Bhopal MP News: मध्य प्रदेश के शिक्षकों को ऐप से ई-अटेंडेंस की दिक्कतों से कब मिलेगी राहत, जानिए पूरा मामला
मध्य प्रदेश के लाखों शिक्षकों के लिए 'हमारे शिक्षक' ऐप-जो ई-अटेंडेंस को अनिवार्य बनाने का सरकारी हथियार था-अब एक बड़ा सिरदर्द बन गया है। ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क की कमी, महंगे डेटा पैक, धीमे सर्वर और चेहरा मिलान की दिक्कतें-ये शिकायतें अब जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच चुकी हैं। गुरुवार को कोर्ट ने 27 शिक्षकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से ऐप का पूरा रिकॉर्ड मांगा है, और अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को तय की है।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह व्यवस्था शिक्षकों को 'तकनीकी गुलामी' में बदल रही है, जबकि सरकार का तर्क है कि 73% टीचर्स सफलतापूर्वक ऐप चला रहे हैं। यह मामला न केवल शिक्षा विभाग की डिजिटल महत्वाकांक्षा को चुनौती दे रहा है, बल्कि ग्रामीण भारत की डिजिटल डिवाइड को भी उजागर कर रहा है। आइए, इस विवाद की पूरी परतें खोलते हैं-याचिका से लेकर कोर्ट की कार्रवाई, ऐप की दिक्कतें और भविष्य की संभावनाओं तक।

27 शिक्षकों की 'डिजिटल दर्द', ग्रामीण इलाकों में 'तकनीकी त्रासदी'
मामला 10 अक्टूबर 2025 को शुरू हुआ जब जबलपुर के मुकेश सिंह बरकड़े सहित 27 शिक्षकों (मुख्यतः ग्रामीण और छोटे शहरों से) ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य पीठ में याचिका दायर की। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि स्कूल शिक्षा विभाग की ई-अटेंडेंस प्रक्रिया-जो 'हमारे शिक्षक' ऐप के जरिए अनिवार्य है-शिक्षकों को व्यावहारिक रूप से परेशान कर रही है। ऐप में चेहरा स्कैनिंग (फेशियल रिकग्निशन) से हाजिरी दर्ज होती है, लेकिन यह तकनीक ग्रामीण क्षेत्रों में काम नहीं कर रही।
याचिका में गिनाई गई प्रमुख दिक्कतें:
- स्मार्टफोन की कमी: कई शिक्षकों के पास पुराने फोन हैं, जो ऐप को सपोर्ट नहीं करते। ग्रामीण टीचर्स के पास तो स्मार्टफोन ही नहीं।
- डेटा पैक का बोझ: हर महीने 5-10 GB डेटा खर्च होता है, जिसकी लागत 200-300 रुपये। सैलरी से कटौती का बोझ।
- बैटरी और नेटवर्क समस्या: ग्रामीण स्कूलों में नेटवर्क कवरेज कमजोर, और पूरे दिन फोन चार्ज रखना चुनौती। ऐप क्रैश होने पर हाजिरी नहीं लगती।
- सर्वर की धीमापन: ऐप का सर्वर इतना धीमा कि सुबह 8-9 बजे पीक टाइम में लोड नहीं होता। चेहरा मिलान में 70% असफलता।
याचिकाकर्ताओं के वकील अंशुमान सिंह ने कोर्ट में कहा, "यह व्यवस्था शिक्षकों को 'तकनीकी गुलाम' बना रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल डिवाइड को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।" मुकेश सिंह बरकड़े ने बताया, "मेरा स्कूल जबलपुर के पास है, लेकिन ऐप लोड होने में 20 मिनट लग जाते हैं। अगर हाजिरी न लगे तो वेतन कटौती का डर।"
कोर्ट की सुनवाई: सरकार का 73% दावा, लेकिन हलफनामा मांगा-30 अक्टूबर को फैसला?
गुरुवार को जबलपुर हाईकोर्ट की मुख्य पीठ (जस्टिस सुजाता महापात्रा और जस्टिस वंदना तिवारी) ने मामले पर सुनवाई की। सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल ने दावा किया कि प्रदेश के 3.5 लाख शिक्षकों में से 73% (करीब 2.55 लाख) सफलतापूर्वक ऐप चला रहे हैं। "यह ऐप उपस्थिति सुनिश्चित करने का आधुनिक तरीका है, और अधिकांश टीचर्स संतुष्ट हैं।" लेकिन कोर्ट ने इस दावे पर सवाल उठाते हुए सरकार से हलफनामा और ऐप का पूरा रिकॉर्ड मांगा। जस्टिस ने कहा, "73% का आंकड़ा सही है या नहीं, इसके समर्थन में दस्तावेज पेश करें। याचिकाकर्ताओं की शिकायतें व्यावहारिक लगती हैं।"
याचिकाकर्ताओं के वकील ने जोर देकर कहा, "सर्वर की धीमापन से हाजिरी न लगने पर शिक्षकों को नोटिस मिल रहे हैं। बैटरी-नेटवर्क समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में आम है।" कोर्ट ने दोनों पक्षों से हलफनामा मांगा कि 'सारे शिक्षक हैं या सिर्फ 27?' और अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को तय की। अगर कोर्ट राहत देता है, तो ऐप में सुधार या वैकल्पिक व्यवस्था संभव।
'हमारे शिक्षक' ऐप: डिजिटल हाजिरी का सपना, लेकिन ग्रामीणों के लिए 'सिरदर्द'
स्कूल शिक्षा विभाग ने 1 अगस्त 2025 से 'हमारे शिक्षक' ऐप अनिवार्य किया, जो शिक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए चेहरा स्कैनिंग पर आधारित है। ऐप की खासियतें: जीयो-टैगिंग, रीयल-टाइम मॉनिटरिंग। लेकिन समस्याएं:
ग्रामीण चुनौतियां: MP के 80% स्कूल ग्रामीण हैं, जहां 4G कवरेज कम। ऐप क्रैश रेट 40%।
तकनीकी खामियां: चेहरा मिलान में दाढ़ी-मूंछ या सूरज की रोशनी से समस्या। सर्वर लोड से 30% असफलता।
आर्थिक बोझ: डेटा खर्च सालाना 3,000-5,000 रुपये। पुराने फोन पर ऐप नहीं चलता।
नोटिस का डर: हाजिरी न लगने पर वेतन कटौती या अनुशासनिक कार्रवाई। हाल ही में जबलपुर के एक स्कूल में शिक्षिका को नोटिस मिला, जिसका जवाब वायरल हो गया।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि 50% से ज्यादा टीचर्स परेशान हैं। एक सर्वे के अनुसार, 60% ग्रामीण शिक्षक ऐप से असंतुष्ट।
शिक्षकों की आवाज: 'डिजिटल डिवाइड नजरअंदाज, ग्रामीण टीचर्स परेशान'
मुकेश सिंह बरकड़े ने कहा, "मेरा फोन पुराना है, ऐप लोड नहीं होता। नेटवर्क आता-जाता रहता है।" इंदौर की एक शिक्षिका ने बताया, "हर सुबह 30 मिनट हाजिरी लगाने में लग जाते हैं। बैटरी खत्म हो जाती है।" संगठनों ने अपील की कि बायोमेट्रिक मशीन या मैनुअल साइन-इन वैकल्पिक हो। विपक्षी कांग्रेस ने इसे 'शिक्षकों पर अत्याचार' कहा।
सरकार का पक्ष: 73% सफलता का दावा, लेकिन सुधार का वादा
शिक्षा विभाग ने कहा कि ऐप 73% सफल है, और शिकायतों पर हेल्पलाइन (0755-2553322) शुरू की। "ग्रामीण क्षेत्रों में सोलर चार्जर और फ्री डेटा की योजना है।" लेकिन याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि ये वादे कागजी हैं।
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