क्या पिता के अधूरे ख्वाब को पूरा कर रहे हैं जोशी!

वही दूसरी ओर यूपी में सत्तारूढ दल समाजवादी पार्टी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पं. नारायण तिवारी का खुला समर्थन जुटाने में कामयाब हो गयी , कांग्रेस नेता को सम्मान दर्शाते हुए मुख्यमंत्री के साथ प्रमुत्ता के साथ एक विजापन जारी हुआ है, विकास पुरूष के नाम से विख्यात पं. नारायण दत्त तिवारी को उत्तराखण्ड में जहां मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा उपेक्षित व तिरस्कार किया जा रहा है।
वही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार पं. नारायण दत्त तिवारी का पलके पांवडे बिछा कर स्वागत कर रही है, समाजवादी पार्टी की सरकार ने पं. नारायण दत्त तिवारी को वह सम्मान दिया जो कांग्रेसी जन उन्हें कभी नहीं दे पाये, यूपी की समाजवादी पार्टी की सरकार ने सरकारी समारोह के उपलक्ष्य में जारी होने वाले विज्ञापन के बीच में पं. नारायण दत्त तिवारी की फोटो प्रकाशित की है, उनके बगल में मुख्यमंत्री की फोटो है, लखनऊ से राजनीतिक प्रेक्षकों व मीडिया जगत के बीच अनेक चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है, अखिलेश सरकार द्वारा जारी विज्ञापन में पं0 तिवारी की फोटो प्रकाशित होने के पीछे लोकसभा चुनावों की आहट के पीछे सपा पं. तिवारी का सहयोग व समर्थन जुटाने में सफल हो गयी है- इससे यह साफ हो गया है कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के सफाये के लिए पं. नारायण दत्त तिवारी के रूतबे व प्रभाव का इस्तेमाल समाजवादी करेगें।
वहीं उत्तराखण्ड में भी इसका व्यापक प्रभाव पडेगा, पं; तिवारी का कुमायूं में मतदाताओं पर गहरा असर माना जाता है, उत्तराखण्ड की कांग्रेस सरकार खासकर मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से पं. नारायण दत्त तिवारी खुला विरोध जता चुके हैं, उत्तराखण्ड में आायी आपदा में बहुगुणा की भूमिका को लेकर वह उन्हें कठघरे में खडा कर चुके है, अब लोकसभा चुनावों में उत्तराखण्ड तथा यूपी में पंडित जी कांग्रेस को धराशायी करने को बेताब हो उठे हैं- समीकरण तो यही कह रहे हैं-वैसे भी कांग्रेस का इतिहास रहा है कि बुजुर्ग व वरिष्ठ नेताओं का बुढापा अपमानित ही होता रहा है, हेमवती नंदन बहुगुणा इसके साफ उदाहरण है, मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पिताश्री ने इंदिरा गॉधी के छल से अपमानित होकर कांग्रेस को खत्म करने की प्रतिज्ञा ली थी तथा अपने पुत्र को दिलवायी थी, ऐसी चर्चा है,
उत्तराखण्ड कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष सूर्यकान्त धस्माना ने अपने एक आलेख में लिखा है कि आपातकाल के दौरान हेमवती नंदन बहुगुणा व इंदिरा गॉधी में सैद्वांतिक मतभेद हुए और वह कांग्रेस से अलग हो गये, चौधरी चरण सिंह के कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने, जिसमें बहुगुणा वित्त मंत्री बने, चन्द दिनों में इंदिरा गॉधी ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी, 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए, इंदिरा गॉधी ने हेमवती नंदन बहुगुणा को कांग्रेस में आने का निमंत्रण दिया तथा उनको प्रमुख महासचिव बनाया, 1980 में मध्यावधि चुनाव में बहुगुणा ने पूरी शक्ति के साथ चुनाव अभियान को संचालित किया, बहुगुणा गढवाल से लडे व जीते, इदिरा गॉधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद बहुगुणा को सरकार में नहीं लिया, जिस पर छह माह बाद मई 1980 में हेमवती नंदन बहुगुणा ने कांग्रेस पार्टी ही नहीं लोकसभा की सदस्यता से त्याग पत्र दे दिया।
इस तरह हेमवती नंदन बहुगुणा की राजनीतिक यात्रा में साफ देखा जा सकता है कि उन्हें इंदिरा गॉधी द्वारा किस तरह छला गया था, मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पिताश्री ने इंदिरा गॉधी के छल से अपमानित होकर कांग्रेस को खत्म करने की प्रतिज्ञा ली थी तथा अपने पुत्र को दिलवायी थी, ऐसी चर्चा है,
विश्वासपात्रों की कमी, स्वार्थपरक राजनीति तथा राजनीतिक स्थिति ने बहुगुणा को भीतर बाहर से तोड दिया था, उनका दम घुट रहा था, वे दुखी रहने लगे, वे अपने परिवारजनों व ईष्ट मित्रों को कहा करते थे; क्या राजनीति का इतना विक़त रूवरूप देखने के लिए मैंने संघर्ष किया, मैने सिद्वांतों के आधार पर इंदिरा गॉधी से संघर्ष किया, यही कारण है कि उन्होंने अकेले ही संघर्ष का मन बना लिया था- एकता चलो, एकचला चरो रे, को जीवन में तथा परिजनों को इसे अपनाने का संदेश दिया, दरअसल उनकी स्थिति राजनीति में बडी दुविधा पूर्ण हो चुनोती थी, इंदिरा गॉधी से गंभीर मतभेद के कारण कांग्रेस छोडकर लोकदल में आये, वहा देवीलाल तथा शरद यादव ने भी उन पर गंभीर आरोप लगाने शुरू कर दिये, जिससे वह अंदर से टूट से गये थे,
लेखक परिचय: लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों का महासंघ- इंडियन फैडरेशन आफ स्माल एण्ड मीडियम न्यूज पेपर्स नई दिल्ली - की उत्तराखण्ड इकाई के अध्यक्ष चन्द्रशेखर जोशी द्वारा लिखित।












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