छोटे शहरों के लोगों पर हो रहा दवाईयों का परीक्षण

Small cities of india becoming favourite destination for clinical trials
दिल्‍ली। कानूनी प्रावधान और जागरूकता की कमी का फायदा उठाते हुए बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत के छोटे और मध्यम शहरों को क्लिनिकल परीक्षण के केंद्र के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं ताकि किसी अप्रिय स्थिति में मुआवजे से आसानी से बच सकें। स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, एक दवा कंपनी ने नयी औषधि रेफाक्सिमिन का परीक्षण कोटा और जयपुर में किया। एक अन्य कंपनी ने दवा डोक्सोटीलीन का परीक्षण हैदराबाद और औरंगाबाद में किया। इसी प्रकार, रेमोसेट्रान का परीक्षण बैतूल, भोपाल और इंदौर (मध्यप्रदेश) तथा बडोदरा (गुजरात) में किया गया जबकि इटोडोलैक और पैरासिटामोल के मिश्रण युक्त दवा का परीक्षण नागपुर और पुणे में किया गया। समिति ने जांच के दौरान पाया कि डाइक्लोफेन एवं सेरैटोपेप्टीडेज के मिश्रण युक्त दवा को पूरी दुनिया में केवल भारत में मंजूर किया गया और इसका अधिकांश परीक्षण पुणे में किया गया।

समिति ने कहा, क्लिनिकल परीक्षण के लिए देश में जिन 164 स्थानों को मंजूरी दी गई है, उनमें गुवाहाटी ही ऐसा स्थान है जहां पर्याप्त संख्या में मंगोल मूल के मरीज पाये जाते हैं। स्थायी समिति के सदस्य डा. संजय जायसवाल ने भाषा से कहा कि दुनिया के विभिन्न देशों में दवाओं के प्रभावों का आकलन करने और उसकी उपयोगिता की समय समय पर समीक्षा के लिए पारदर्शी तंत्र बनाया गया है। लेकिन भारत में इसका सख्त अभाव है। उन्होंने कहा कि बड़ी बड़ी दवा कंपनियां भारत के छोटे शहरों में रहने वाले लोगों को निशाना बना रही है। लोगों को पता ही नहीं होता कि उनके साथ क्या हो रहा है। काफी संख्या में लोगों की मौत हो रही है और जो क्लिनिकल परीक्षण मैं बच जाते उनमें से अनेक जिंदगी भर के लिए लाचार हो जाते हैं। लोगों में जागरूकता और जानकारी का सख्त अभाव है।

जायसवाल ने कहा कि सरकार के स्तर पर क्लिनिकल परीक्षण के संदर्भ में कुछ दिशानिर्देश बनाए गए हैं लेकिन कोई ऐसा व्यवस्थित तंत्र नहीं है जिससे इन बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों पर लगाम लगाया जा सके। उन्होंने कहा कि भारत में औषधियों से जुडे मामलों पर चर्चा और दस्तावेजों को गोपनीय और लोगों की पहुंच से दूर रखा जाता है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के महासचिव डा. डीए राय ने कहा कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत के छोटे शहरों में क्लिनिकल परीक्षण कर रही हैं। ऐसे परीक्षणों का स्वरूप अनियमित और गैर प्रतिनिधित्व वाला है जिससे विभिन्न जातीय समुदाय के लोगों पर इन दवाओं के प्रभाव के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाती।

राज्यसभा में मई में पेश संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है कि देश के कई छोटे छोटे शहरों में निर्बाध रूप से औषधि परीक्षण किये जा रहे हैं जहां विविध जातीय मूल के लोग नहीं रहते। विशेषग्यों का कहना है कि जिन दवाओं का परीक्षण भारतीय..आर्य प्रजाति के लोगों पर किया जाता है, वह दवा मंगोल मूल या द्रविड़ मूल के लोगों पर कारगर हो.. यह जरूरी नहीं है। दवा कंपनियांे ने छोटे शहरों को किस प्रकार औषधि परीक्षण का केंद्र बनाया है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि वैश्विक दवा कंपनी इली लिली के भारत के विभिन्न क्षेत्रों के 40 अस्पतालों में क्लिनिकल परीक्षण किये जा रहे हैंं । इसी प्रकार फाइजर ने पूर्वोत्तर के छह शहरों को क्लिनिकल परीक्षण के लिए चुना है।

स्विस दवा कंपनी रोचे भारत के कई शहरों में फेफडे के कैंसर से जुड़ी दवाओं का परीक्षण कर रही है। सिरो क्लिनफार्म देश के कई अस्पतालों में क्लिनिकल परीक्षण कर रही है। बेंगलूर स्थित क्लिनजीन इंटरनेशनल भारत के पांच शहरों में परीक्षण कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, नयी दवाओं की क्षमता का पता लगाने के लिए मनुष्यों पर अब तक 1,76,641 क्लिनिकल ट्रायल हुए हैं । इनमें से 2,770 परीक्षण भारत में हुए हैं जो दुनिया में हुए कुल औषध परीक्षण का 1.5 प्रतिशत है। पिछले चार वर्ष के दौरान क्लिनिकल परीक्षण में 2,031 लोगों की मौत हो चुकी है।

भारत में डब्ल्यूएचओ के एक अधिकारी ने कहा कि सभी विकासशील देशों में क्लिनिकल परीक्षण के लिए आचार समिति बनायी गई है। संगठन इन देशों के साथ मिलकर प्रयास कर रहा है कि आचार समिति प्रभावी ढंग से काम करे। हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि आचार समिति स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से काम करें और किसी के हितों का पोषण करने का जरिया नहीं बने। एक संसदीय समिति का मानना है कि, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1945 के अनुच्छेद वाई में संशोधन के बाद संबंधित प्रावधानों को उदार बनाये जाने के कारण ही भारत में बड़ी संख्या में क्लिनिकल परीक्षण किया जाना संभव हो रहा है।

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