कसाब को फांसी नहीं दे पाया मम्‍मू जल्‍लाद

लखनऊ। उसकी आंखों में सपना था कि वह संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरू व अजमल कसाब को फांसी के फंदे पर लटकाए, लेकिन लचर कानूनी प्रक्रिया व राजनेतओं की अढ़ंगेबाजी से उसका सपना अधूरा रह गया। मेरठ की तंग गलियों में रहने वाला देश का एकमात्र मशहूर जल्लाद मम्‍मू सिंह दुनिया से रूखसत हो गया। मम्‍मू वही जल्लाद था, जिसने देश की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के हत्यारों को फांसी के फंदे पर लटकाया था।

दमा रोग से पीडित 65 वर्षीय मम्‍मू जल्लाद ने अंतिम सांस लेने से पूर्व कहा कि उसका आखिरी सपना पूरा न हो पाया। मुंबई हमले के आरोपी कसाब को जब फांसी की सजा सुनाई गई थी तो देश के एक मात्र जल्लाद ने सरकार से इच्छा जतायी था कि वह संसद भवन पर हमले के आरोपी अफजल गुर और कसाब के गले में फांसी का फंदा डाले। अफजल और कसाब अभी तक अपनी मौत का इंतजार कर रहे हैं। दोनों को फांसी देने का सपना लिए म मू तो दुनिया से चला गया और उसके साथ चली गयीं ढेरों यादें।

मेरठ के ट्रान्सपोर्ट नगर की नई बस्ती की तंग गलियों में अपने परिवार के साथ रहने वाले मम्‍मू जल्लाद के परिवार में छह बेटे व तीन बेटियों समेत लगभग ढाई दर्जन नाती पोते हैं। मम्‍मू जल्लाद के बड़े बेटे पवन उर्फ सिधी ने बताया कि उसके पिता पिछले डेढ़ साल से दमा रोग से पीडि़त थे। उसने बताया कि म मू खानदानी जल्लाद था। म मू के दादा लक्ष्मण मंजीरा अंग्रेजों के जमाने के जल्लाद थे उनके बाद मम्‍मू के पिता कल्लू जल्लाद ने काम संभाला।

कल्लू के मरने के बाद म मू ने उनकी जि मेदारी संभाली। दाताराम से कामता प्रसाद तक मम्‍मू जल्लाद ने अपने जीवन में 15 अपराधियों को फांसी पर चढ़ाया। मम्‍मू ने वर्ष 1973 में बुलंदशहर के रहने वाले दाताराम को सबसे पहले मेरठ जेल में फांसी दी थी। इसी वर्ष उसे तिहाड़ जेल मेघशातिर अपराधी रंगा और बिल्ला को फांसी पर लटकाने के लिए बुलाया गया था। जबलपुर, दिल्ली, और पंजाब में फांसी पर अपराधियों को लटका चुके म मू ने आखिरी बार वर्ष 1997 में जयपुर में कामता प्रसाद तिवारी को फांसी दी थी।

इतना ही नहीं मम्‍मू जल्लाद ने अपने पिता के साथ मिलकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारों को भी फांसी पर लटकाया था। पवन ने बताया कि उसके पिता को विदेशों से भी फांसी देने के लिये बुलाया गया था। लेकिन पासपोर्ट न होने के कारण वे विदेश नहीं जा सके। उन्होंने कहा कि म मू जल्लाद को तीन हजार रुपये बतौर वेतन सरकार की ओर मिलता था परन्तु गत चार माह से उन्हें वेतन नहीं दिया जा रहा था। पवन को इस बात का दुख है कि पैसा की कमीं होने के कारण म मू जल्लाद आखिरी सांस तक गरीबी से लड़ते रहे।

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