• search
क्विक अलर्ट के लिए
अभी सब्सक्राइव करें  
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts

लाठी के बल पर कुचले जाते हैं मानवाधिकार

By Ajay Mohan
|

Lathicharge
डा. आलोक चांटिया

10 दिसंबर को हम सब मिलकर दिन भर मानवाधिकार दिवस का गीत गायेंगे। दुनिया भर में कार्यक्रम होंगे, जिनके माध्‍मय से मानवाधिकार का पाठ पढ़ाया जायेगा। सच पूछिए तो शब्‍द 'मानवाधिकार' महज सेमिनार, संगोष्ठियों और विश्‍वविद्यालयों या कॉलेजों में होने कार्यक्रमों तक सीमित रह जाता है। आम आदमी को इसकी परिभाषा तक नहीं पता। हम बात कर रहे हैं उन भारतीयों की जिन्‍हें अगर मानवाधिकार की असली भाषा पता होती, तो वो विकास नहीं करने वाले विधायक या सांसद को दोबारा वोट न देते, अगर पता होती तो उन्‍हें मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने में बाधा बनने वाले अधिकारियों के खिलाफ डंट कर खड़े हो जाते और अपने हक की लड़ाई के लिए वो सत्‍ता तक हिला देते।

हम यहां मानवाधिकार की परिभाषा नहीं बतायेंगे, हम सिर्फ उन बातों को उठायेंगे जहां मानवाधिकारों का हनन होता है। और हम उनसे जुड़े सवालों को उठायेंगे।

भारत, जहां 70 प्रतिशत जनता आज भी गाँव में बिजली का मतलब ढूंढ़ रही है। पीने का साफ़ पानी नही है, जिसके कारण हजारो बच्चे डायरिया का शिकार हो रहे हैं। जहां गरिमा पूर्ण जीवन कि तलाश में कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वहां अधिकार की बात करने कौन आगे आयेगा?

सरकार के लिए यही काफी है कि उसने देश नियम, कानूनों का ढेर लगा दिया है, पर क्या सिर्फ नियम से किसी के घर कभी दिया जला है? क्या कोई पढ़ लिख पाया है? ऐसे में गरिमा को चौराहों पर बेच कर बच्चे पढ़ने कि उम्र में होटलों और ढाबों में काम करने को मजबूर हैं। छाती में दूध कि कमी हो जाने के कारण माँ अपने बच्चे को चाय या गरम पानी पिला कर इस देश कि अस्मिता को बचा रही है। क्‍या सरकार वास्‍तव में बाल मजदूरी रोक पायी है? और इसे रोकने के लिए क्‍या जनता ने कभी सरकार का साथ दिया।

गरीबी की हालत यह है कि जननी सुरक्षा योजना के नाम प्रसव कि संख्या बढाई जा रही हैं, पर कोई नहीं जानना चाहता कि प्रसव और अस्पताल के बाद उस औरत का क्या हुआ? देश कि सरकार कितनी चिंतनशील है, यह इसी बात से पता चल जाता है कि उसका मनना है कि शहर में रहने वाला 32 रुपये और गाँव में रहने वाल 26 रुपये में खर्चा रोज चला सकता है। यह बात और है कि नेता को खुद का भत्ता कम लगता है। क्योंकि वो अलग तरह के आदमी हैं और उनकी गरिमा कि परिभाषा भी अलग है।

संविधान में हम भारत के लोगों का मतलब कौन से हम से है? यह भी बताने वाल कोई नही। घरेलु हिंसा अधिनियम बना दिया गया पर औरत को ना जल्दी न्याय मिल रहा है और एक बार शिकायत करने के बाद उसकी हालत सुसराल में और भी ख़राब हो जाती है। उस पर से पुलिस का तुर्रा यह कि आप कहती है सुसराल वाले बदमाश हैं पर वो तो शरीफ लगते हैं। यानि औरत को शोषण करते रहना चाहिए पर अपनी अस्मिता और गरिमा के लिए नही बोलना चाहिए।

परिवार नयायालय में जज महोदय ही नदारत हैं। यकीन ना हो तो लखनऊ के परिवार न्‍यायालय चले जाइये। महिला आयोग औरतो को सिर्फ तलाक कि सलाह देता है और अपराधियों को शरीफ बताता है। यानि औरत भोग करने योग्‍य थी, है और वही बनी रहे ताकि औरत की समस्या ही ना उठे और सरकार कहे कि देखिये कि हमारे देश में औरत की समस्या ही नही है।

शादी, दहेज़ की समस्या नहीं हो इसलिए सरकार, कोर्ट लिविंग रिलेशन को बढ़ावा दे रही है। औरत अब पूरी तरह उपभोग की तरफ बढाई जा रही है और दुनिया को यह दिकाया जा रहा है महिला सशकित्करण हो रहा है। आज जिस तरह से जन लोकपाल का विरोध किया जा रहा है उस से यह तो सिद्ध होता है कि देश में पूर्ण रूप से जनता के मानवाधिकार सुरक्षित रखने के लिए सरकार तैयार ही नही है। देश के युवा, गरीब किसान या अन्‍य कमजोर लोग जब अपने हक की लड़ाई के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तो उन्‍हें लाठियों से कुचल दिया जाता है।

भ्रष्‍टाचार ने जिस तरह देश में मुंह फैलाया है, उससे यह साबित है कि अंधेर नगरी चौपाट राजा। इन सबसे ऊपर देश में हम किसी जाति के हो सकते है, पार्टी के हो सकते है, पर हम लोग भारतीय नही हो सकते। यही कारण है कि आज तक हम भारत वासी हैं, भारतीय नही। यह अधिकार हम कब पाएंगे? अगर ईमानदारी के साथ मानवाधिकारों की बात करनी है, तो उससे पहले हमें हमें अपने बच्‍चों को यह पाठ पढ़ाना होगा कि वे पहले भारतीय बनें। फिर हर गली मोहल्ले में मानवाधिकार कि चर्चा करके इस देश में लोकतंत्र कि स्थापना कीजिये, ताकि जनता को उसकी गरिमा मिल सके।

लेखक परिचय- डा. आलोक चांटिया अखिल भारतीय मानवाधिकार संगठन के अध्‍यक्ष हैं। साथ ही आप लखनऊ के श्री जयनारायण पीजी कॉलेज के रीडर एवं इंदिरा गांधी मुक्‍त विश्विविद्यालय के कांसिलर। http://airo.weebly.com/

देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
On the occasion of World Human Rights Day, people will organize various programs to teach many things. Here are some questions against Government, where Human Rights are being violated.
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X