सत्ता के गलियारे में कब तक महिला बनेगी भोग की वस्तु?
यहां तो हर चुनाव में औरतों को प्रयोग किया जाता है। सोचिये यह सोच है उस आम जनता की, जिनके वोट पर हमारे देश के नेता सत्ता सीन होते हैं। अपने घर काम करने वाली महिला की बातों ने मेरी रूह को कंपकपा दिया और यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वाकई समाज कहां पहुंच गया है?
हमारे सियासी मंत्रियों में से कितने मंत्री पाक-साफ हैं। कर्नाटक के तीनो मंत्रियों को तो कैमरे की तीसरी आंख ने पकड़ लिया लेकिन ना जाने ऐसे कितने लोग हमारे चारों ओर गंदी निगाहें लेकर घूमते हैं। लेकिन रसूखदारों और सत्ता के चलते उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता है।
चुनावी माहौल है, अचार संहिता लागू है लेकिन बावजूद इसके पुलिस को गाड़ियों से शराब के जखीरे बरामद हो रहे हैं। चुनावी रैलियों में जमकर बार बालाएं डांस कर रही हैं, कभी हल्ला मच जाता है तो प्रशासन का शिकंजा कस जाता है और जब मीडिया की नजरों से ऐसी चीजें बच जाती है तो प्रशासन भी ढ़ीला पड़ जाता है।
सोचने वाली बात है कि आखिर इन चीजों की जरूरत पड़ती क्यों हैं? सत्ता के नशे में लोग शराब और शबाब का प्रयोग आखिर करते क्यों हैं? जबकि इन्हीं रसूखदारों के घोषणापत्रों में महिलाओं और नारियों के लिए बहन शब्द का प्रयोग किया जाता है। लेकिन जब यही रसूखदार मंच पर तथाकथित बहनों को अश्वील कपड़ो में नचवाते हैं तो कहां जाती है इनकी गैरत? क्या इसके पीछे उनकी गंदी सोच है या फिर लोगों ने मान लिया है कि नारी का प्रयोग केवल परोसने के लिए ही होता है।
आखिर कर्नाटक के तीनों मंत्री किसी महिला को ही तो अपनी फिल्म में देख रहे थे, जिसको देखने के लिए वो इतने लालायित हो गये कि उन्हें ये भी होश नहीं रहा कि वो लोकतंत्र के उस मंदिर में बैठे हैं जहां की धरती को लोग मां कहते हैं, उनसे घर तक जाने का भी सब्र नहीं हुआ। यह तो ताज़ा उदाहरण है।
हाल ही में भंवरी देवी केस, जिसमें राजस्थान के मंत्री महिलपाल मदेरणा का केस भी इसी सीरीज का एक भाग है, इस मामले में भंवरी भोग की वस्तु बनी और जब मंत्री के द्वार खतरे की घंटी बोली, तो उसे मौत दे दी गई। इससे पहले यूपी का शशि हत्याकांड, जिसमें पूर्व मंत्री आनंद सेन और मधुमिता हत्याकांड के मुख्य आरोपी अमरमणि त्रिपाठी की भी ऐसी ही कहानी रही। इन सभी मामलों में महिला को एक वस्तु की तरह इस्तेमाल किया गया और मौका निकलने पर उसे कुचल दिया गया।
सौ टके का सवाल यह है कि आखिर कब तक हमारा देश उन रसूखदारों के बल पर, जो कि अपनी बहू-बेटियों को तो आंचल की चादर में ढ़क कर रखते हैं, लेकिन दूसरों की बेटियों को भरे बाजार में या मंत्रियों के अंधेरे कमरे में भेजने से नहीं चूकते हैं, के बल पर चलता रहेगा।













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