एक साल तक गांवों में सेवा करने के बाद मिलेगी MBBS की डिग्री

एमबीबीएस के पाठ्यक्रम में इस प्रस्ताव को शामिल किए जाने के बाद मेडिकल के छात्रों को साढ़े चार साल की पढ़ाई पूरी करने तथा अस्पताल में इंटर्नशिप करने के बाद एक साल का समय गांवों में काम करते हुए बिताना होगा। इसके बाद ही उन्हें एमबीबीएस की डिग्री मिलेगी। गांवों में पदस्थापना के दौरान छात्र की एमबीबीएस की डिग्री प्रॉवीजनल होगी। भारतीय चिकित्सा परिषद के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के अध्यक्ष के के तलवार ने बताया कि डॉक्टरों के लिए एक साल की अनिवार्य ग्रामीण पदस्थापना जल्द ही होगी और इस संबंध में तौर तरीकों पर काम किया जा रहा है।
तलवार ने कहा हम इस पर काम कर रहे हैं। इस संबंध में एक व्यवस्था तैयार की जा रही है। एक विशेषज्ञ समिति इस पर विचार कर रही है और वह जल्द ही अपनी बैठक में तौर तरीके सुझाएगी। इसके बाद मंजूरी के लिए विस्तृत दस्तावेज स्वास्थ्य मंत्रालय के पास भेज दिए जाएंगे। सूत्रों ने बताया कि सरकार एमबीबीएस की एक साल की इंटर्नशिप के दौरान तीन माह की ग्रामीण पदस्थापना को अनिवार्य करने पर काम कर रही है और इसे एनआरएचएम के साथ जोड़ कर एक साल के रूरल हाउस जॉब का हिस्सा बनाया जाएगा।
तलवार ने कहा कि ग्रामीण पदस्थापना को एक साल के लिए अनिवार्य करने से नए डॉक्टरों को वरिष्ठ डॉक्टरों से सीखने का मौका मिलेगा। ग्रामीण इलाकों में वरिष्ठ डॉक्टरों की भूमिका परामर्शदाता की होगी। उन्होंने बताया कि एक साल की अवधि के दौरान एमबीबीएस के स्नातकों को ग्रामीण अस्पतालों से तथा समीपवर्ती मेडिकल कॉलेज से संबद्ध किया जाएगा। इस अवधि के दौरान उन्हें उनकी सेवाओं के लिए एनआरएचएम से वजीफा (स्टाइपेंड) भी दिया जाएगा। इस प्रस्ताव को उचित बताते हुए आजाद ने कहा कि विकसित देशों में डॉक्टर बनने तथा नुस्खे लिखने की अनुमति हासिल करने के लिए करीब सात साल या अधिक समय लगता है जबकि भारत में एमबीबीएस पाठ्यक्रम की अवधि अपेक्षाकृत कम है।












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