मीडिया की गाइडलाइन नहीं, पत्रकार खुद तय करें अपनी लक्ष्मण रेखा: कोर्ट

चीफ जस्टिस कपाडिया की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने लंबित अदालती मामलों खासकर आपराधिक मामलों की रिपोर्टिंग पर लंबे समय तक रोक लगाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया। हालंकि कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी मामले में पीडि़त पक्ष के आग्रह पर थोड़े समय के लिये रिपोर्टिंग पर रोक लगाई जा सकती है। कोर्ट ने पत्रकारों को भी हिदायत दी कि उन्हें अपनी लक्ष्मणरेखा पता होनी चाहिए, ताकि कोर्ट की अवमानना के मामले न झेलने पडे। हालांकि न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि किसी मामले में पीड़ित पक्ष के आग्रह पर कुछ समय के लिए रिपोर्टिंग पर रोक लगाई जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी खबर पर रोक लगाने का काम सिर्फ हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को क्राइम पर मीडिया के कोर्ट रिपोर्टिग पर अपने आदेश में कि अनुच्छेद 19-1 ए (बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) पूर्ण अधिकार नहीं है, और इसके लिए कुछ दायरे हैं। मालूम हो कि न्यायमूर्ति डी पी जैन, न्यायमूर्ति एस एस निज्जा, न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई और न्यायमूर्ति जे एस केहर संविधान पीठ के अन्य सदस्य हैं।












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