Sabarimala Temple Women Entry Case: 'पीरियड्स पाप नहीं', सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला पर तीखी बहस, 10 बड़ी बातें

Sabarimala Temple Women Entry Case: देश की सबसे चर्चित धार्मिक और संवैधानिक बहसों में शामिल सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान पीठ इस मामले से जुड़े संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों पर विचार करते हुए कहा कि 'सामाजिक सुधार के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता का हनन नहीं हो सकता।'

सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि 'सुधार जनता की मांग पर होने चाहिए, न कि जबरन थोपे जाएं, अन्यथा कोर्ट इसमें हस्तक्षेप करेगा और मासिक धर्म वर्जना या कलंक के रूप में देखना आपकी निजी सोच पर निर्भर करता है।'

Sabarimala Temple Women entry Case

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने ये बात तब कही जब सुनवाई के दौरान एक वकील ने कहा कि सबरीमाला मंदिर के संदर्भ में महिलाओं को प्रवेश से रोकने का आधार उनके मासिक धर्म की उम्र है, हम आज भी उस समाज में जी रहे हैं जहां मासिक धर्म को अक्सर एक वर्जना , पाप या कलंक के रूप में देखा जाता है।

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला पर गरमाई बहस, 10 बड़ी बातें

मालूम हो कि प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई में नौ जजों की एक संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही है। गौरतलब है कि सबरीमाला मंदिर मामला केरल के भगवान अयप्पा मंदिर से जुड़ा हुआ है जहां 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक थी , लेकिन सप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में 10 से 50 साल की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकने की सदियों पुरानी परंपरा को गलत बताते हुए उसे खत्म कर दिया था और सभी आयुवर्ग की महिलाओं को प्रवेश करने की इजाजत दी थी।

'भक्ति को लिंग के आधार पर नहीं रोका जा सकता'

अपने आदेश में कोर्ट ने कहा था कि 'भक्ति को लिंग के आधार पर नहीं रोका जा सकता', लेकिन विवाद फिर भी शांत नहीं हुआ, कोर्ट के फैसले के बाद भारी विरोध हुआ और पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। मामला अब 9-जजों की संवैधानिक बेंच के पास है, जो धार्मिक परंपराओं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच के बैलेंस पर विचार कर रही है।

धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक सुधार के बहाने समाप्त नहीं कर सकते

सोमवार को सुनवाई के 14वें दिन, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने दोहराया कि धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक सुधार के बहाने समाप्त नहीं किया जा सकता। अगर जनता की सहमति से सुधार की मांग उठती है, तो उस पर विचार किया जा सकता है।

सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू हुई थी

आपको बता दें कि सबरीमाला मंदिर मामले पर सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार नने तर्क दिया था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों के प्रवेश पर भी प्रतिबंध है, इसलिए, धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए और उनमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

दूसरे धार्मिक मामलों पर भी पड़ सकता है असर

हाईकोर्ट के वकील आलोक श्रीवास्तव ने वनइंडिया हिंदी से बात करते हुए कहा कि 'इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में कई अन्य धार्मिक मामलों के लिए मिसाल बन सकता है। इसमें मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार और अन्य धार्मिक संस्थानों में लैंगिक समानता से जुड़े विवाद शामिल हैं इसलिए ये सुनवाई को केवल एक मंदिर विवाद नहीं, बल्कि संविधान, आस्था और समानता के बीच संतुलन तय करने वाली महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रिया माना जा रहा है।'

Sabarimala Temple Women Entry Case

7 अप्रैल से अभी तक की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में क्या-क्या हुआ?

  • 7 अप्रैल : सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मंदिर में केवल एक खास समुदाय को प्रवेश दिया जाएगा और बाहरी लोगों को रोका जाएगा, तो इससे समाज में विभाजन पैदा हो सकता है।
  • 8 अप्रैल- पीठ ने सवाल उठाया कि क्या ऐसे लोग, जिनका मंदिर की परंपराओं या आस्था से सीधा संबंध नहीं है, वे धार्मिक प्रथाओं को अदालत में चुनौती दे सकते हैं।
  • 9 अप्रैल- सुनवाई में सबरीमाला मंदिर प्रबंधन की ओर से कहा गया कि "अयप्पा मंदिर कोई रेस्टोरेंट नहीं है, जहां कोई भी कभी भी आ जाए।"
  • 15 अप्रैल- संविधान पीठ ने कहा कि सामाजिक सुधार और धार्मिक परंपराओं के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। अदालत ने माना कि संविधान व्यक्तिगत अधिकार देता है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता भी उसका अहम हिस्सा है।
  • 17 अप्रैल-कोर्ट ने कहा कि इस मामले में फैसला व्यक्तिगत विचारों या निजी धार्मिक भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि संवैधानिक सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए।
  • 21 अप्रैल- सुनवाई के दौरान "शुद्धता" और "अपवित्रता" से जुड़े धार्मिक तर्कों पर बहस हुई। अदालत ने कहा कि देवता किसी के छूने से अपवित्र होते हैं या नहीं, यह न्यायिक बहस का मूल विषय नहीं है।
  • 22 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के विवादों से हिंदू समाज अलग-अलग संप्रदायों में बंटता दिखाई देता है, जो उचित नहीं है।
  • 23 अप्रैल- अदालत ने कहा कि किसी भी धर्म के नाम पर सार्वजनिक रास्तों या सड़कों को स्थायी रूप से बाधित नहीं किया जा सकता।
  • 28 अप्रैल-अदालत ने कहा कि किसी भी धर्म के नाम पर सार्वजनिक रास्तों या सड़कों को स्थायी रूप से बाधित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों पर जोर दिया।
  • 29 अप्रैल- पीठ ने कहा कि अदालत आस्था की सत्यता तय नहीं कर सकती। अदालत केवल यह देख सकती है कि कोई धार्मिक प्रथा संविधान के दायरे में है या नहीं।
  • 5 मई- सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में जनहित याचिकाओं का इस्तेमाल प्रचार या व्यक्तिगत एजेंडा के लिए किया जा रहा है। अदालत ने PIL की सीमाओं और जिम्मेदारी पर चिंता जताई।
  • 6 मई- कोर्ट में यह मुद्दा उठा कि दशकों पुरानी जनहित याचिकाओं को लगातार आधार बनाकर धार्मिक मामलों को अदालत में लाना कितना उचित है। पीठ ने पुरानी PIL की वैधता और प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
  • 7 मई - सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर धार्मिक परंपरा को अदालत में चुनौती देना न्यायिक व्यवस्था का उद्देश्य नहीं हो सकता। अदालत ने संकेत दिया कि न्यायपालिका को धार्मिक मामलों में सीमित और संतुलित हस्तक्षेप करना चाहिए।
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