नितिन गडकरी, येदियुरप्‍पा से नाराज हैं आडवाणी

LK Advani
दिल्ली (ब्यूरो)। आंतरिक कलह से जूझ रही भाजपा को उबारने के लिए नितिन गडकरी लाख कोशिश कर रहे हैं पर उन्हीं की पार्टी के शीर्ष नेता उनके साथ नहीं हैं। एक तरफ पार्टी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज जहां संजय जोशी के इस्तीफे के कारण नाराज हैं वहीं लालकृष्ण आडवाणी भी उनसे कम खफा नहीं है।

बताया जा रहा है कि खुलेआम कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा की आलोचना के बाद वह एक साथ मंच पर नहीं दिखना चाहते थे। यही कारण हैं कि दोनों नेताओं ने रैली में जाने से मना कर दिया। हालांकि बहाना दोनों ने ही व्यस्तताओं का लिया है। पर हकीकत है कि एक नरेंद्र मोदी की तुष्टिकरण से नाराज है तो दूसरा येद्दयुरप्पा को तवज्जों दिए जाने से।

सूत्र बता रहे हैं कि वैसे भी संजय जोशी को मुंबई रास नहीं आती। इसी मुंबई में उन्हें एक सीडी प्रकरण के कारण छह साल पहले वनवास झेलना पड़ा था। पर उन्हें गुरुवार को एक बार फिर कार्यकारिणी से बाहर कर दिया गया।

यही नहीं दोनों बार जोशी का टकराव पार्टी के ऐसे बड़े नेताओं के साथ हुआ जो उस वक्त भाजपा में अगली पंक्ति के नेता थे। 2005 में सीडी प्रकरण के वक्त वरिष्ठ नेता और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी के दबाव में जोशी को बाहर का रास्ता दिखाया गया था तो गुरुवार को मोदी का हठ जोशी के रास्ते में आ गया।

मजेदार यह है कि इस वक्त मोदी पार्टी के उन गिने-चुने नेताओं में शुमार हैं, जिनकी प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी पर चर्चाएं होती रहती हैं। बहुत सामान्य सी बात है, लेकिन यह भी तथ्य है कि दोनों बार जोशी का पाला गुजरात के धुरंधरों से पड़ा है, जबकि खुद जोशी लंबे समय तक गुजरात में आरएसएस के विश्वस्त रहे हैं।

वैसे भी आडवाणी के रैली में नहीं होने पर भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने सफाई भी दी है। उन्होंने कहा कि आडवाणी का कार्यक्रम पहले से तय था, इसलिए वे रैली में नहीं जा रहे जबकि सुषमा स्वराज को शनिवार सुबह गाजियाबाद में एक कार्यक्रम में शामिल होना है, इसलिए वे भी रैली में शामिल नहीं हो पाएंगी। पर हकीकत इन तर्कों से अलग है।

लालकृष्ण आडवाणी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के पहले ही दिन उस वक्त भी मौजूद नहीं थे जब पार्टी के संविधान में गडकरी को दूसरी बार अध्यक्ष बनाने से संबंधित संशोधन किया गया था। पार्टी की रणनीति तय करने में लालकृष्ण आडवाणी हमेशा से अहम भूमिका निभाते रहे हैं और ये शायद पहला मौका होगा जब वे पार्टी की कार्यकारिणी के बाद होने वाली रैली में शामिल नहीं होंगे।

उसी प्रकार सुषमा स्वराज भी कार्यकारिणी में शामिल तो हुईं पर जानबूझकर वह भी वहां से निकलने में अपनी भलाई समझीं नहीं तो मुंबई से दिल्ली आने में कुछ ढाई घंटे लगते हैं और गाजियाबाद में भी उन्हें कोई शपथग्रहण समारोह में भाग नहीं लेना था जिसके कारण वे कार्यकारिणी की बैठक को छोड़तीं।

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