NDA नहीं AGENDA ही दिला सकता है सत्ता

भारतीय जनता पार्टी अब क्या करेगी? किस राह जाएगी? किसे छोड़ देगी और किसे अपनाएगी? भावी रणनीति क्या होगी? जितने सवालों से भारतीय जनता पार्टी आज घिरी है, शायद पहले कभी नहीं घिरी थी, लेकिन 33 साल के अपने राजनीतिक सफर में यदि भाजपा इतने सवालों से घिरी है, तो इन सवालों के जवाब भी उसे अपने में ही खोजने हैं।

किसी भी व्यक्ति या पार्टी के लिए आम तौर पर आत्ममंथन का दौर हार के बाद होता है, लेकिन भाजपा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती AGENDA और NDA में से किसी एक को चुनने की पैदा हुई है। भाजपा के लिए इस चुनौती का बीज वैसे तो NDA के गठन के साथ ही पड़ गया था, जो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में अंकुर के रूप में फूटा और सत्ता के रूप में वटवृक्ष तक बन गया।

देश को कांग्रेस शासन से दूर रखने के सिद्धांत पर भाजपा ने AGENDA को दरकिनार किया और उसमें से AGE लुप्त होकर NDA का गठन किया। मूल एजेंडे से दुराव बनाए रखते हुए भाजपा 2009 में भी ‘AGE'less एजेंडा यानी NDA के साथ ही चुनाव मैदान में उतरी, लेकिन सत्ता उसे हासिल नहीं हुई। आज भाजपा फिर दोऱाहे पर है और उस पर NDA की चिंता किए बिना राम मंदिर, हिन्दुत्व, समान नागरिक संहिता, कश्मीर की धारा 370 जैसे मुद्दों से युक्त यानी ‘AGE'ness एजेंडा यानी AGENDA पर लौटने का दबाव पैदा हुआ है और इस पूरे दबाव की धुरि बने हैं नरेन्द्र मोदी।

वैसे देखा जाए, तो कुंभ से लेकर संघ तक, गांधीनगर से लेकर दिल्ली तक और आम जनता से लेकर बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों और उद्योगतियों तक चल रहे इस पूरे घटनाक्रम और ऊहापोह में मोदी तो मात्र निमित्त बने हैं। भाजपा को शायद याद नहीं है कि 1980 में अपने अस्तित्व के बाद उसने पहली बार 1984-85 के लोकसभा चुनाव में हिस्सा लिया था और पहले चुनाव में पूरा देश जानता है कि एक तरफ इंदिरा गांधी की हत्या से कांग्रेस के प्रति उपजी सहानुभूति की जबर्दश्त लहर थी, तो दूसरी तरफ लोगों को यह भी इल्म था कि भाजपा संघ समर्थित उसी जनसंघ का नया रूप है, जो हिन्दुत्ववादी विचारधारा को समर्पित है। इसके बावजूद भाजपा को अपने उस पहले चुनाव में 2 सीटें मिली थीं और 1996 में पहली बार तेरह दिन, 1998 में दूसरी बार तेरह महीनों के लिए तथा तीसरी बार 1999 में तीसरी बार स्थायित्व के साथ सत्ता में आई भाजपा की सीटों की संख्या 182 तक पहुँच गई थी। ये 182 सीटें भाजपा ने अपने मूल AGENDA के जरिए ही प्राप्त की थी। उस समय NDA का कोई नामोनिशान नहीं था।

NDA तो चुनाव के बाद बना। यदि भाजपा को उसका मूल एजेंडा 182 सीटों तक पहुँचा सकता है, तो फिर उस एजेंडा में यदि नरेन्द्र मोदी रूपी तड़का लग जाए, तो क्या भाजपा 200 के आँकड़े को आसानी से पार नहीं कर सकती? मोदी का तड़का लगने से भाजपा के एजेंडे पर तो कोई फर्क पड़ना नहीं है। उनके जुड़ने से जो कुछ बिगड़ने की आशंका है, वह है NDA का बिखराव, लेकिन एक सकारात्मक पहलू यह भी देखा जा सकता है कि मोदी का तड़का उल्टे भाजपा के मूल एजेंडे को विकास के जरिए उदारता प्रदान करेगा, जिसका उदाहरण गुजरात में ताजा विधानसभा चुनाव में अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से भी भाजपा को वोट दिया जाना है। भाजपा ‘AGE'less NDA की चिंता कर रही है, जबकि उसे मोदी प्रेरित नए ‘AGE' और ‘NDA' दोनों को साथ रख कर चलने वाले एक नए गठबंधन की ओर बढ़ना चाहिए। और इस बात में कोई संदेह नहीं कि मोदी के नेतृत्व में जनता दल युनाइटेड यानी नीतिश कुमार भले न आएँ, लेकिन लोकतंत्र के महासमर रूपी चुनावी समर में हर वह दल और उम्मीदवार को जीत की आकांक्षा के साथ ही कूदता है, वह तो निश्चित रूप से मोदी के साथ आएगा। जब जीत की पक्की गारंटी होगी, तो फिर राजनीतिक दलों और नेताओं तथा नए गठबंधनों के खड़े होने में कोई विघ्न या बाधा नहीं रह जाएगी।

दरअसल भाजपा एक अलग पार्टी के रूप में यदि अपनी पहचान रखती है, तो उसका कारण उसका AGENDA है, NDA नहीं। इसीलिए भाजपा को अपने इस AGENDA को मोदी की विराट-विकास-हिन्दुत्व-सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद को समर्पित विचारधारा के साथ नए अवतार में और सर्वस्वीकार्य रूप में आगे बढ़ाना चाहिए। मोदी की इस विचारधारा में वह सामर्थ्य है कि वे विश्व हिन्दू परिषद्, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, मुस्लिम समुदाय सहित हर वर्ग को संतुष्ट करते हुए एक भव्य राम मंदिर का निर्माण करवा सकते हैं, तो अपने दावे के मुताबिक अमरीकी वीजा से महरूम रहते हुए भी अमरीका के लोगों को भारत का वीजा लेने के लिए कतार में खड़ा कर सकते हैं। उन्हें यह सामर्थ्य दिखाने का अवसर भर मिलना चाहिए। उनकी वाणी का प्रभाव देश पर इसलिए पड़ता है, क्योंकि वह वाणी आचरणयुक्त है।

कुल मिला कर भाजपा के पास यह एक स्वर्ण अवसर है कि वह अपने मूल एजेंडे पर लौट भी सकती है और मोदी जैसी स्वर्णि सीढ़ी भी उसके समक्ष उपलब्ध है।

सत्ता गौण, लक्ष्य मुख्य

भाजपा ने जब अपने मूल एजेंडे के साथ एक पार्टी के रूप में अपनी शुरुआत की, तब भी वह अच्छी तरह जानती थी कि जिस एजेंडे यानी लक्ष्य को लेकर वह चल रही है, उसके जरिए सत्ता आसानी से नहीं पाई जा सकती या यूँ कहें कि शायद भाजपा ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वह सत्ता में आ भी जाएगी, लेकिन उस मुँहाने तक पहुँचाने वाला वह एजेंडा ही था। यदि भाजपा थोड़ा और इंतजार करती। जैसा कि उसने 1999 तक सत्ता को गौण और लख्य को प्राथमिकता दे रखी थी, वह बाद में भी अपने लक्ष्य पर कायम रहती,तो शायद NDA के नाम पर उसे AGENDA न छोड़ना पड़ता और लक्ष्य मुख्यता बनी रहती, तो कभी न कभी तो शुद्ध बहुमत रूपी सफलता मिलती।

इतिहास गवाह है भाजपा की स्थापना 6 अप्रेल, 1980 को हुई थी। भाजपा अपने सिद्धांतों के कारण अन्य पार्टियों से अलग उभर कर लोगों के सामने आई। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, मुस्लिम तुष्टीकरण का विरोध, समान नागरिक संहिता लागू करने और जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को हटाने जैसे मुद्दे देश के बहुसंख्यक वर्ग को प्रभावित करने में कामयाब रहे और 1984 में 2 सीटें हासिल करने वाली भाजपा 1991 में 120 सीटों तक पहुंच गई, लेकिन नब्बे के दशक में सत्ता की दौड़ में खुद को जोडऩे के लिए भाजपा धीरे-धीरे अपने एजेंडे से पीछे हटती गई। उसे इसका फायदा हुआ भी।

वह एक बार सत्ता तक पहुंच भी गई, लेकिन जहां तक एजेंडे का सवाल है, तो भले ही भाजपा अपने एजेंडे को पीछे छोड़ती रही, लेकिन एजेंडे ने उसका पीछा कभी नहीं छोड़ा। यही कारण है कि 1996 में वाजपेयी सरकार 13 दिन और 1998 में 13 माह तक ही चल पाई। भाजपा ने सत्ता की खातिर अपने एजेंडे से पीछा छुड़ाना चाहा और वह 1999 के चुनाव में देश में सबसे बड़ी पार्टी बन कर भी उभरी। इस चुनाव में उसे 182 सीटें मिलीं, लेकिन वह भूल गई कि 2 से 182 तक के इस सफर में कहीं न कहीं उस एजेंडे का भी योगदान है, जिसके चलते देश में उसका अपना एक परम्परागत वोट बैंक है। यह सही है कि अपने एजेंडे से पीछे हटने पर भाजपा के कारवाँ में नए मतदाता जुड़े, लेकिन पुराने परम्परागत मतदाता इस उम्मीद के साथ भाजपा के साथ थे कि भाजपा अपने एजेंडे पर लौटेगी। सत्ता की दौड़ में भाजपा ने अपने एजेंडे के साथ एक के बाद एक समझौते किए और उसके परम्परागत मतदाताओं का भरोसा उठने लगा। यही कारण है कि भाजपा की सीटें लगातार घटती जा रही हैं।

एनडीए की छाया से निकलने की जरूरत

आज भाजपा 22 साल पुरानी स्थिति में लौट आई है। 1991 में भाजपा को 120 सीटें मिली और गत चुनाव 2009 में 116 सीटें हासिल हुई यानी 182 तक पहुंची भाजपा 2004 में 138 सीटों से होते हुए आज फिर 116 पर सिमट गई है। देखा जाए, तो भाजपा की स्थिति 2009 के मुकाबले 1991 में बेहतर थी, क्योंकि उस चुनाव में भाजपा अपने एजेंडे के साथ मजबूत नीति और निर्णायक नेतृत्व के बूते मतदाताओं के पास गई थी और मतदाताओं ने उसे 120 सीटें दी थीं। आज जब भाजपा अपने
एजेंडे को कहीं पीछे छोड़ चुकी थी, तब मतदाताओं ने उसे दो दशक पुरानी स्थिति में ला खड़ा कर दिया।

दरअसल भाजपा को राष्ट्रीय दल के रूप में स्थापित करने में जहां उसके मूल एजेंडे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वहीं सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने में सबसे बड़ी परेशानी भी इसी एजेंडे ने पैदा की। भाजपा एजेंडे से पीछे तो हटती रही, लेकिन न तो वह इस एजेंडे को कभी छोड़ पाई और न ही उसे लागू करने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ी, लेकिन भाजपा के पास फिर एक बार मजबूत नीति और निर्णायक नेतृत्व उपलब्ध है। भाजपा को चाहिए कि वह अपने मूल एजेंडे पर मजबूत नीति और निर्णायक नेतृत्व के साथ आगे बढ़े। आज जब एनडीए के घटक दल भाजपा के साथ अपनेफायदे-नुकसान की बात सोच सकते हैं, तो भाजपा को भी उतने ही अधिकार के साथ एनडीए को
लेकर आगे चलने में अपने फायदे-नुकसान के बारे में सोचना चाहिए।

मजबूती से आगे बढ़े

दरअसल भाजपा को अपने एजेंडे को लेकर संकोच करने की नहीं, बल्कि उसे मजबूती के साथ लोगों के बीच प्रस्तुत करने की जरूरत है। उसे खुल कर अपने एजेंडे, विचारधारा और सिद्धांतों के साथ आगे आना चाहिए। यही सुदृढ़ता उसे उसके लक्ष्य तक पहुंचने में सहायता करेगी। यह सही है कि विरोधी दल अक्सर भाजपा के एजेंडे को साम्प्रदायिकता के रंग में रंगते हैं, लेकिन भाजपा को मतदाताओं के बीच यह विश्वास पैदा करना होगा कि वह कट्टरवाद की समर्थक नहीं है।

वह भी उसी भारतीय संविधान के दायरे में हर काम करना चाहती है, जो अन्य दल करते हैं। फिर भले ही अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने की बात हो या फिर हिन्दुत्व की। 120 करोड़ की इस आबादी में बहुसंख्यक हिन्दुत्व की भलाई के लिए यदि वह सोचती है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। हालांकि वह अल्पसंख्यकों का नुकसान नहीं करना चाहती। हिन्दुत्व को जब स्वयं उच्चतम न्यायालय जीवनशैली करार दे चुका है, तो फिर भाजपा को संकोच या आशंका रखने की जरूरत क्या है। समान नागरिक संहिता को भले ही इस देश में अपने-अपने राजनीतिक नफे-नुकसान की दृष्टि से देखा जाए, लेकिन यह भी सही है कि स्वयं उच्चतम न्यायालय इसे लागू करने की मंशा जता चुका है।

इतने ठोस मुद्दों और मोदी जैसे सक्षम नेतृत्व के साथ यदि भाजपा मतदाताओं के बीच जाएगी, तो 2014 क्या, तो 2019 में भी देश पर शासन उसी का होगा और तब भाजपा को किसी एनडीए की जरूरत ही नहीं होगी।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+