हिसार में सत्तारूढ़ दल को पहली बार मिली इनती शर्मनाक हार

हरियाणा के अस्तित्व में आने के बाद प्रदेश में लोकसभा के 7 उपचुनाव हुए हैं। इनमें से 6 उपचुनावों में सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशी विजयी रहे हैं लेकिन हिसार उपचुनाव में सत्तारूढ़ दल के जयप्रकाश को न केवल करारी हार झेलनी पड़ी है बल्कि वे अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। पूर्व के रिकॉर्ड पर नजर डाली जाए तो वर्ष 1978 में करनाल लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव में जनता पार्टी के महेन्द्र सिंह लाठर विजयी रहे थे और उन्होंने कांग्रेस के चिरंजीलाल शर्मा को 18 हजार 379 के अंतर से हराया था।
वर्ष 1987 में हुए रोहतक उपचुनाव में लोकदल के हरद्वारी लाल ने कांग्रेस के शेरसिंह को एक लाख, 2 हजार 504 मतों से, वर्ष 1987 में ही हुए भिवानी लोकसभा उपचुनाव में लोकदल के रामनारायण सिंह ने कांग्रेस के दयानंद को 89 हजार 352 मतों से शिकस्त दी। इसी तरह वर्ष 1988 में फरीदाबाद उपचुनाव हुआ जिसमें लोकदल के खुर्शीद अहमद विजयी हुए और उन्होंने कांग्रेस के जेपी नागर को एक लाख, 1 हजार 883 मतों से पराजित किया।
वर्ष 1988 में ही हुए सिरसा लोकसभा का उपचुनाव हुआ, जिसमें लोकदल के हेतराम विजयी रहे और उन्होंने कांग्रेस की कुमारी शैलजा को एक लाख, 15 हजार 344 वोटों पराजित किया। वर्ष 2005 में हुए रोहतक लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस के दीपेन्द्र सिंह हुड्डा ने भाजपा के कैप्टन अभिमन्यु को 2 लाख 31 हजार 958 वोटों से पराजित करके चुनाव जीता। उपरोक्त आंकड़ों से स्पष्ट है कि वर्ष 1978 से 2005 तक प्रदेश में हुए 6 लोकसभा के उपचुनाव सत्तारूढ़ दलों ने ही जीते हैं लेकिन वर्ष 2011 में हुआ हिसार लोकसभा उपचुनाव में सत्तारूढ़ दल कांग्रेस की जो किरकिरी हुई है, वह किसी चुनाव में नहीं हुई। कांग्रेस के जयप्रकाश पहले ऐसे प्रत्याशी बन गए हैं जो सत्तारूढ़ दल का होने के बावजूद न केवल चुनाव हारे हैं बल्कि अपनी जमानत भी गवां बैठे। प्रदेश के गठबंधन के बाद यह पहला मामला है।
कांग्रेस ने लगाया था ऐड़ी चोटी का जोर
हालांकि कांग्रेस नेता इस बात से इंकार कर रहे हैं कि हिसार उपचुनाव कांग्रेस सरकार पर कोई खास फर्क डालेगा लेकिन इन नतीजों ने केंद्र व प्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के लिए खतरा पैदा कर दिया है। यह हार इस मायने में अहम है कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और जीत के लिए पूरी सरकार ने जोर लगा रखा था। सबसे बड़ी बात तो यह है कि कांग्रेस प्रत्याशी ने एक भी हलके में बढ़त हासिल नहीं की है। सभी हलकों में कुलदीप व अजय सिंह के बीच टक्कर रही है।
यदि देखा जाए तो उचाना कलां राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता बीरेंद्र सिंह, उकलाना से कुमारी शैलजा, भिवानीखेड़ा से किरण चौधरी, हिसार शहर से सावित्री एवं नवीन जिंदल, हांसी से विनोद भ्याणा कद्दावर नेता कांग्रेस में शामिल है, इसके बावजूद उनके हलकों में कांगे्रस को करारी मात मिली है जो आने वाले समय में कांग्रेस के लिए बड़ा खतरा है।
इस बात में कोई दोराय नहीं है कि इस उपचुनाव का असर आने वाले लोकसभा व विधानसभा चुनाव में होगा। राजनीति के जानकार अभी से कहने लगे हैं कि कांग्रेस के लिए भविष्य अंधकारमय हो गया है। खतरे की बात तो यह है कि इस उपचुनाव में कांग्रेस को वर्ष 2009 की तुलना में 54754 वोट कम मिले हैं। उस चुनाव में जयप्रकाश को 204539 वोट मिले थे। इसके पीछे मुख्यकारण कांग्रेस के गैरजाट मतदाताओं का कुलदीप बिश्रोई के पक्ष में जाना है। वर्ष 2009 के चुनाव में इनेलो के कुछ जाट मतदाता कांग्रेस के पक्ष में चले गए थे मगर इस बार ऐसा नहीं हुआ। इसी कारण कांग्रेस का वोट बैंक कम हुआ है जो किसी भी सूरत में कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं है। यदि जल्द ही कांग्रेस ने अपनी नीतियों में सुधार तथा आपस की गुटबाजी पर काबू नहीं किया तो आने वाला समय कांग्रेस की सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा।
2009 के लोकसभा चुनाव का ब्यौरा
वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में हिसार संसदीय सीट पर 38 उम्मीदवारों ने अपना भाग्य आजमाया था। उस चुनाव में हजकां की ओर से स्व. भजन लाल तथा इनेलो की ओर से प्रो. संपत सिंह में कड़ा मुकाबला देखने को मिला था। कांग्रेस की टिकट पर जयप्रकाश ने चुनाव लड़ा था जिसमें उनकी भारी मतों से हार हुई थी।
2009 के चुनाव में 11 लाख 92 हजार 630 मतदाताओं में से 8 लाख 28 हजार 461 लोगों ने मतदान किया था। स्व. भजन लाल को 2,48476 तथा संपत सिंह को 2,41493 मत तथा जयप्रकाश को 2,04539 मत मिले थे। इस तरह से भजन लाल से संपत सिंह को 6983 मतों से हार का सामना करना पड़ा था। चुनाव के कुछ समय बाद संपत सिंह ने इनेलो को अलविदा कर दिया था, जबकि भजन लाल का जून माह में निधन हो गया था। इस उपचुनाव में भजन लाल के स्थान पर उनके पुत्र कुलदीप ने चुनाव लड़ा तो इनेलो की ओर से अजय सिंह मैदान में उतरे थे। कांग्रेस ने एक बार फिर से जेपी पर दांव लगाया था।
गठबंधन : आम चुनाव में हारा-उपचुनाव में जीता
हरियाणा की राजनीति में जहां गठबंधन की भूमिका अहम रही है वहीं गठबंधन पार्टियों के चुनाव परिणाम भी समय-समय पर बदलते रहे हैं। वर्ष 2009 में भारतीय जनता पार्टी का समझौता इनेलो के साथ था और हजकां ने अकेले चुनाव लड़ा था। अकेले चुनाव लडऩे के बावजूद हरियाणा जनहित कांग्रेस के प्रत्याशी एवं पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल जहां हिसार का गढ़ फतह करने में कामयाब हो गए थे वहीं गठबंधन के बावजूद प्रो. संपत सिंह मामूली अंतर से चुनाव हार गए।
इस हार के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी व इंडियन नेशनल लोकदल का मिलन टूट गया। इसके बाद हुआ विधानसभा चुनाव सभी पार्टियों ने अपने-अपने बूते पर लड़ा जिसमें इनेलो को 32, हजकां को 6 तथा भाजपा को 4 सीटें मिली तथा 40 सीटें जीतने वाली कांग्रेस एक बार फिर निर्दलियों व अन्य दलबदलुओं के सहारे सत्तारूढ़ हो गई। चौ. भजनलाल के निधन के बाद खाली हुई हिसार लोकसभा सीट पर चुनाव घोषित होते ही हजकां व भाजपा का मिलन हो गया। हालांकि इनेलो ने इस गठबंधन के बाद भाजपा व हजकां को पानी पी-पी कर कोसा लेकिन इस चुनाव में इस गठबंधन ने बाजी मार ली। इस प्रकार पिछले चुनाव में जहां गठबंधन हार गया वहीं इस चुनाव में गठबंधन ने बाजी मार ली।
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