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अफजल की फांसी के बाद संसद को याद आया PoK

Government think about PoK after hanging Afzal Guru
[वीरेन्द्र सिंह चौहान] संसद पर हमले के दोषी अफजल को उसके असली मुकाम पर पंहुचाए जाने के बाद से उसे दी गई फांसी के नफे-नुकसान पर चर्चा जारी है। गली-कूचों व चौक-चौपालों से लेकर अफजलवादियों के निशाने पर रहे संसद भवन तक इस मसले पर बहुत कुछ कहा-सुना गया है।

वादी में फसादी संगबाजों, जम्मू-कश्मीर विधानसभा में उनके लिए रोने-चिल्लाने वालों और सरहद पार अफजल के सरकारी व गैर-सरकारी आकाओं तक सबने एक भारतद्रोही के अंजाम की अपने अपने अंदाज में व्याख्या की। कइयों ने इसे देश के लिए घाटे का सौदा भी करार दिया। मगर कोई कुछ भी कहे, भारतीय जन-मन को इससे जो लाभ हुए हैं और होने वाले हैं, उनके मुकाबले में फांसी से हुई छिटपुट हानियां कोई मायने नहीं रखतीं। सच मानिए,आतंक और आतंकियों के प्रति दिल्ली के हुक्मरानों के पिलपिले रवैये से आजिज आ चुके अधिकांश देशवासी अफजल की फांसी से प्रसन्न हैं।

अफजल का अंत स्वाभाविक रूप से हुआ या उसमें कहीं सत्ताधीशों के सियासी अंकगणित का भी कुछ योगदान रहा, आम हिंदुस्तानी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसके लिए यह बात सर्वाधिक संतोषप्रद है कि भारतीय प्रजातंत्र के शिखर-स्थल पर हमले का दुस्साहस करने वाले को आखिर कठोरतम सजा दे दी गई। इससे देश के दुश्मनों के लिए दिल्ली से अपेक्षाकृत कड़ा संदेश तो गया ही, आतंक व अलगाव के खिलाफ संघर्ष के मामले में जन-मन पर हावी होती मायूसी के बादलों की भी एक हद तक छंटाई हुई है।

अफजल की फांसी के बाद नफे-नुकसान के गुणा-भाग की प्रक्रिया से देश को और भी कई लाभ हुए हैं। मसलन, इस मुद्दे पर कौन क्या बोला उससे साफ हो गया कि जम्मू-कश्मीर के मोर्चे पर कौन कौन देश के साथ खड़ा है। साथ ही यह भी और स्पष्ट हुआ कि कौन सरहद पार से ऑपरेट करने वाले अफजल के आकाओं के साथ कितना जुड़ा हुआ है। हुर्रियतियों की पाक-परस्ती तो जगजाहिर थी ही, मगर महबूबा और उमर का क्रंदन उन्हें भी बेपर्दा कर गया। अरूंधती राय के अंध-देशघात का भी नया अध्याय देश के सामने आया जब उसकी लकवाग्रस्त लेखनी संसद पर हमले में शहीद हुए सुरक्षाकर्मियों के परिजनों को भूल कर इस हमले के दोषी अफजल के लिए मातम में घिसी गई।

चाल-चरित्र-चेहरा तो पूर्व वार्ताकार और पत्रकार दिलीप पडगांवकर का भी उजागर हुआ जब इस शख्स ने अफजल की फांसी को कश्मीर में शांतिवार्ता को झटका करार दिया। इनसे पूछा जाना चाहिए कि अमन के लिए अगर भारत को खंड-खंड करने का सपना देखने और दिखाने वाले अफजल को उसके कुकर्म की सजा न दी जाती तो क्या उसकी या उसके सरहद पार बैठे आकाओं की दुम सीधी हो जाती़? पड़गांवकर हकीकत अच्छी तरह जानते हैं मगर वे उसे कभी सार्वजनिक तौर पर स्वीकार नहीं करेंगें। ठीक उस तरह जैसे उन्होंने वार्ताकार-त्रयी की रिपोर्ट लिखते हुए किया था।

दरअसल, अरूंधतियों और पड़गांवकरों की कलम और वाणी उन्हें अन्न-पानी व स्याही मुहैया कराने वालों के रिमोट से नियंत्रित है और यह बात अफजल की फांसी पर उन की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर जगजाहिर कर दी। ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अफजल के जन्नत जाने से ऐसे कलम के कारोबारियों की जन्नत की हकीकत भी नए सिरे से लोगों को मालूम हुई है। इसे देश के लिए फायदेमंद बात ही कहा जाएगा।

इसी कड़ी में कहीं अधिक अहम लाभ यह हुआ है कि भारत की संसद ने एक बार फिर से यह संकल्प दोहरा दिया कि समूचा जम्मू कश्मीर, जिसमें कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला रियासत का भूभाग भी शामिल है, वह भारत का अभिन्न अंग था, है और रहेगा। इससे पूर्व 22 फरवरी 1994 को प्रधानमंत्री नरसिंम्हाराव के कार्यकाल में भारत की संसद ने इस आशय का सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया था।

1994 के संकल्प में भी पाकिस्तान से उसके अवैध कब्जे वाला जम्मू-कश्मीर का हिस्सा खाली करने के लिए कहा था। यहां सहज ही यह सवाल पूछा जा सकता है कि सन चौरानवे के संकल्प जैसा ही एक और प्रस्ताव पारित करने की भला क्या अहमियत है? इसका उत्तर यह है कि चौरानवे के संकल्प में जो कहा गया था, वह भी कोई नई खोज या बात थोडे़ ही थी। दरअसल, उस प्रस्ताव के जरिए देश के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने देश के संविधान और कानून सम्मत तथ्यों को ही एक स्वर में दोहरा कर समूची दुनिया व खासकर पड़ौसी पाकिस्तान को यह संदेश भेजा था कि जम्मू कश्मीर के सवाल पर भारत किसी भी सूरत में झुकने और अपनी वैधानिक स्थिति पर कोई समझौता करने के लिए तैयार नहीं है।

यह संदेश दुनिया की उन ताकतों के लिए भी था जो किसी से किसी तरह भारत की बाजू मरोड़कर जम्मू कश्मीर के मोर्चे पर उसे कुछ कदम पीछे हटने के लिए विवश करने की तैयारी करने लगी थीं। चौरानवे के प्रस्ताव ने जहां अपना तात्कालिक उद्देश्य पूरा कर दिया था, वहीं उसके बाद की सरकारों से देश को उम्मीद थीं कि वे उस संकल्प पर अडिग रहते हुए जम्मू कश्मीर के बारे में सोच-विचार और नीति-निर्माण करेंगी।

मगर दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह बनी कि भारत-पाकिस्तान संबंधों को नई व्याकरण और परिभाषाएं देने की चाहत अथवा अमरीका रचित पटकथाओं पर अभिनय करते हुए बाद की सरकारों ने जम्मू कश्मीर पर संसद के सन चौरानवे के संकल्प को रह रह कर नजरंदाज किया। मुशर्रफ की रहनुमाई वाले पाकिस्तान के साथ अमरीकी दबाव में जिस रोडमैप पर भारत की दूसरी पटरी की कूटनीति चल निकली थी, उसमें कहीं न कहीं पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर पर देश के दावे को छोड़ने की तैयारी हो गई थी। सौभाग्य से कथित मुशर्रफ सूत्र सतह पर नजर आने और अमल में आने से पहले ही पाकिस्तान की अंदरूनी उथल-पुथल की भेंट चढ़ गया।

इधर, दिलीप पड़गांवकर की अगुआई वाली वार्ताकार-त्रयी ने अपनी पूर्वनियोजित रिपोर्ट रूपी जो पोथी देश के सामने रखी, वह भी सन चौरानवे के संसद के संकल्प को तार-तार करती देखी जा सकती है। पाक अधिकृत कश्मीर को खाली कराने की बात करने के बजाय इस रिपोर्ट में पाकिस्तानी कब्जे को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करने वाली बोली समाहित थी। यह आजादी के बाद देश का पहला सरकारी दस्तावेज था, जिसमें पाक अधिकृत कश्मीर को पाक-प्रशासित कश्मीर कह कर अवैध कब्जाधारी पाकिस्तान को भारत के समकक्ष खड़ा करने का दुस्साहस किया गया था। हालांकि वह रिपोर्ट अब तक संसद के पटल पर विचारार्थ नहीं आई है मगर उसकी शब्दावली को घाटी के अलगाववादी मीडिया व झट से अपना लिया था।

अभिप्राय यह कि केंद्र सरकार और उसके द्वारा नियुक्त वार्ताकार किसी बड़ी योजना के तहत देश को संसद के चौरानवे के संकल्प से पीछे हटाने की तैयारी कर रहे थे। ऐसे में अफजल की फांसी के बहाने पाकिस्तानी नेशनल असेंबली का भारत विरोधी प्रस्ताव न आता तो तय मानिए कि देश की संसद देशवासियों की ओर से अपने ही चौरानवे के संकल्प को कतई दोहराने वाली नहीं थी। वार्ताकारों की देशघाती रिपोर्ट के बाद भी भारतीय संसद को अपना सामूहिक संकल्प याद नहीं आया था। लिहाजा, यह कहा जा सकता है कि अफजल की फांसी ने संसद को उसका संकल्प याद दिला दिया और उनके ख्वाबों को चकनाचूर कर दिया जो चौरानवे के प्रस्ताव को दफन करने के लिए कफन व ताबूत तैयार किए बैठे थे। किसी भी सरकार के लिए अब चौरानवे और 2013 से संसद के प्रस्तावों की अनदेखी करना आसान नहीं होगा।

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