Bihar Election 2025: 'बिहार' जटिल राजनीतिक रणभूमि! चुनावी बयार में कौन किसके साथ? क्या कहता है जाति समीकरण?
Bihar Election 2025: बिहार विधानसभा का कार्यकाल 22 नवंबर 2025 को समाप्त हो रहा है, और भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार, चुनाव अक्टूबर-नवंबर 2025 में हो सकते हैं। चुनावी बयार में सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी बिसात बिछाने में जुट गए हैं। भले ही, चुनाव आयोग ने तारीखों का ऐलान न किया हो, लेकिन सियासी दल लुभाने वाले प्रचार और संवाद की धारा का प्रवाह कर रहे हैं।
पिछले चुनाव (2020) में नजर डाले तों, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 125 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, जिसमें नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। हालांकि, 2022 में जनता दल (यूनाइटेड) (JD(U)) ने NDA से नाता तोड़कर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाले महागठबंधन (MGB) के साथ सरकार बनाई, लेकिन जनवरी 2024 में नीतीश कुमार ने फिर से NDA के साथ गठबंधन कर लिया। यह बार-बार बदलता गठबंधन बिहार की अस्थिर राजनीति का प्रतीक है, जो 2025 के चुनाव को और जटिल बनाता है। आइए जानते हैं आखिर क्या है इसबार का जाति समीकरण? और कौन किसके साथ?

कौन किसके साथ?
बिहार की राजनीति में दो प्रमुख गठबंधन और कुछ नए उभरते दल मैदान में हैं। आइए समझें-
1- राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) प्रमुख दल: जनता दल यूनाइटेड (JDU), भारतीय जनता पार्टी (BJP), लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास की LJP-RV), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM), राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (RLSP)।
⦁ वर्तमान स्थिति: NDA वर्तमान में सत्ता में है, और नीतीश कुमार के नेतृत्व में यह गठबंधन विकास और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर जोर दे रहा है। BJP, जो 2020 में 74 सीटों के साथ NDA का सबसे बड़ा दल था, इस बार अधिक सीटों पर दावा कर सकती है। JD(U) के 43 सीटों के साथ नीतीश की स्थिति कमजोर हुई है, और BJP के भीतर मुख्यमंत्री पद के लिए सम्राट चौधरी जैसे नेताओं की चर्चा ने गठबंधन में तनाव पैदा किया है। LJP(RV) के चिराग पासवान भी सामान्य सीटों से चुनाव लड़कर मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा दिखा रहे हैं।
⦁ रणनीति:NDA अपनी पारंपरिक ऊपरी जाति (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार) और गैर-यादव OBC वोटरों पर निर्भर है। BJP ने EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) और दलित समुदायों में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश की है, जबकि JDU लव-कुश (कुर्मी-कोइरी) और महिला-महादलित समीकरण को मजबूत करने पर केंद्रित है।
2- महागठबंधन (MGB) प्रमुख दल: राष्ट्रीय जनता दल (RJD), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress), वामपंथी दल (CPI, CPI(M), CPI(ML))।
⦁ वर्तमान स्थिति: RJD, जो 2020 में 75 सीटों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल बना, तेजस्वी यादव के नेतृत्व में MY-BAAP (मुस्लिम, यादव, बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी, गरीब) रणनीति पर काम कर रहा है। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में RJD को केवल 4 सीटें मिलीं, लेकिन उसका वोट शेयर 22.14% तक पहुंचा, जो बिहार में सबसे अधिक था। कांग्रेस, जो 2020 में 70 सीटों पर लड़कर केवल 19 जीत पाई, इस बार सीट-बंटवारे में बेहतर सौदेबाजी चाहती है। वामपंथी दल, खासकर CPI(ML), 2020 में 19 में से 12 सीटें जीतकर मजबूत स्थिति में हैं।
⦁ रणनीति: MGB का आधार यादव (14.26%), मुस्लिम (17%) और कुछ EBC समुदाय हैं। RJD ने 2024 में कुशवाहा (कोइरी) वोटरों को आकर्षित कर JDU के लव-कुश को तोड़ा। कांग्रेस दलित और EBC महिलाओं को लुभाने की कोशिश कर रही है।
नए और छोटे दल
1. प्रशांत किशोर का जन सुराज: तीसरा मोर्चा
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी 2024 के उपचुनावों में 10% वोट शेयर के साथ उभरी है। यह सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रही है और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन और जाति-निरपेक्ष राजनीति का वादा कर रही है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी भी मुस्लिम और सवर्ण वोटरों पर नजर रखे हुए है। उनके मुद्दे-बेरोजगारी, शिक्षा सुधार, शराबबंदी हटाना, और 70 मुस्लिम उम्मीदवार उतारना-युवा और अल्पसंख्यक वोटरों को आकर्षित कर सकते हैं। अगर जन सुराज 5-10% वोट काटती है, तो यह NDA और MGB दोनों के लिए खतरा बन सकता है। जन सुराज पार्टी को RCP सिंह की आप सबकी आवाज का साथ मिला है।
2.AIMIM की दोस्ती-दुश्मनी: दोनों नुकसानदायक?
असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने महागठबंधन में शामिल होने के लिए RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को पत्र लिखकर सियासी हलचल मचा दी है। बिहार में 17.7% मुस्लिम आबादी, खासकर सीमांचल (किशनगंज, अररिया, पूर्णिया) में, AIMIM के लिए उर्वर जमीन है। 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने 20 सीटों पर चुनाव लड़ा और 5 सीटें जीतीं, जिससे RJD और कांग्रेस को नुकसान हुआ।
RJD के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने AIMIM को 'BJP की B-टीम' करार देते हुए कहा, 'उनका ट्रैक रिकॉर्ड वोट कटवाने का है।' अगर AIMIM महागठबंधन में शामिल होती है, तो मुस्लिम वोटों का बंटवारा रुक सकता है, लेकिन इससे सवर्ण और OBC वोटरों में रिवर्स पोलराइजेशन का खतरा है। वहीं, अगर AIMIM अकेले लड़ती है, तो सीमांचल की 10-15 सीटों पर RJD का वोट बैंक खिसक सकता है। ओवैसी ने कहा, 'हम सीमांचल और बाहर भी लड़ेंगे। अगर MGB साथ नहीं आता, तो हम हर सीट पर उतरेंगे।' यह स्थिति महागठबंधन के लिए दोधारी तलवार है।
3. अन्य: शिवदीप लांडे की हिंद सेना, और IP गुप्ता की इंकलाब पार्टी जैसे नए दल भी जातिगत आधार पर वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी (BSP) भी बिहार में प्रवेश कर रही है, जो गठबंधनों को प्रभावित कर सकती है।
क्या कहता है जातिगत समीकरण?
बिहार की राजनीति का आधार
7 जनवरी 2023 के जातिगत जनगणना के अनुसार, बिहार की आबादी में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) 36.01%, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) 27.13%, अनुसूचित जाति (SC) 19.65%, और अनुसूचित जनजाति (ST) 1.68% हैं, जो कुल मिलाकर 84.47% वोटरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऊपरी जातियां (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार) केवल 15.52% हैं। OBC में यादव (14.26%) और कोइरी (4.21%) प्रमुख हैं।
- NDA का जातिगत आधार: BJP का पारंपरिक समर्थन ऊपरी जातियों और शहरी व्यापारी वर्ग से है, लेकिन वह गैर-यादव OBC और EBC में पैठ बना रही है। JD(U) कुर्मी (4%) और कोइरी (4.21%) वोटरों पर निर्भर है, जो लव-कुश समीकरण के रूप में जाना जाता है। HAM और LJP(RV) दलित और EBC वोटरों को लक्षित करते हैं।
- MGB का जातिगत आधार: RJD का मुख्य आधार यादव और मुस्लिम वोटर हैं, जो MY-BAAP रणनीति का हिस्सा हैं। 2020 में MGB ने 76% मुस्लिम-यादव वोट हासिल किए। कांग्रेस और वामपंथी दल EBC और दलित वोटरों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन RJD के प्रभुत्व के कारण सीट-बंटवारे में चुनौतियां हैं।
- नए दलों का प्रभाव: जन सुराज और AIMIM जैसे दल जातिगत समीकरण को तोड़ सकते हैं। जन सुराज शहरी मध्यम वर्ग और युवाओं को लक्षित कर रही है, जबकि AIMIM मुस्लिम वोटों को प्रभावित कर सकता है।
राजनीतिक समीकरण और चुनौतियां?
1- भूमिहार वोट: गेम-चेंजर या सियासी भटकाव?
बिहार की सियासत में भूमिहार (लगभग 6% आबादी) एक प्रभावशाली जाति रही है, जो कभी कांग्रेस, फिर BJP, और बाद में RJD की ओर झुकी। 2023 की जातिगत जनगणना के अनुसार, सवर्ण (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार) 18-19% वोटर हैं, जिसमें भूमिहार निर्णायक भूमिका निभाते हैं। खासकर पटना, भोजपुर, बक्सर, और रोहतास जैसे क्षेत्रों में इनका प्रभाव 35-40% वोट तक पहुंचता है, जो 30-40 सीटों पर नतीजे बदल सकता है।
2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने केवल बेगूसराय में भूमिहार उम्मीदवार (गिरिराज सिंह) उतारा, जिससे इस समुदाय में नाराजगी फैली। 2022 में नीतीश कुमार के NDA में लौटने के बाद BJP ने भूमिहारों को साधने के लिए कई नेताओं को मंत्री बनाया और सामाजिक-आर्थिक योजनाओं से जोड़ा। दूसरी ओर, RJD का नारा 'बाभन के चूड़ा, यादव के दही, दोनों मिले तब बिहार में होई सब सही' MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को भूमिहारों के साथ जोड़ने की कोशिश है। अगर RJD इसमें सफल होती है, तो 30-35 सीटों की बढ़त मिल सकती है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भूमिहारों का झुकाव फिर से NDA की ओर है, क्योंकि BJP ने उनके गौरव और सामाजिक सम्मान को बढ़ावा देने पर जोर दिया है।
2- मुस्लिम वोट: MGB की किस्मत का ताला?
बिहार में 17.7% मुस्लिम आबादी 87 सीटों पर 20% से अधिक वोटर हैं, जो महागठबंधन के लिए निर्णायक है। 2020 में MGB को 76% मुस्लिम वोट मिले, जबकि NDA को केवल 6%। वक्फ बोर्ड संशोधन बिल के विरोध में तेजस्वी यादव की "वक्फ बचाओ, संविधान बचाओ" रैली ने मुस्लिम वोटरों को एकजुट करने की कोशिश की। RJD का MY समीकरण (14% यादव + 17.7% मुस्लिम) 30% से अधिक वोट सुनिश्चित करता है, जो 40-50 सीटों पर बढ़त दे सकता है।
हालांकि, BJP ने पसमांदा मुस्लिमों (अजलाफ और अरजाल, 80% मुस्लिम आबादी) को साधने की रणनीति अपनाई है। पटना में हाल ही में सैकड़ों पसमांदा मुस्लिमों ने BJP जॉइन की। BJP नेता गुलाम अख्तर अंसारी ने कहा, "MY समीकरण की हवा निकल चुकी है। पसमांदा अब जागरूक हैं और BJP की योजनाओं का लाभ ले रहे हैं।" अगर BJP पसमांदा वोटों में सेंध लगाती है, तो MGB को नुकसान हो सकता है।
- NDA की चुनौतियां: नीतीश कुमार की उम्र और बार-बार गठबंधन बदलने से उनकी विश्वसनीयता घटी है। BJP और JDU) के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर तनाव है, और चिराग पासवान की महत्वाकांक्षा गठबंधन की एकता को प्रभावित कर सकती है। 2025 के बजट में बिहार के लिए विशेष पैकेज NDA के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन EBC और दलित वोटरों को RJD से छीनना एक चुनौती है।
- MGB की रणनीति: तेजस्वी यादव की MY-BAAP रणनीति 2024 में आंशिक रूप से सफल रही, लेकिन गठबंधन में सीट-बंटवारे को लेकर तनाव है। कांग्रेस और वामपंथी दल अधिक सीटें चाहते हैं, लेकिन RJD का प्रभुत्व उनकी राह में रोड़ा है।
- नए दलों का उभार: प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी और BSP जैसे दल वोटों को बांट सकते हैं, जिससे NDA और MGB दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
- मुद्दे: बेरोजगारी, ग्रामीण विकास, शिक्षा और जातिगत भेदभाव जैसे मुद्दे मतदाताओं को प्रभावित करेंगे। नीतीश कुमार की सामाजिक पेंशन वृद्धि (1,100 रुपये) EBC और दलित वोटरों को लुभाने की कोशिश है। पलायन, कानून-व्यवस्था भी बड़े मुद्दे हैं।
2025 का राजनीतिक टोन
बिहार का 2025 विधानसभा चुनाव एक खुला मुकाबला होगा, जहां NDA अपनी सत्ता बचाने की कोशिश करेगा, और MGB तेजस्वी यादव के नेतृत्व में सत्ता में वापसी की उम्मीद करेगा। जन सुराज और AIMIM जैसे नए खिलाड़ी जातिगत समीकरणों को तोड़ सकते हैं, लेकिन बिहार की राजनीति में जाति का प्रभाव अब भी प्रमुख है। नीतीश कुमार की साख, BJP की रणनीति, और तेजस्वी की युवा अपील इस चुनाव को निर्णायक बनाएंगे। जैसा कि एक विश्लेषक ने कहा, '2025 का चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि बिहार के भविष्य का जनमत संग्रह है।'
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