डीएमके की मांग, सरकार के लिये आगे 'कुआं' और पीछे 'खाई'
नयी दिल्ली (ब्यूरो)। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने मंगलवार को श्रीलंका मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) और केंद्र सरकार से नाता तोड़ लिया। डीएमके चीफ एम करुणानिधि ने साफ कह दिया है कि वो यूपीए को बाहर से भी समर्थन नहीं करेंगे। ऐसे में मनमोहन सरकार मुश्किल में पड़ गई है। आगे कुआं और पीछे खाई जैसी कहवात केंद्र सरकार पर सटीक बैठ रही है क्योंकि अगर वो डीएमके की बात मानती है तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी खासा किरकिरी होगी। मगर बात नहीं मनती है तो डीएमके के समर्थन से उसे हाथ धोना पड़ जायेगा और सरकार गिरने का खतरा भी।
आपको बताते चलें कि डीएमके चाहता है कि केंद्र सरकार संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के उस प्रस्ताव का समर्थन करे जिसमें अमेरिका ने श्रीलंका में एलटीटीई के खिलाफ हुए युद्ध में मानवाधिकारों के उल्लंघन की अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की है। इसके अलावा भारत चाहता है कि भारत की संसद में भी एक प्रस्ताव पास कर श्रीलंका की इसके लिए आलोचना की जाए। डीएमके इन दोनों मांगों को सरकार के लिये मानना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है। ऐसा इसलिये भी है क्योंकि भारत की यह घोषित नीति रही है कि वो दूसरे देशों के मामले में कतई हस्तक्षेप नहीं करता है।

डीएमके की मांग मानना इस नीति का उल्लंघन होगा क्योंकि यह श्रीलंका के अंदरूनी मामलों में दखलअंदाजी के तौर पर देखा जायेगा। अभी हाल की ही बात करें तो आतंकी अफजल गुरु की फांसी को लेकर पाक संसद में पारित प्रस्ताव का भारत ने कड़ा विरोध किया था और संसद में जमकर हंगामा हुआ था। भारत ने यह साफ कर दिया था कि उसके अंदरूनी मामलों में किसी दूसरे देश की दखलअंदाजी कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी। लेकिन अब अगर भारत की वही संसद श्रीलंका के अंदरूनी मामलों पर प्रस्ताव पास करेगी तो ये अपने आप में अजीब होगा। दूसरी ओर अगर संयुक्त राष्ट्र में भारत अमेरिकी प्रस्ताव का समर्थन करता है तो हो सकता है कि कोई अन्य देश कश्मीर के मुद्दे पर जांच का ऐसा ही प्रस्ताव यूएन में लाकर भारत के लिए मुश्किलें खड़ी कर दे। ऐसे में साफ है कि डीएमके की किसी भी मांग को केंद्र सरकार मानने की स्थिति में नहीं है। फिलहाल वो बीच का रास्ता निकालने में लग गई है।
डीएमके के कदम के बाद कांग्रेस कोर कमेटी की बैठक
केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार से श्रीलंका मुद्दे पर मंगलवार को द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के अलग हो जाने के बाद कांग्रेस कोर समूह की यहां बैठक हुई। कोर समूह में संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस के तमिलनाडु मामलों के प्रभारी गुलाम नबी आजाद, केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ तथा केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे शामिल हैं।
डीएमके के संप्रग से अलग होने पर शेयर बाजार लुढ़का
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएके) के श्रीलंका मुद्दे पर कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) और इसकी केंद्र सरकार से अलग होने की घोषणा के कुछ ही देर बाद मंगलवार को शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। बम्बई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का 30 शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक सेंसेक्स मंगलवार को तेजी के साथ 19,345.91 पर खुला था, लेकिन समर्थन वापसी की घोषणा के तुरंत बाद यह 400 से अधिक अंकों की गिरावट के साथ 18,939.47 के स्तर पर पहुंच गया।
सेंसेक्स में अस्थिरता देखी गई तथा दोपहर से कुछ समय पहले सेंसेक्स 226.95 अंकों यानी 1.18 फीसदी की गिरावट के साथ 19,066.25 के स्तर पर कारोबार करता देखा गया। डीएमके के लोकसभा में 18 सांसद हैं, और इसके पांच सांसद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल हैं। डीएमके संसद में एक ऐसा प्रस्ताव पारित कराने की मांग कर रही है, जिसमें कहा जाए कि श्रीलंका में तमिलों का जनसंहार हुआ था।












Click it and Unblock the Notifications