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प्रोटीन से भरपूर फसल "गडमल" बैतूल से अब पूरी दुनिया को मिलने की तैयारी में, जानिए इसकी खासियत

बैतूल जिले के ग्रामीण अंचल में गडमल नई दलहनी फसल के रूप में पाई गई है। इसकी जीआई ट्रेगिंग कराई जाएगी। राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संस्थान ब्यूरो ने ऐसे नई फसल के रूप में चयनित किया है।

गडमल फसल बैतूल से अब पूरी दुनिया को मिलने की तैयारी में

मध्य प्रदेश के बैतूल में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा एक नई फसल को लेकर विभिन्न परीक्षण किए जा रहे हैं। दरअसल बैतूल जिले के भीमपुर विकासखंड के गांव में एक नई दलहनी फसल की पहचान की गई है। उड़द जैसी दिखाई देने वाली इस फसल का स्थानीय नाम गडमल है, लेकिन वैज्ञानिकों की जांच में इसके जीन उड़द से बिल्कुल अलग पाए गए हैं। इस फसल की खास बात यह है कि ये प्रोटीन से भरपूर है। इसका उपयोग आदिवासी रोटी और दाल बनाने में करते हैं। साल 2020 से गडमल की फसल पर विभिन्न प्रयोग किए जा रहे हैं, लेकिन अब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के माध्यम से राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संस्थान ब्यूरो ने "गडमल" को नई फसल के रूप में चिन्हित किया है। जानिए गडमल के बारे में कुछ खास बातें....

90 दिन में पककर हो जाती है तैयार

90 दिन में पककर हो जाती है तैयार

गडमल एक विशेष प्रकार की दलहन फसल है, जो भीमपुर विकासखंड के कुछ आदिवासी गांव जैसे- दामजीपुरा, डुलारिया, गोबरबेल्ट, बटकी जैसे लगभग 25 गांव के आदिवासी किसान इस फसल की खेती करते हैं। इस फसल की अब तक देश या विश्व स्तर पर कहीं कोई वैज्ञानिक पहचान नहीं थी, लेकिन अब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के माध्यम से इसे नई फसल के रूप में चयनित किया गया है। यह फसल लेट खरीफ यानी सितंबर माह में बोई जाती है लगभग 90 दिन में पककर तैयार हो जाती है। प्राकृतिक कारणों से खरीफ की प्रमुख फसलें फेल होने पर इसका उत्पादन लिया जा सकता है।

आदिवासियों द्वारा आटे और दाल के रूप में प्रयोग

आदिवासियों द्वारा आटे और दाल के रूप में प्रयोग

इस दलहनी फसल का आदिवासियों द्वारा दाल के रूप में आटा बनाकर रोटी के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा उनके द्वारा धार्मिक अनुष्ठानों में भी "गडमल" का प्रयोग किया जाता है। बताया जाता है कि विषाणु रोग मोजेक के प्रकोप से इसका क्षेत्रफल एवं उत्पादन कम हुआ है।

मधुमेह को नियंत्रित करने में खासी मदद

मधुमेह को नियंत्रित करने में खासी मदद

डॉ आरडी बारपेटे ने बताया कि गडमल बैतूल के विकासखंड भीमपुर के आदिवासी गांवों में आदिवासी कृषकों द्वारा उगाई जाने वाली एक नई दलहनी फसल है, ये फसल लेट खरीफ यानि सितंबर माह में बोई जाती है, लगभग 90 दिन में पककर तैयार होती है। डॉ बारपेटे ने बताया कि ये दलहनी फसल आदिवासियों के द्वारा दाल के रूप में और इसका आटा बनाकर रोटी के रूप में उपयोग की जा रही है। कई पीढियों से ये फसल आदिवासियों के द्वारा उगाई जा रही है। यहां के आदिवासी लोग इसे अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए लगातार इसका सेवन कर रहे हैं। इस फसल से प्राप्त होने वाले बीजों में प्रोटीन की अधिकता है और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम पाई गई है। इससे मधुमेह को नियंत्रित करने में खासी मदद मिलने का दावा भी वैज्ञानिक कर रहे हैं।

गडमल को जीआई टेग दिलवाने हेतु प्रयास

गडमल को जीआई टेग दिलवाने हेतु प्रयास

कृषि विज्ञान केन्द्र, बैतूल द्वारा इस फसल को पहचान दिलाने और इसके संरक्षण हेतु राष्ट्रीय पादप आनुवंषिक संसाधन ब्यूरो, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के सहयोग से हाल में ही दिनांक 22 दिसम्बर 2022 को दामजीपुरा में गडमल दिवस मनाया गया। इस कार्यक्रम में डाॅ कुलदीप त्रिपाठी, वैज्ञानिक, राष्ट्रीय पादप आनुवंषिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली, कृषि विज्ञान केन्द के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डाॅ व्हीके वर्मा, वैज्ञानिक आरडी बारपेटे एवं डाॅ मेघा दुबे ने भाग लिया। डाॅ त्रिपाठी द्वारा गडमल के बीज, पौधे, फूल आदि के नमूने एकत्र किए गए। वैज्ञानिक अध्ययन के पश्चात् इस फसल को देश और विश्व के स्तर पर पहचान एवं संरक्षण मिलने की संभावना है। कृषि विज्ञान केन्द्र, बैतूल द्वारा इस फसल को जिले के नाम पर जीआई टेग दिलवाने हेतु प्रयास किए जा रहे हैं।

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    अब तक कि सबसे अलग ही फसल है गडमल

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    भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक डॉ सुरेश कुमार चौधरी ने बताया कि राष्ट्रीय पादप अनुवांशिक संस्थान ब्यूरो नई दिल्ली में "गडमल" के बीजों का वैज्ञानिकों द्वारा परीक्षण किया गया। इसमें उड़द के 2500 जीन से इसके जीन पूरी तरह से अलग पाए गए हैं। इसी वजह से गडमल को संरक्षित करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा किसानों को पैदावार के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इसकी जीआई ट्रैगिंग कराई जाएगी। इसके उत्पादन कार्यक्रम से जुड़ने के बाद ये किसानों के लिए आर्थिक तरक्की का बड़ा आधार बनेगी। इसकी गुणवत्ता में सुधार के लिए विभिन्न स्तरों पर अनुसंधान किया जा रहा है।

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