जगन्नाथ पुरी- आस्था नहीं पंडों की कमाई का गढ़
लखनऊ। हिन्दुओं की आस्था का एक केन्द्र भगवान जगन्नाथ की जगन्नाथ पुरी। 10वीं शताब्दी में निर्मित यह प्राचीन मन्दिर चार धामों में से एक धाम है। इस मंदिर में आने वाले लोगों के अंदर भगवान जगन्नाथ के प्रति अटूट आस्था देखी जाती है, लेकिन मंदिर के अंदर व आस-पास रहने वाले लोग इस आस्था पर हावी होकर गाढ़ी कमाई का खेल खेल रहे हैं।
सच पूछिये तो जगन्नाथ मन्दिर आज पंडों के व्यवसाय का एक माध्यम बनकर रह गया है। देश के विभिन्न हिस्सों से भक्त भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने आते हैं लेकिन यहां आकर वह खुद को ठगा सा महसूस करते हैं। कदम-कदम पर लूट और पण्डों द्वारा पैसों की मांग, मांग नहीं वसूली अधिक लगती है जो भक्तों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रही है। आश्चर्य तो इस बात का है कि भगवान जगन्नाथ पर चढ़ाया जाने वाला महाप्रसाद भी बजार में बिक रहा है।
Photo Feature- हर तस्वीर के साथ जरूर पढ़ें क्या होता है पुरी में।

मंदिर की कथा भाग-1
इतिहासकारों के अनुसार मन्दिर का निर्माण राजा इन्द्रद्विमुना ने कराया। उसे स्वप्न में भगवान ने दर्शन देकर मन्दिर निर्माण की आज्ञा दी थी। उसने मन्दिर का निर्माण तो करवा दिया लेकिन मन्दिर के भीतर रखी जाने वाली प्रतिमाओं के बारे में वह निर्णय नहीं ले सका। ब्राह्मïणों ने कई प्रकार की प्रतिमाओं की स्थापना के सुझाव दिए लेकिन वह संतुष्ट नहीं हुआ।
इसी प्रकार करते-करते कई वर्ष बीत गए लेकिन वह प्रतिमाओं को अन्तिम रूप नहीं दे पाया। एक दिन राजा को पुन: स्वप्न आया और ईश्वर ने उसे निर्र्देश दिया कि वह समुद्र के किनारे-किनारे जाए तो प्रतिमाओं के बारे में निर्णय लेने की राह मिल जाएगी। उसने ऐसा ही किया। राह में एक सन्यासी मिला और उसने कहा कि आगे जाओं दो लोग मिलेंगे जो मूर्ति के निर्माण में तुम्हारी मदद करेंगे। राजा आगे गया तो उसे दो लोग मिले जो पेशे से बढ़ई थे। उन्होंने राजा की इच्छा जानने के बाद मदद का आश्वासन दिया और कहा कि वह एक वृक्ष लाकर उन्हें दे तो वह मूर्ति बना देंगे।
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मंदिर की कथा भाग-2
वृक्ष मिलने के बाद उन्होंने राजा से कहा कि वह जाए और जब मूर्ति पूर्ण हो जाएगी तो वह लोग मूर्ति लेकर राजा के पास आ जाएंगे। दिन बीतने लगे लेकिन मूर्तिकार मूर्ति लेकर नहीं आए। काफी समय बीत जाने के बाद भी जब वह नहीं आए तो राजा की बेचैनी बढ़ी और मना करने के बावजूद राजा मूर्तिकारों के घर पहुंच गया। राजा को देखकर मूर्तिकार भड़क गए और आधी अधूरी मूर्ति छोड़कर चले गए।
मूर्ति के हाथ और पैर नहीं बने थे तथा उनका आकार भी समझ में नहीं आ रहा था। राजा को बहुत निराशा हुई और वह राजमहल लौट गया। रात में राज को स्वप्न आया कि जो भी है वह उचित है और इन्हीं मूर्तियों की स्थापना मन्दिर में करा दो। राजा ने मूर्तियों की स्थापना तो करा दी लेकिन उसे भय सता रहा था कि लकड़ी की मूर्तियां अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रहेंगी और उनका क्षरण हो जाएगा। इसके लिए ब्राह्मïणों ने सलाह दी कि प्रत्येक 12 वर्ष बाद मूर्तियों को बदल दिया जाएगा। तब से यह परम्परा चली आ रही है। बारह वर्षों में मूर्तियों को बदल दिया जाता है।
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दीवारों पर राजा के निशान
इस भव्य विशाल व पौराणिक मन्दिर के निर्माण में राजा व शिल्कारों की कुण्डा के दर्शन होते हैं। मन्दिरों की दीवारों पर काम की विभिन्न मुद्राएं दर्शाती हैं कि उस वक्त के लोग मन्दिर जैसे पूजा स्थलों को भी काम से अलग कर नहीं देखते हैं। काम कला की ऐसी मुद्राएं भी हैं जो किसी उत्पीडऩ से कम नहीं जिससे पता चलता है कि उस वक्त के शिल्पकार कितने कुण्डित थे। दीवारों पर कुछ स्थानों पर देवियों की आकृति उकेरी गयी हैं परन्तु ऊपर की पंक्ति में काम कला का चित्रण किया जाना बताता है कि राजाओं की मानसिकता किस प्रकार की थी। कई स्थानों पर काम कला की ऐसी मुद्राएं दिखायी देती हैं जो खजुराहों के मन्दिरों की याद दिलाती है।
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अंदर-बाहर पंडों का आतंक
वैसे तो हिन्दुओं के सभी प्राचीन मन्दिरों में पण्डों का वर्चस्व हैं लेकिन जगन्नाथ पुरी में यह वर्चस्व आतंक का रूप ले चुका है। मन्दिर परिसर में प्रवेश करते ही पंडे भक्तों को घेर लेते हैं। तन पर सफेद धोती और मुंह में पान। पण्डों की पहचान है जो भक्त को भक्त नहीं धनपशु समझते हैं। पूजा के नाम पर कदम-कदम पर पंडे भक्तों से पैसे लेते रहते हैं। मुख्य मन्दिर के चारों ओर छोटे-छोटे मानव निर्मित मन्दिर बने हैं और सभी जगहों पर भक्तों से जबरन पैसा चढ़वाया जाता है। भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के सम्मुख मिलने वाली तुलसी से लेकर द्वार पर वितरित हो रहे चरणामृत तक सभी जगहों पर पंडे भक्तों से हाथ पकड़कर पैसा मांग रहे हैं। मुख्य मन्दिर में प्रवेश करने पर पंडे भक्तों को भगवान जगन्नाथ की छड़ी छुआते नहीं बल्कि मारते हैं और इसके बदले उन्हें पैसा चाहिए। पैसा न मिलता देख छड़ी की चोट बढ़ा दी जाती है।
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आर्शीवाद से लेकर प्रसाद तक तब बिकता है
आम तौर पर हिन्दू धर्म के अनुयायी जानते हैं कि भगवान के मन्दिर जाने पर उन्हें प्रसाद मिलेगा लेकिन जगन्नाथ मन्दिर में ऐसा नहीं है। यहां तो प्रसाद खरीदना पड़ रहा है। प्रत्येक दिन अलग कीमत का प्रसाद। भगवान जगन्नाथ को प्रतिदिन छप्पन भोग का प्रसाद लगता है और उसके बाद वही प्रसाद बाजार में बिक्री के लिए रख दिया जाता है। गौरतलब है कि मन्दिर की प्राचीर पर ध्वज लगाए जाते हैं जिन्हें प्रतिदिन शाम को बदल दिया जाता है। उतारे हुए ध्वजों की भी बाजार सज जाती है और प्रत्येक ध्वज 100 में बिक्री के लिए रख दिया जाता है। ध्वजों को बदलने व बिक्री करने का अधिकार भी एक सिर्फ एक ही परिवार के पास है और उसके परिवार के सदस्य मन्दिर की प्राचीर पर चढ़ते हैं ध्वज बदलते हैं और उन्हें बेचते हैं। देखने और सुनने में यह सबकुछ अजीब लगता है लेकिन हकीकत में यह सबकुछ हो रहा है जो हमारी आस्था पर एक बड़ी चोट है।
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गंदगी एक बड़ी समस्या
हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों की एक बड़ी समस्या गंदगी हो गयी है यदि दक्षिण भारत के कुछ मन्दिरों को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो सभी जगह गंदगी का साम्राज्य है। हिन्दुओं की आस्था के चार प्रमुख केन्द्रों में से एक जगन्नाथ धाम यहां भी गंदगी का ही बोलबाला है। इसके लिए सिर्फ और सिर्फ मन्दिर के पंडे ही जिम्मेदार हैं जो दिन भर पान की पीक से मन्दिर की दीवारों और कोनों को लाल किया करते हैं। गंदगी को छिपाने के लिए प्रशासन ने चूने का प्रयोग तो किया है लेकिन मन्दिर परिसर का प्रत्येक कोना यह बताता है कि पंडे सिर्फ यहां आकर अपना व्यवसाय करते हैं उन्हें आस्था, भक्ति व स्तुति से कोई सरोकार नहीं। उसे मन्दिर परिसर में जहां भक्त बैठकर प्रसाद ग्रहण करता हैपरिक्रमा करता है वहीं पंडे पान की पीक उगलते रहते हैं।
पुरी रेलवे स्टेशन से मात्र छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित भगवान जगन्नाथ के इस मन्दिर में सिर्फ और सिर्फ हिन्दू ही प्रवेश कर सकते हैं। ऐसा क्यों है इसका जवाब जगन्नाथ जी मंदिर सूचना केन्द्र के पास भी नहीं हालांकि पंडे जरूर अपने-अपने तरीके से इस प्रश्न का उत्तर दे देते हैं। भगवान जगन्नाथ विष्णु के अवतार यानि कृष्ण स्वरूप हैं। भगवान जगन्नाथ के साथ सुभद्रा व बलभद्र भी मन्दिर के गर्भगृह में विराजमान हैं। तीनों में से किसी के भी हाथ व पैर नहीं है इसके लिए भी तमाम कथाएं पण्डों के मुख से सुनायी देती हैं।
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