राजनीति उलटफेर में बढ़ती जा रही छोटे दलों की सक्रियता

सबसे पहले हम बात करेंगे राजा बुंदेला की जिन्होंने पृथक बुंदेलखंड की मांग के मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बुंदेलखण्ड कांग्रेस पार्टी का गठन किया है। राजा बुंदेला इस अंचल की 37 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने का एलान कर चुके हैं। बुंदेला कहते हैं कि अब तक सभी पार्टियों ने बुंदेलखण्ड से वोट लेकर उसके साथ छल किया है। इस बार क्षेत्र के मतदाता ऐसे दलों को सबक सिखाएंगे, क्योंकि इस दफा उनके पास बुंदेलखण्ड कांग्रेस के रूप में अच्छा विकल्प है।
वहीं दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) को पूर्वांचल में डाक्टर अयूब की (पीस पार्टी) के अलावा (कौमी एकता दल) और (उलमा काउंसिल) से चुनौती मिल रही है और यह तीनों दल खासतौर से मुस्लिम वोटों में सेंधमारी की कोशिश में हैं। दलित वोटों पर अपना एकाधिकार मानकर चल रही बसपा को उदितराज की( इंडियन जस्टिस पार्टी) से टक्कर मिलने की सम्भावना नजर आ रही है। उदितराज बसपा प्रमुख मुख्यमंत्री मायावती से नाराज दलितों को एकजुट करने में जुटे हैं। साथ ही बहुजन लोकपाल का मुद्दा उठाकर वह पढ़े-लिखे दलितों को भी जोड़ने के प्रयास में हैं।अगर उनकी कोशिश रंग लाई तो बसपा को दलित वोटरों को लेकर अपनी सोच पर दोबारा गौर करना पड़ सकता है।
पीस पार्टी ने राष्टीय लोकदल समेत कई छोटे दलों के साथ गठबंधन किया है लेकिन यह दल अभी सियासी नफे-नुकसान को देखते हुए स्वतंत्र पार्टी की तरह ही काम कर रहा है। उदितराज कहते हैं कि दलितों को मायावती से बड़ी उम्मीदें थीं लेकिन प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के बाद भी मायावती ने उनकी दशा सुधारने के लिये कोई काम नहीं किया बल्कि उन्होंने सिर्फ कुछ वर्गौ का ही भला किया। हम बसपा शासन में उपेक्षित हुए दलितों को एकजुट कर रहे हैं और आगामी चुनाव में दलितों पर एकाधिकार की मायावती की गलतफहमी दूर कर देंगे।
हालांकि बाहुबली निर्दलीय विधायक अखिलेश सिंह और बसपा के निलम्बित विधायक जितेन्द्र सिंह बबलू जैसे आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों को अपने खेमे में जगह देने के कारण पीस पार्टी की आलोचना हो रही है लेकिन वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने वाली इस पार्टी पर सबकी नजर टिकी है। अब देखना यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव में यह दल दूसरी पार्टियों को कितना नफा-नुकसान पहुंचा पाता है।
भाजपा के लिए कभी उनके ही तेजतर्रार सिपहसालार और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सरपरस्ती वाली जनक्रांति पार्टी सिरदर्द बनी हुई है, जो कि उनके सीधे-सीधे लोध वोट बैक को चोट पहुंचाने की स्थिति में है। भाजपा ने वैसे तो कल्याण की पकड़ को कमजोर करने और लोध जाति पर उनके प्रभुत्व को कम करने के लिए इसी बिरादरी से ताल्लुक रखने वाली मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को प्रदेश चुनाव की कमान सौंपी जरुर है लेकिन वह कल्याण सिंह की धार को कितना भोथरा कर पाती हैं। इसका पता तो चुनाव बाद ही लग पायेगा।












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