Bankipur Bypoll: प्रशांत किशोर के बांकीपुर से जीतने के कितने चांस, कांग्रेस-RJD के समर्थन से पलटेगा समीकरण?
Bankipur Assembly Bypoll: पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव अब सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। चर्चा है कि जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर खुद यहां से मैदान में उतर सकते हैं। दूसरी ओर कांग्रेस ने खुलकर सुझाव दिया है कि अगर प्रशांत चुनाव लड़ते हैं तो महागठबंधन अपना उम्मीदवार नहीं उतारे और उन्हें समर्थन दे। यदि ऐसा होता है तो मुकाबला सीधे बीजेपी बनाम संयुक्त विपक्ष बन सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ में प्रशांत किशोर जीत दर्ज कर पाएंगे? पिछले चुनावों के आंकड़े, जातीय समीकरण, वोट शेयर और राजनीतिक माहौल क्या कहते हैं? आइए आसान भाषा में समझते हैं कि बांकीपुर उपचुनाव क्यों इतना अहम माना जा रहा है।

Bankipur Upchunav इतना हाई-प्रोफाइल क्यों बन गया?
बांकीपुर बिहार की सबसे चर्चित शहरी विधानसभा सीटों में गिनी जाती है। यह सीट लंबे समय से बीजेपी का मजबूत गढ़ रही है। इस बार उपचुनाव इसलिए हो रहा है क्योंकि नितिन नवीन राज्यसभा सदस्य बनने के बाद विधायक पद से इस्तीफा दे चुके हैं। यदि प्रशांत किशोर यहां से चुनाव लड़ते हैं तो मुकाबला केवल दो नेताओं के बीच नहीं होगा, बल्कि इसे बीजेपी और विपक्ष की प्रतिष्ठा की लड़ाई के रूप में देखा जाएगा। इसलिए पूरे बिहार के साथ राष्ट्रीय राजनीति की भी नजर इस सीट पर रहेगी।
ये भी पढ़ें: नितिन नबीन के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर 30 जुलाई को वोटिंग, क्या ढहेगा भाजपा का 30 साल पुराना किला?
क्या महागठबंधन प्रशांत किशोर को समर्थन देगा?
कांग्रेस के कई नेताओं ने खुलकर कहा है कि अगर प्रशांत किशोर चुनाव लड़ते हैं तो महागठबंधन को अपना उम्मीदवार नहीं उतारना चाहिए। उनका तर्क है कि विपक्ष का लक्ष्य केवल चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि बीजेपी को हराना होना चाहिए। राजद की तरफ से भी सकारात्मक संकेत मिलने की चर्चा है। हालांकि अभी तक किसी दल ने औपचारिक फैसला नहीं लिया है। अंतिम निर्णय प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी और महागठबंधन की बैठक के बाद ही सामने आएगा।
बीजेपी के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का सवाल क्यों?
बांकीपुर पिछले करीब तीन दशक से बीजेपी का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता है। 1995 के बाद से पार्टी लगातार यहां जीतती रही है। 2025 में नितिन नवीन लगातार पांचवीं बार विधायक बने थे। ऐसे में अगर इस सीट पर बीजेपी हारती है तो इसका राजनीतिक संदेश पूरे बिहार में जाएगा। यही वजह है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व की भी यह पहली बड़ी चुनावी परीक्षा मानी जा रही है। बीजेपी इस सीट को हर हाल में बचाना चाहेगी।
चुनावी आंकड़े क्या बताते हैं?
आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर साफ दिखाई देती है। 2020 में बीजेपी को लगभग 59.6 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस 31.6 प्रतिशत पर रही थी। 2025 में बीजेपी का वोट शेयर बढ़कर 63.25 प्रतिशत पहुंच गया। वहीं जन सुराज की उम्मीदवार को केवल 4.97 प्रतिशत वोट मिले। इसका मतलब है कि प्रशांत किशोर को जीतने के लिए अपनी पार्टी का वोट कई गुना बढ़ाने के साथ विपक्ष के पूरे वोट बैंक को भी अपने पक्ष में जोड़ना होगा।
क्या जातीय समीकरण प्रशांत किशोर के पक्ष में जा सकते हैं?
बांकीपुर में करीब 70 हजार कायस्थ मतदाता सबसे प्रभावशाली माने जाते हैं। इनके अलावा भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं। यादव, कुर्मी, मुस्लिम और अनुसूचित जाति के वोट भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। यदि महागठबंधन पूरी तरह प्रशांत किशोर के साथ आता है तो मुस्लिम, यादव और दलित वोटों का बड़ा हिस्सा उन्हें मिल सकता है। लेकिन सवर्ण मतदाताओं का बड़ा वर्ग अब तक बीजेपी के साथ मजबूती से खड़ा रहा है।
ये भी पढे़ं: Bihar Crime News: प्रेमी-प्रेमिका को फांसी की सजा, कोर्ट ने कहा- 'ऐसे दरिंदों को समाज में जीने का अधिकार नहीं'
Prashant Kishor की सबसे बड़ी ताकत क्या होगी?
प्रशांत किशोर की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत पहचान और चुनावी रणनीतिकार की छवि है। जन सुराज पिछले कई महीनों से क्षेत्र में संगठन मजबूत करने और जनसंपर्क अभियान चलाने में जुटी है। यदि वे खुद उम्मीदवार बनते हैं तो चुनाव का पूरा फोकस उन्हीं पर आ जाएगा। विपक्षी दलों का समर्थन मिलने पर वे एंटी-बीजेपी वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर सकते हैं। इससे मुकाबला पहले की तुलना में ज्यादा दिलचस्प और कड़ा हो सकता है।
जीत की राह में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सबसे बड़ी चुनौती बीजेपी का मजबूत और स्थायी वोट बैंक है। बांकीपुर पूरी तरह शहरी सीट है, जहां शिक्षित, व्यापारी और सवर्ण मतदाताओं का प्रभाव ज्यादा है। यह वर्ग अक्सर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और बीजेपी के पक्ष में एकजुट होकर मतदान करता है। ऐसे में केवल विपक्षी वोटों का एकजुट होना पर्याप्त नहीं होगा। प्रशांत किशोर को बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक में भी सेंध लगानी होगी, जो आसान काम नहीं माना जा रहा है।
आखिर प्रशांत किशोर के जीतने के कितने चांस हैं?
अगर केवल पिछले चुनावी आंकड़ों को आधार माना जाए तो प्रशांत किशोर की जीत की संभावना फिलहाल सीमित दिखाई देती है। लेकिन राजनीति केवल आंकड़ों से नहीं चलती। यदि महागठबंधन पूरी ताकत से उनके समर्थन में उतरता है, चुनाव पूरी तरह बीजेपी बनाम संयुक्त विपक्ष बन जाता है और प्रशांत स्थानीय मुद्दों के साथ नए मतदाताओं को जोड़ने में सफल रहते हैं, तो मुकाबला कड़ा हो सकता है। फिर भी मौजूदा परिस्थितियों में बीजेपी शुरुआती बढ़त की स्थिति में दिखती है, जबकि प्रशांत किशोर को जीत के लिए असाधारण राजनीतिक प्रदर्शन करना होगा।












Click it and Unblock the Notifications