MP Ujjain: गधों का मेला तेजस्वी, ओवैसी, पुष्पा नाम से क्यों लगी बोली, जानिए कौन कितना दमदार – अनोखी परंपरा
कार्तिक माह की पवित्रता में उज्जैन की धरती पर एक अनोखा मेला सजा है, जहां गधे न केवल काम के साथी हैं, बल्कि मनोरंजन के केंद्र भी। हर साल की तरह इस बार भी शिप्रा नदी के किनारे बड़नगर रोड पर लगने वाला पारंपरिक गधों का मेला 1 नवंबर 2025 से शुरू हो गया है।
गुलाब जामुन खिलाकर और पूजा-अर्चना के साथ मेले की शुरुआत हुई, जो कार्तिक पूर्णिमा (15 नवंबर) तक चलेगा। देशभर से 500 से अधिक गधे और 200 घोड़े बिक्री के लिए पहुंचे हैं। लेकिन इस मेले की असली चमक हैं - गधों के ट्रेंडिंग नाम।

सलमान, शाहरुख, ऐश्वर्या, जैकलीन, शबनम से लेकर तेजस्वी, ओवैसी और पुष्पा तक - ये नाम सियासत, बॉलीवुड और पॉप कल्चर की हवा बने हुए हैं। मेला प्रभारी कैलाश प्रजापत बताते हैं, "नाम ग्राहकों को आकर्षित करने की रणनीति है। ट्रेंडिंग नाम सुनकर लोग रुकते हैं, गधे को परखते हैं।" आइए, इस मेले की पूरी दास्तां जानते हैं - नामों की मस्ती से लेकर कीमतों के दम तक, और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्व।
गुलाब जामुन और पूजा से सजा धाम, 500 गधों का जलवा
उज्जैन का गधों का मेला सदियों पुरानी परंपरा है, जो 16वीं शताब्दी के मुगल काल से जुड़ी मानी जाती है। किंवदंती है कि औरंगजेब के चित्रकूट अभियान के दौरान उसके काफिले के गधे-घोड़े बीमार पड़ गए, तो यहां मेला लगाने का आदेश हुआ। आज यह मेला क्षिप्रा तट पर कार्तिक एकादशी से पूर्णिमा तक सजता है। 1 नवंबर को शुरू हुए मेले में परंपरानुसार गधों को गुलाब जामुन खिलाया गया - मिठास का प्रतीक। पशुपालकों ने पूजा की, मंगलवार को मुख्य सौदेबाजी का दिन।
मेला प्रभारी कैलाश प्रजापत ने बताया, "इस बार 500 से अधिक गधे शाजापुर, सुसनेर, मक्सी, सारंगपुर, भोपाल, राजस्थान और महाराष्ट्र से आए। 200 घोड़े अमरावती, अरनी, मालेगांव और सिरपुर से। कोरोना के बाद 2022 में 2000 गधे आए थे, लेकिन अब संख्या सामान्य हो रही है।" मेला क्षेत्र 10 एकड़ में फैला, जहां सैकड़ों पशुपालक और खरीदार जुटे। स्थानीय प्रशासन ने पार्किंग और साफ-सफाई के इंतजाम किए।
नामों की मस्ती: तेजस्वी, ओवैसी, पुष्पा - सियासत और बॉलीवुड का दमदार जलवा
मेले का असली मजा नामों में है। व्यापारी गधों को सजाते हैं, पीठ पर नाम लिखते हैं - ताकि खरीदार रुकें, हंसें और सौदा करें। इस बार बिहार चुनाव का असर साफ दिखा। तेजस्वी यादव नाम का गधा (बिहार के नेता पर तंज) सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। उसकी बोली 12,000 रुपये तक लगी, क्योंकि "तेजस्वी की तरह दमदार लेकिन जिद्दी!
व्यापारी बबलू प्रजापत ने हंसते हुए कहा।ओवैसी नाम का गधा (AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी पर) 10,000 में बिका - "ओवैसी की तरह तेज बोलता है, लेकिन कामचोर!" पुष्पा नाम का गधा (अल्लू अर्जुन की फिल्म 'पुष्पा' से) सबसे आकर्षक - बोली 15,000 तक पहुंची। "पुष्पा की तरह फायर है, बोली लगती ही जंगल में घूमता है!" एक खरीदार ने मजाक किया।
अन्य नाम: सलमान (12,000), शाहरुख (11,000), ऐश्वर्या (9,000), जैकलीन (8,000), शबनम (7,000)। पुराने मेले में ओवैसी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव नाम के गधे 15,000 में बिके। व्यापारी कहते हैं, "नाम ट्रेंडिंग रखते हैं - ग्राहक हंसते हैं, गधे की ताकत परखते हैं।" यह रणनीति काम करती है - नामदार गधे जल्दी बिकते हैं।
कीमत का खेल: 4 हजार से 15 हजार तक, दांत देखकर तय होता दम
मेले में कीमत दांतों से तय होती है। पशुपालक बताते हैं, "दो दांत वाले गधे (बूढ़े) 4,000-6,000 रुपये, चार दांत वाले (युवा, ताकतवर) 10,000-15,000।" तेजस्वी (चार दांत, मजबूत) 12,000 में बिका, ओवैसी (तीन दांत) 10,000, पुष्पा (चार दांत, तेज दौड़) 15,000। घोड़े 10,000-20,000 में बिके।
व्यापारी बबलू प्रजापत ने कहा, "गधे सस्ते मजदूर हैं - ईंट भट्टे, निर्माण, सामान ढोने के लिए। मशीनीकरण से डिमांड घटी, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अभी भी राजा।" 2022 में एक गधा फ्री ऑफर चला, इस बार नहीं - लेकिन सौदा पटने पर छूट मिलती है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार, परंपरा और आज का संघर्ष
यह मेला न केवल व्यापार है, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर। उज्जैन के कार्तिक मेले का हिस्सा, जहां गधे प्रतीक हैं - मेहनत और वफादारी के। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गधे सस्ते साधन हैं। एक पशुपालक ने कहा, "ट्रैक्टर महंगे, गधा 5,000 में खरीदो, 10 साल चलेगा।" लेकिन चुनौतियां हैं - मशीनीकरण से बिक्री घटी, पशु क्रूरता कानून। फिर भी, मेला 500 परिवारों की आजीविका है। स्थानीय प्रशासन ने स्वास्थ्य जांच अनिवार्य की - टीकाकरण, वजन। मेला पर्यटन को बढ़ावा देता - पर्यटक नामों पर हंसते हैं।
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