माफ कीजिये अंबिका जी आपने फिर गलती की है

उनके घावों पर नमक और भी ज्यादा तब पड़ गया, जब मोदी का जापान सरकार ने गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। उन्हें एक कैबिनेट मंत्री की तरह दर्जा दिया गया, जो अपने आप में एक उदाहरण है कि अंतर्राष्ट्रीय पटल पर मोदी को कैसे देखा जाता है।
स्वयंभू उदारपंथी इस वाक्ये से काफी नाखुश थे और देखते ही देखते विरोधियों ने अपनी बंदूक निकाल ली। इस बार शब्दों की गोलियां चलाने वाली कोई और नहीं बल्कि मंत्री अंबिका सोनी थीं।
श्रीमती अंबिका सोनी ने मीडिया से कहा, "वे गुजरात के विकास के लिये तमाम अनुबंधों पर प्रयास कर विजय प्राप्त कर सकते हैं, वो उनका काम भी है, लेकिन बाकी राज्यों के लिये नहीं कर सकते।"
सच पूछिए तो ये बातें केंद्रीय मंत्री के खराब स्वाद को दर्शाती हैं और इसमें कुछ नया नहीं है। करीब एक महीने पहले, यही अंबिका सोनी थीं, जिन्होंने अहमदाबाद में पत्रकारों से कहा था कि गुजरात के 80 फीसदी बच्चे कुपोषण से गुजर रहे हैं।
अब अगर मनेरसर में मारुति प्लांट में चल रहे विवाद की बात करें तो कांग्रेस साशित हरियाणा में हालात अब तक की सबसे खराब स्थिति में पहुंच चुके हैं। लेकिन हमेशा की तरह अंबिका सोनी इस बार भी भूल कर बैठीं। उन्होंने कहा कि अंजान मंत्री के मुकाबले मोदी ज्यादा स्मार्ट हैं।
जिस समय अंबिका सोनी इस तरह के बयान दे रही थीं, तब मोदी टोक्यो में निवेश सेमिनार में विदेशी मीडिया से मुखातिब हो रहे थे। उनसे वहां पर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी से संबंधित तमाम सवाल पूछे गये तो उन्होंने जवाब देने से इंकार कर दिया। लेकिन जब उनसे मनेसर प्लांट के विवाद के बारे में सवाल किया गया, तो मोदी ने जवाब दिया, "ऐसा दुनिया में कहीं भी नहीं होना चाहिये, न भारत में या न हरियाणा या गुजरात में। मुद्दा यह नहीं है कि घटना कहां हुई। इंसान की सुरक्षा सर्वोपरि है और मैं सोचता हूं कि हमें उनके बारे में सोचना चाहिये जिन्होंने अपनी जान गवा दी, लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि हरियाणा सरकार इस मामले को संभालने और सुलझाने में सक्षम है।"
विदेशी जमीन पर मोदी गुजरात के सीईओ की तरह नहीं बोले, बल्कि एक नेता की तरह जो भारत के लिये बोलता है, एक नेता जो दूसरों की कमजोरी पर खुश नहीं होता, एक नेता जो अपने पूरे देश को चमकते देखना चाहता है। अंबिका सोनी इसके पूर्णत: विपरीत हैं। उनके बयानों से न केवल उनके झूठ उजागर होते हैं, बल्कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में सुरक्षा के अभाव का अहसास दिलाते हैं।
उसी साक्षात्कार के दौरान मोदी ने खुद पया कि गुजरात की सफलतायें विकास की राजनीति को बयां कर रही हैं। जिसे देख कांग्रेस समय-समय पर परेशान हो उठती है।
फिर क्या हुआ
अंबिका सोनी अपने स्वर्ण शब्दों को फिर से दोहराना चाहेंगी, मोदी के लिये नहीं, बल्कि विदेश मंत्रालय में अपने ही सहयोगियों के लिये। 24 जुलाई की सुबह यानी 24 घंटे के भीतर ही सोनी गलत साबित हुईं, जब चीन में भारतीय राजदूत एक प्रदर्शनी का उद्घाटन करने पहुंचे, जिसमें भारत की दुर्दशा का वर्णन किया गया है।
यहां पर एक सवाल जहन में आता है- सोनी के 'राज्य से पहले राष्ट्र' के सिद्धांत का क्या हुआ? क्या उनकी खुद की सरकार अपना राजदूत भेजते समय भटक गई? क्या महत्वपूर्ण भारतीय दूतावासों पर राजदूतों को सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाने के बारे में दिशा-निर्देश नहीं दिये गये हैं? या उन्हें जानबूझ कर वहां भेजा गया? यूपीए की इन नीतियों के बारे में हम क्या कहें?
कई सवाल हैं, जिनके जवाब सोनी और उनके साथी दे सकते हैं, लेकिन तब तक उस खुशी का स्वागत करें, जो मोदी गुजरात लेकर आ रहे हैं और जापान में उनकी शासन कला को देखें।
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