यूपी के बुंदेलखंड में होली रही फीकी
ललितपुर। इस वर्ष होली पर कहीं भी रौनक नहीं दिखी। अधिकांश होली गढ़ों पर प्रतीक के तौर पर होलिका दहन हुआ। प्राचीन परंपरा के अनुसार होली गढ़ों से ली गई आग से ही घरों के चूल्हे जला करते थे, लेकिन पर्वो के सिकुड़ते दायरे में प्राचीन परंपराएं दम तोड़ रही हैं।
रंगों के इस त्योहार के पीछे कृष्ण भक्ति भी छिपी है। यह बुंदेली लोक संस्कृति का प्रतीक मानी जाती है। इस पर्व पर हुरियारे बुंदेली परंपरा के अनुसार कीचड़, गोबर की होली खेलने के साथ-साथ ढिमरियाई, फाग आदि बुंदेली लोक गीतों का गायन करते थे। भांग के नशे में मस्त हुरियारों की गोटें देर रात तक जमी रहती थीं। अब पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में प्राचीन परंपराएं विलुप्त होती जा रही हैं।
इस वर्ष का हाल यह रहा कि अनेक होली गढ़ाओं में सन्नाटा पसरा रह गया। पहले इन स्थानों पर सबसे ऊंची होली जलाने की होड़ मची रहती थी। युवक एक माह पूर्व से ही तैयारियों में जुट जाते थे। कुछ स्थानों पर चंदे से बाजार से जलावन खरीद कर प्रतीकात्मक होलिका का दहन किया गया। नगर के प्रमुख बाजारों में सजी रंगों व पिचकारियों की दुकानों पर सिर्फ बच्चे ही खरीदारी करते दिखे।
होली का उत्साह हरने में महंगाई की भी भूमिका रही। लोगों के पास इतना पैसा नहीं कि उल्लास के साथ त्योहार मनाया जा सके। खरीदारी से लेकर पर्व पर बनने वाले पकवानों पर भी महंगाई का असर दिखाई दिया।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।













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