चाक चौबंद व्यवस्था के बावजूद मुरादाबाद में क्यों हुआ दंगा?
उस समय अगर वह ठीक समय से दायित्व का निर्वाह करते तो शायद मेरठ में संप्रदायिक चिंगारी नहीं भड़कती। यह बात हम नहीं कह रहे बल्कि मेरठ के दो आला अधिकारी और खुफिया विभाग के अधिकारियों द्वारा पेश की गई रिपोर्ट भी कह रही है। उस समय
मेरठ में जो कुछ भी हुआ उसमें हिंसा का ट्रेंड दो साल पूर्व यानि की (16 जून 2009) की तरह ही था। क्षेत्र जरूर बदला पर जिन स्थानों पर हिंसा का तांडव हुआ था, वहां हर जगह कुछ खास चेहरे ही नजर आये। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि मेरठ में उपद्रव सुनियोजित नहीं था।
ऐसा ही कुछ मुरादाबाद में भी हुआ। बीते रविवार को तनाव होने की पूरी आशंका थी और उससे निपटने के लिये इंतजाम भी प्रयाप्त थे। फिर भी दो पक्ष आमने-सामने आ गए। पथराव, आगजनी, फायरिंग सब कुछ हुआ। कारण सरकारी नेटवर्क लड़खड़ा गया। इस दंगे के बाद एक बारगी मैनाठेर (मुरादाबाद का एक इलाका) जैसे हालात नजर आने लगे। एकाएक बदली सरकारी रणनीति से रविवार को तो हालात काबू में कर लिया गया।
मगर उससे सबक न लेने पर मंगलवार जैसा भयानक दंगा सामने आया। आपको बताते चलें कि एक माह पूर्व मुरादाबाद के मैनाठेर इलाके में एक माह पहले पुलिस व ग्रामीणों के बीच संघर्ष हो गया था। इसमें पुलिस को बैकफुट पर आना पड़ा था। इस फजीहत से पुलिस व बड़े प्रशासनिक अधिकारियों को भी जिले से रुखसत होना पड़ा था।
कई अधिकारियों व कर्मचारियों पर कार्रवाई की तलवार अभी लटकी हुई है। मैनाठेर कांड के बाद बदली अफसरशाही के सामने सावन के सोमवार को शांतिपूर्व जलाभिषेक कराना किसी चुनौती से कम नहीं था। शिवतेरस के साथ तीन सोमवार शांतिपूर्वक गुजर जाने के बाद अंतिम सोमवार को शिवभक्तों की भारी भीड़ जुटने की संभावना थी। दस सराय क्षेत्र भी संवेदनशील क्षेत्रों में चिन्हित किया गया था।
इस क्षेत्र के अधिकांश शिवभक्तों के रविवार को ही लौटने की संभावना थी। इसी के तहत सुबह से निगाह रखी जा रही थी। शाम को माहौल गर्माने से अधिकारी भारी फोर्स के साथ सक्रिय भी हो गए लेकिन किसी को बवाल होने की आशंका नहीं थी। इसी कारण मान-मनुहार के लिए भी फोर्स का इंतजाम किया गया। यह ही लापरवाही बबाल का कारण बन गई। दो पक्षों के आमने-सामने आने से एक बार पुलिस के खिलाफ मैनाठेर जैसे हालात पैदा हो गए।
एक पक्ष द्वारा पुलिस पर पथराव भी किया गया। इसी के साथ पुलिस का नेटवर्क भी छिन्न-भिन्न हो गया। हालात बेकाबू होते देख अधिकारियों के हाथ-पैर भी फूलने लगे। उन्होंने एकाएक सक्रियता बढ़ाई। धर्मगुरुओं ने भी लोगों को समझाना शुरू किया। तब जाकर हालात काबू में आ सके। मगर पुलिस अपने मजबूत तंत्र को ज्यादा समय तक कायम नहीं रख सकी और इतिहास गवाह है कि जब-जब 'लोक उग्र' हुआ है और 'तंत्र सुस्त' हुआ है परिणाम हमेशा एक दंगे के रूप में ही सामने आया है।













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