Punjab Politics: सरपंच से देश के सबसे युवा CM बनने तक, प्रकाश सिंह बादल कैसे बने पंजाब के मुख्यमंत्री?
Punjab Politics: पंजाब की राजनीति में कई बड़े नाम आए और गए, लेकिन एक नाम ऐसा रहा जो करीब सात दशक तक सत्ता, संघर्ष और सियासत के केंद्र में बना रहा। यह नाम था प्रकाश सिंह बादल का। राजनीति में उनकी यात्रा किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रही।
एक गांव के सरपंच से शुरुआत कर उन्होंने पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। इतना ही नहीं, 43 साल की उम्र में देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने और 90 साल की उम्र में मुख्यमंत्री पद छोड़कर सबसे बुजुर्ग मुख्यमंत्री होने का रिकॉर्ड भी अपने नाम कर गए।

आज 'किस्सा कुर्सी दा' में कहानी उस नेता की, जिसे पंजाब की राजनीति का 'भीष्म पितामह' कहा जाता है। आइए समझते हैं कि कैसे एक आम गांव का लड़का पंजाब की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बन गया...
Youngest Punjab CM Parkash Singh Badal: लाहौर से पढ़ाई और सिविल सर्विस छोड़ राजनीति में एंट्री
प्रकाश सिंह बादल का जन्म 8 दिसंबर, 1927 को पंजाब के बठिंडा जिले के अबुल-खुराना गांव में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई के दिनों में वे अपने स्कूल जाने के लिए घोड़े की सवारी किया करते थे। आगे की पढ़ाई के लिए वे लाहौर (अब पाकिस्तान में) चले गए और वहां के फॉरमैन क्रिश्चियन कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली।
बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रकाश सिंह बादल अपनी जवानी के दिनों में पंजाब सिविल सर्विस (PCS) के अधिकारी बनना चाहते थे। लेकिन उस दौर के बड़े अकाली नेता ज्ञानी करतार सिंह के संपर्क में आने के बाद उनका मन बदल गया और उन्होंने राजनीति की राह चुन ली।
राजनीतिक सफर की शुरुआत: सरपंच से कैसे बने पंजाब के मुख्यमंत्री?
साल 1947 में देश की आजादी के साथ ही प्रकाश सिंह बादल का राजनीतिक सफर शुरू हुआ। वे अपने पिता की तरह सबसे पहले अपने गांव 'बादल' के सरपंच चुने गए। इसके बाद उनकी राजनीतिक गाड़ी तेजी से आगे बढ़ी। 1957 वे पहली बार कांग्रेस और अकाली दल के साझा गठबंधन के तहत कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। हालांकि, वे हमेशा कांग्रेस के कट्टर आलोचक रहे और बाद में अकाली दल को मजबूत करने में जुट गए।
1970 का साल पंजाब की राजनीति में बड़ा मोड़ लेकर आया। अकाली दल की सरकार थी और पार्टी के भीतर मतभेद बढ़ रहे थे। राज्यसभा चुनाव में पार्टी उम्मीदवार की हार के बाद हालात ऐसे बने कि तत्कालीन मुख्यमंत्री जस्टिस गुरनाम सिंह को हटाना पड़ा।
तब अकाली दल नेतृत्व ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने इतिहास बना दिया। सिर्फ 43 साल के प्रकाश सिंह बादल को पंजाब का मुख्यमंत्री बना दिया गया। उस समय वे भारत के किसी भी राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री थे। यहीं से शुरू हुई बादल युग की असली कहानी।
पांच बार संभाली पंजाब की कमान: बने अनोखे रिकॉर्ड
प्रकाश सिंह बादल ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कुल 5 बार पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली:
- पहली बार: 1970 से 1971 तक (सबसे युवा सीएम)
- दूसरी बार: 1977 से 1980 तक (आपातकाल के बाद)
- तीसरी बार: 1997 से 2002 तक (पहली बार 5 साल का कार्यकाल पूरा किया)
- चौथी बार: 2007 से 2012 तक
- पांचवीं बार: 2012 से 2017 तक
जब 2017 में उनका पांचवां कार्यकाल पूरा हुआ, तब उनकी उम्र 90 साल थी। इस तरह उनके नाम भारत के सबसे बुजुर्ग मुख्यमंत्री होने का रिकॉर्ड भी दर्ज हो गया।

आपातकाल में जेल गए प्रकाश सिंह बादल
अकाली दल का इतिहास हमेशा से आंदोलनों और संघर्षों का रहा है। प्रकाश सिंह बादल भी इसमें पीछे नहीं रहे। जब 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (Emergency) लागू हुआ, तो इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए अकाली दल ने जो पहला जत्था भेजा, उसमें प्रकाश सिंह बादल शामिल थे।
BBC की रिपोर्ट के मुताबिक- वे 19 महीने तक जेल में रहे, जो उनकी जिंदगी का सबसे लंबा जेल का समय था। अलग-अलग आंदोलनों और मोर्चों के कारण वे अपने जीवन में कई बार जेल गए। उनके समर्थक तो उन्हें नेल्सन मंडेला के बाद सबसे ज्यादा जेल काटने वाला नेता बताते थे और उनके लिए नोबेल शांति पुरस्कार तक की मांग कर चुके थे।
जब विरोधियों के लिए खुद लगवा दिए तंबू
प्रकाश सिंह बादल अपनी गजब की राजनीतिक समझ और शांत स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उनके विरोधी भी उनकी इस कला के मुरीद थे। उनके अंतिम कार्यकाल के दौरान जब विपक्षी पार्टी कांग्रेस और बाद में आम आदमी पार्टी के नेता उनके सरकारी आवास के बाहर धरना देने पहुंचे, तो बादल साहब ने गुस्सा होने के बजाय एक अनोखा कदम उठाया। उन्होंने धरने पर बैठे नेताओं के लिए खुद अपने खर्च पर तंबू लगवा दिए, उनके खाने-पीने का इंतजाम करवाया और खुद गेट पर जाकर उनसे बातचीत की। इस व्यवहार ने उनके विरोधियों को भी निरुत्तर कर दिया था।
बेअदबी कांड ने बदल दी राजनीति
2015 के दौरान पंजाब में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं ने अकाली दल सरकार को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। सिख समुदाय के एक बड़े वर्ग में नाराजगी बढ़ी और विपक्ष ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। यहीं से अकाली दल की राजनीतिक जमीन कमजोर पड़ने लगी। साल 2002 में जब कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार आई, तो बादल परिवार पर आय से अधिक संपत्ति के गंभीर आरोप लगे। हालांकि, सालों चली जांच के बाद अदालत में आरोप साबित नहीं हो सके और सबूतों की कमी के कारण वे बरी हो गए।
प्रकाश सिंह बादल ने भले ही पारंपरिक सिख राजनीति से शुरुआत की थी, लेकिन पंजाब में सत्ता हासिल करने के लिए उन्होंने भाजपा के साथ मजबूत गठबंधन किया, जिसे वे अक्सर 'नाखून और मांस का रिश्ता' बताते थे। हालांकि, बाद में किसान आंदोलनों के चलते यह रिश्ता भी टूट गया। प्रकाश सिंह बादल गांव को राजनीतिक पंडित पंजाब की राजनीति का बड़ा रणनीतिकार मानते हैं। यह सच है कि पंजाब की राजनीति का इतिहास प्रकाश सिंह बादल के बिना अधूरा माना जाएगा।














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