Bahubali Flies: बिहार का वो बाहुबली, जिसकी रखैल थी सत्ता! एक पिता के सामने उसके बेटों को तेजाब से नहलाया
Bahubali Files (Mohammad Shahabuddin): ये कहानी है बिहार के उस काले दौर की, जब सत्ता और अपराध का गठजोड़ सिवान की गलियों में खौफ का दूसरा नाम था। एक ऐसा बाहुबली, जिसके नाम से लोग कांपते थे-मोहम्मद शहाबुद्दीन। सांसद, अपराधी सरगना और सियासी रसूख का मालिक। जहां उसके कदम पड़ते, वहां खून की नदियां बहतीं। लेकिन इस जंगलराज में एक शख्स ने उसकी हुकूमत को चुनौती दी-चंद्रकेश्वर प्रसाद (Chandakeshwar Prasad), जिन्हें लोग प्यार से चंदा बाबू कहते थे।
छोटे-से दुकानदार और कम्युनिस्ट नेता चंदा बाबू की जिंदगी को 13 अगस्त 2004 की वो काली रात ने हमेशा के लिए बदल दिया। ये कहानी उनके तीन बेटों की शहादत और एक बाप के टूटे दिल की है, जो आज भी इंसाफ की तलाश में भटक रहा है।

वो रात: जब दहशत दुकान पर उतरी
चंदा बाबू (Chanda Babu) के तीन बेटे-सतीश, गिरीश और राजीव-सीधे-सादे, मेहनती और अपने परिवार की रीढ़ थे। सिवान की छोटी-सी दुकान में वो अपने पिता के साथ रोज की तरह काम कर रहे थे। लेकिन कुछ दिन पहले से फोन पर धमकियां आ रही थीं।
13 अगस्त 2004 की शाम। सूरज ढल चुका था। चंदा बाबू की दुकान पर अचानक हथियारबंद गुंडे टूट पड़े। नकाबपोश चेहरों और पिस्तौल लिए वो जंगली जानवरों की तरह थे। 'पैसा निकाल, बूढ़े!' गुंडों ने गल्ला लूटना शुरू किया। सतीश ने विरोध किया, तो उसे बेरहमी से पीटा गया। चीखें सुनकर छोटा बेटा राजीव गुस्से में आ गया। उसने पास पड़ा तेजाब का मग उठाया और गुंडों पर फेंक दिया। कुछ छींटे उनके चेहरों पर पड़े। बस, यहीं से शुरू हुआ वो खौफनाक खेल, जिसने चंदा बाबू की जिंदगी को नर्क बना दिया।
खून और तेजाब: बाप के सामने बेटों का कत्ल
गुंडे बौखला गए। उन्होंने राजीव को खंभे से बांध दिया। चंदा बाबू चिल्लाए, गिड़गिड़ाए, लेकिन गुर्गों की आंखों में सिर्फ खून की प्यास थी। सतीश और गिरीश दौड़े आए, लेकिन अगले ही पल एक पिता की आंखों के सामने वो मंजर हुआ, जो आज भी सिवान (Bihar Siwan) की हवाओं में सिहरन पैदा करता है। गुंडों ने सतीश और गिरीश को तेजाब से नहला दिया। उनकी चीखें, उनका तड़पना, वो असहनीय दर्द-चंदा बाबू बेबस खड़े देखते रहे। दोनों बेटों की लाशों को नमक भरी बोरियों में बंद कर कहीं फेंक दिया गया। राजीव को हाथ-पैर बांधकर एक अंधेरे कमरे में कैद कर दिया।
आखिरी सहारा भी छीना
चंदा बाबू का सबसे छोटा बेटा राजीव किसी तरह रस्सियां खोलकर भाग निकला। दो बेटों की मौत के बाद वो चंदा का आखिरी सहारा था। लेकिन शहाबुद्दीन की दहशत से कोई नहीं बच सकता था। 2014 में दिल्ली गए राजीव की रहस्यमय परिस्थितियों में हत्या हो गई। एक बार फिर चंदा बाबू का घर मातम में डूब गया। तीनों बेटे-उनकी लाठी, उनकी जिंदगी-उनकी आंखों के सामने तिल-तिल कर मर गए।
इंसाफ की जंग: एक बाप का जुनून
सिवान दहशत में था। कोई बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। गवाहों को धमकियां मिलतीं, सबूत मिटाए जाते। लेकिन चंदा बाबू ने हार नहीं मानी। 'मेरे बेटों की आत्मा के लिए इंसाफ चाहिए,'-उन्होंने ठान लिया। कोर्ट गए, लेकिन जंगलराज में कानून सत्ता के तलवे चाटता था। शहाबुद्दीन सियासी रसूख के दम पर आजाद घूमता रहा। सैकड़ों आंखों ने कत्ल देखा, लेकिन कोई गवाह बनने को तैयार न था। तारीख पर तारीख, लेकिन इंसाफ कहीं नहीं।
बदलाव की बयार: बाहुबली का अंत
2005 में बिहार में सियासी हवा बदली। लालू यादव की आरजेडी सत्ता से बाहर हुई, बीजेपी-जेडीयू की सरकार आई। राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। सिवान में नौजवान IPS रतन संजय की तैनाती हुई। उन्होंने शहाबुद्दीन की मांद में घुसकर उसे पकड़ा। पहली बार बाहुबली के घर की तलाशी हुई। कुछ समय बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
चंदा बाबू की इंसाफ की लड़ाई सालों तक चली। आखिरकार, तेजाब कांड में शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा मिली। वो कभी तिहाड़ में रहा, तो कभी बिहार की जेलों में। 2015 में आरजेडी की सत्ता में वापसी की कोशिश हुई, शहाबुद्दीन को लगा वो छूट जाएगा। लेकिन बिहार अब बदल चुका था। 1 मई 2021 को तिहाड़ जेल में कोविड-19 से उसकी मौत हो गई।
एक नजर Mohammad Shahabuddin के अब तक के सफर पर
- मोहम्मद शहाबुद्दीन का जन्म 10 मई 1967 को मगध में प्रतापपुर में हुआ।
- 1980 के दशक में महाविद्यालय से ही इन्होंने राजनीति में प्रवेश किया।
- 1986 के बाद से इन पर अनेक आपराधिक मामले दायर हुए।
- मोहम्मद शहाबुद्दीन सिवान की सीट से चार बार संसद सदस्य और दो बार विधायक चुने गए।
- साल 2004 में मोहम्मद शहाबुद्दीन ने जेल से चुनाव लड़ा और जीता।
- लालू प्रसाद यादव के करीबी नेताओं में उनकी गिनती होती थी और वे पार्टी के लिए 'मुस्लिम चेहरे' के तौर पर भी जाने जाते थे।
- स्थानीय लोग 'सीवान का शहंशाह' कहकर बुलाते थे।
आज भी जिंदा है वो दर्द
सिवान की गलियों में आज भी इस कांड का जिक्र सिहरन पैदा करता है। चंदा बाबू ने अपने तीनों बेटों को खोया, फिर भी टूटे नहीं। उनकी कहानी चीख-चीखकर बताती है कि जब अपराध और सत्ता का गठजोड़ होता है, तो आम इंसान की जिंदगी नरक बन जाती है। जंगलराज अब इतिहास है, लेकिन चंदा बाबू के लिए वो दर्द हमेशा जिंदा रहेगा। क्या ये कहानी आपको भीतर तक झकझोर गई? सिवान के इस खौफनाक दौर की कोई और कहानी जानते हैं? नीचे कमेंट करें!
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