिज करने की भरपूर कोशिश की। उन्होंने सरकार बनाने पर बेहतर कानून-व्यवस्था देने का वादा भी किया। लेकिन, जब टिकट देने की बारी आई तो आजेडी ने सबसे ज्यादा अपराधी छवि के लोगों को टिकट दिया।

    पार्टी ने अनंत सिंह, रीतलाल यादव और अजय यादव जैसे दागदार छवि वाले लोगों को प्रत्याशी बनाया। इन लोगों पर कई गंभीर मामलों के अलावा हत्या तक के आरोप हैं। विभा देवी को टिकट दिया, जिनके पति पूर्व राजद विधायक राज बल्लभ यादव बलात्कार का दोषी है। किरण देवी को टिकट दिया, जिनका पति अरुण यादव पार्टी का फरार विधायक है। इस वजह से शायद वोटरों में यही संदेश गया कि एनडीए का 'जंगलराज' वाला तंज बेमतलब नहीं है।

    राजनीति पार्ट-टाइम काम नहीं है
    चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव ने बहुत ज्यादा मेहनत की है। उनको देखकर पार्टी के नेता भी हैरान थे। लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि वह चुनाव के लिए बहुत देर से तैयार हुए। उनकी वजह से पार्टी को जो सीटें मिली हैं, उनमें से ज्यादातर 10 लाख सरकारी नौकरियां और नीतीश सरकार की 15 साल की एंटी-इंकम्बेंसी जैसे मुद्दों के चलते मिली हैं। युवा वोटरों के मन में उनके लिए जो उन्माद था, वह राज्य में भारी बेरोजगारी का नतीजा है और कुछ भी नहीं। यही नहीं उन्होंने युवाओं को तो अपने पक्ष में कर लिया, लेकिन बड़ों को यह समझाने में नाकाम रहे कि बिहार जैसे राज्य में 10 लाख सरकारी नौकरी वह कहां से पैदा करेंगे?

    अगर तेजस्वी पहले से ही जनता के बीच होते तो युवाओं के अलावा भी बड़े वर्ग को वह अपने साथ कर सकते थे। जब लॉकडाउन के दौरान बिहार प्रवासी मजदूरों की समस्या झेल रहा था तो वह दो महीने के लिए पूरे सीन से गायब दिखे। इस समस्या से निपटने में राज्य सरकार शुरू में काफी लचर थी। तब वह लोगों के बीच होते और उनकी आवाज बनते तो शायद उसका प्रभाव अलग होता। विपक्ष के नेता के तौर पर उनसे यह बहुत बड़ी रणनीतिक चूक हुई कि वह हाथ आए राजनीतिक मौके को भुना नहीं सके। तब तक सरकार को बहुत वक्त मिल गया। केंद्र की मदद से राज्य सरकार कैश और अनाज के रूप में प्रवासियों तक राहत पहुंचाने में काफी हद तक सफल रही। लॉकडाउन के मारे लोगों का जो शुरुआती गुस्सा था, वह धीरे-धीरे शांत पड़ गया। आखिरकार यही राहत एनडीए के आधारभूत वोटरों को उसके साथ ही बने रहने की बड़ी वजह बन गई।

    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+