जापान यात्रा के लिये चीन सीमा पर बनी 5 किमी लंबी सड़क!
[नवीन निगम] भारतीय मीडिया में एंजेसी के हवाले से खबर आई है कि चीनी सेना ने भारतीय सेना के एक गश्ती दल को वास्तविक नियंत्रण रेखा तक जाने से रोक दिया, यही नहीं, चीन ने भारतीय सीमा में 5 किलोमीटर की सड़क भी बना ली है। यह सड़क फिगर-4 इलाके तक बनी है। (इतनी जल्दी सड़क कैसे बन जाएंगी यह मेरी समझ से तो परे है) अब जबकि चीनी प्रधानमंत्री के दौरे के बाद यह साफ हो गया है कि चीन को भारतीय जमीन से ज्यादा भारतीय बाजार की चिंता है।
क्या सीमा पर चीन अकारण ही ऐसी गतिविधियां करने में जुटा हुआ है, जबकि वह जानता है कि उसे इन सब बातों से कुछ हासिल नहीं होने वाला, बल्कि भारत में उसके व्यापार को उल्टे घाटा ही उठाना पड़ेगा। व्यापारिक गतिविधियों के आइने में यदि इन बातों को समझा जाए तो यह सब खबरें अब भारत की तरफ से बढ़ाचढ़ा कर पेश की जा रही है। क्यों आज इस खबर को खोला गया जब भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जापान की यात्रा पर रवाना हो रहे हैं। क्योंकि जापान की चीन से इस समय व्यापार और जमीन दोनों पर विवाद चल रहा है और भारत चीन के साथ बढ़ते विवाद को दिखाकर जापान से बहुत कुछ हासिल करना चाहता हैं।
प्रधानमंत्री की जापान यात्रा में सारा जोर न्यूक्लियर एनर्जी के लिए जापान से आधुनिक तकनीक हासिल करना हैं। ऐसे में यदि जापान को यह पता चले कि भारत का चीन से सीमा पर विवाद चल रहा है और स्थितियां तनावपूर्ण है तो जापान भारत के बाजार पर अपना और अधिक नियत्रंण हासिल करने के लिए भारत को बड़ा अनुदान दे सकता है।

भारत-चीन के व्यापारिक रिश्ते
दरअसल भारत चीन और जापान दोनों के बाजार में अपनी जगह बनाना चाहता है लेकिन जिन क्षेत्रों में भारत इन देशों में आगे बढऩा चाहता है उन क्षेत्रों में इन दोनों देशों की अपनी कुछ मजबूरियां है। इस समय भारत, चीन, जापान और अमेरिका के बीच व्यापार को लेकर एक तरह की कुश्ती जारी है। जापान और अमेरिका भारत को किसी भी प्रकार चीन के साथ व्यापार को बढ़ाते नहीं देखना चाहते? भारत अपने बड़े बाजार की कीमत इन देशों से वसूलना चाहता हैं। इसलिए वह सारे हथकड़े अजमा रहा हैं।

भारत के बड़े प्रोजेक्ट
ज्ञात हो कि अमेरिका, चीन और जापान में से केवल जापान ऐसा देश है जो भारत के साथ हर साल व्यापार को लेकर वार्षिक सम्मेलन करता है। भारत में मेट्रो से लेकर तकनीकी रूप से जितने भी बड़े प्रोजेक्ट है वो जापान ही चला रहा है। जापान और चीन दोनों देशों के साथ भारत का व्यापार संतुलन ठीक नहीं है।

चीन के प्रति नाराजगी
भारत चीन के प्रति नाराजगी का भाव दिखाकर एक तरफ जहां जापान से बहुत कुछ हासिल करने की फिराक में है वहीं जापान से बढ़ती दोस्ती से चिंतित रहने वाला चीन भारत को बदले में अपने बाजार में कुछ जगह दे सकता हैं। जब चीनी प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले चीन ने घुसपैठ की और चीनी प्रधानमंत्री का दौरा खटाई में पड़ता दिखाई पड़ा तो चीन के सरकारी अखबार ने एक लाइन की टिप्पणी की थी कि जापान और अमेरिका भारत और चीन की दोस्ती नहीं देखना चाहते है।

चीन के लिये भारतीय बाजार
यूरोपीय बाजार में जबसे चीन के सामान की खपत कम हुई है तब से चीन के लिए भारत का बाजार ही आशा की किरण है और भारत अपने इस बाजार की बदौलत ही दोनों देशों से सौदेबाजी करना चाहता है। चीन से विवाद करके उसे व्यापार और सीमा विवाद दोनों में ही फायदा नजर आता है, वहीं इस विवाद को सामने रखकर वह जापान से कई सहुलियतें हासिल करना चाहता है। ऐसा तो नहीं है कि पाक की तरह चीन की सेना क्या सरकार के नियत्रंण में नहीं रह गई है कि वह यह न समझे कि उसकी एक नादानी उसके भारतीय बाजार को चौपट कर सकती है।

सरहदें ज्यादा अहम नहीं
मैं पहले भी लिख चुका हूं कि आज जमीन के छोटे से टुकड़े से व्यापार ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, चीनी सीमा पर भारत और चीन के बीच छोटी कहासुनी हर माह होती रहती है दोनों ही एक दूसरे पर परस्पर आरोप लगाते रहते है। पहले चीन ज्यादा आक्रमक होता था लेकिन पिछले तीन चार सालों में भारत ने भी इस इलाके में अपनी गतिविधियां बढ़ाई है जबसे भारत की गतिविधियां बढ़ी उसका चीन से आमने सामने टकराव होने लगा नहीं तो कई वर्षों पहले चीन सीमा पर भारत की तरफ से आक्रामक प्रेट्रोलिंग नहीं की जाती थी। चीनी सैनिक भारतीय सीमा में आते जाते रहते थे।












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