चंद्रयान-3: 'वो ठोकर ही थी, जिसने मंजिल पर पहुंचा दिया', टीम के महेंद्र-प्रमोद को याद आया बालाघाट
Chandrayaan-3: 'बुलंदियों का बड़े से बड़ा निशान छुआ, उठाया गोद में मां ने तब आसमां छुआ' मशहूर शायर मुन्नवर राणा के शेर की ये लाइन 'मिशन मून' के 'चंद्रयान-3' की कामयाबी की ताकत को चरितार्थ करती हैं। हो भी क्यों ना... एक मां वो जिसके आंचल में पले-बड़े, एक भारत माता की गोद जिसमें पूरा हिन्दुस्तान बसा हुआ हैं।
चंद्रयान-3 की सफलता के प्रतीक बने इसरो के वैज्ञानिकों ने आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा काम किया हैं। इस टीम का हिस्सा मध्य प्रदेश के छोटे जिले बालाघाट जिले से ताल्लुक रखने वाले दो ऐसे चेहरे भी बने, जिन्होंने राज्य का भी मान बढ़ाया।

प्रोजेक्ट मैनेजर महेंद्र ठाकरे
पहले बात जिले के बिरसा तहसील के छोटे से गांव कैंडाटोला के महेंद्र ठाकरे की। पृथ्वी की कक्षा में चंद्रयान भेजने वाली टीम में महेंद्र ने मजबूत स्तंभ की भूमिका निभाई। इस टीम को रॉकेट टीम कहा जाता हैं। जिसमें महेंद्र प्रोजक्ट मैनेजर हैं। बड़ी सफलता के बाद उन्होंने मीडिया को बताया कि यह प्रोजेक्ट बड़ी चुनौती थी। हौसला बुलंद था और कामयाब होने के वाले रास्तों को अच्छी तरह से परख लिया गया था। नतीजतन हम सफल हुए।
नेविगेटर प्रमोद सोनी
चंद्रयान की सॉफ्ट लैंडिंग का दुनिया भर में अब डंका बज रहा हैं। जिसके पीछे देश के महान वैज्ञानिकों की भूमिका को नहीं भुलाया जा सकता। बालाघाट जिले से ही वास्ता रखने वाले प्रमोद सोनी भी चर्चा में हैं। प्रमोद भी चंद्रयान-3 टीम में शामिल है। प्रमोद ने कहा कि पिछले मिशल की असफलता से जो ठोकर लगी, उसने टीम को सीख दी। गलतियों का बारीकी से अध्ययन किया गया। फिर नए मिशन की तैयारियों में उनकी तरह टीम के अन्य सदस्य जी-जान से जुटे रहे।
प्रमोद के पिता नीलकंठ सोनी पीडब्ल्यूडी विभाग से एसडीओ के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद उनका परिवार सिवनी में बस गया। प्रमोद ने हायर सेकंडरी तक पढ़ाई बालाघाट जिले की कटंगी तहसील में ही की। बुधवार को जब चंद्रयान-3 सफल हुआ, तो उनको सबसे पहले अपना स्कूल और शिक्षक याद आए। जिनकी बदौलत आज वह इसरो तक पहुंचे। साथ ही भारत के इस बड़े अभियान का हिस्सा बने।












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