परिवारों का राष्ट्रीयकरण और पानी का निजीकरण करें

एस. गुरुमूर्ति

नई दिल्ली, 6 फरवरी (आईएएनएस)। परिवारों को 'समाज की मात्र मूल इकाई नहीं' कहा जा सकता। परिवार तो सर्वोत्तम हैं। वे हमारे समाज की क्षमताओं और कमजोरियों का मौलिक स्रोत हैं। जो भी सामाजिक समस्या हमारे सामने आती है, उसको पारिवारिक अस्थिरता के संदर्भ में देखा जाता है, अत: परिवार 'महत्वपूर्ण' होते हैं और इसीलिए उन्हें 'अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था' माना जाता है।

इन शब्दों के साथ तीन सप्ताह पहले ब्रिटेन में कंजर्वेटिव पार्टी के नेता डेविड केमरॉन ने अपने देश के बारे में बड़े ही दु:खद विचार व्यक्त किए, जहां पितृहीन, यहां तक कि मातृहीन होते जा रहे, यानी पिताओं और माताओं द्वारा त्यागे जा रहे बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। केमरॉन ने एक नीति-निर्धारक समूह सेंटर फॉर सोशल जस्टिस के अध्यक्ष आइन डंकन स्मिथ से ब्रिटिश सरकार की सामाजिक सुरक्षा संबंधी नीतियों का अध्ययन करने के लिए कहा था।

डंकन स्मिथ ने एक माह पहले एक अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में उन्होंने उल्लेख किया कि ब्रिटिश परिवार किस प्रकार टूट रहे हैं और विवाह किए बिना सहवास कितना आम होता जा रहा है, और यह भी कि इस तरह की स्थिति कैसे सरकार पर एक सामाजिक सुरक्षा रूपी बोझ बनती जा रही है। इस रिपोर्ट को बड़ा ही उपयुक्त शीर्षक दिया गया है - 'ब्रेकडाउन ब्रिटेन'। ब्रिटेन में 'पिता द्वारा छोड़े गए' परिवारों और 'पितृहीन' तथा 'मातृहीन' बच्चों देखभाल पर होनेवाले व्यय 20 बिलियन डॉलर (रुपए में 90,000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष) की पूर्ति सरकार द्वरा की जाती है।

यह राशि भारत सरकार की कुल आय का लगभग 20 प्रतिशत है। स्मिथ का कहना है कि आधे से अधिक सहवासी दंपती अपने बच्चों का पांचवां जन्मदिन मनाने से पहले ही एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं, लेकिन विधिवत् विवाह से उत्पन्न बच्चे के पांचवें जन्मदिन से पूर्व अलग हो जाने की दर बारह विवाहों में एक है। विवाह के बिना साथ रहनेवालों द्वारा भले ही इसे पुरानी पंरपरा कहकर इसका मजाक उड़ाया जाए, फिर भी विवाह की परंपरा आशा का दीप जलाए हुए है।

टूटे हुए एकल माता या पिता वाले परिवारों से आने वाले बच्चों की गुणवत्ता के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि किसी बच्चे का लालन-पालन माता और पिता दोनों के साथ एक परिवार में नहीं हुआ है तो उस बच्चे को नशीली दवाओं की लत पड़ने की आशंका 70 प्रतिशत अधिक बढ़ जाती है, इसी तरह शराब सम्बंधी समस्याओं में घिर जाने की आशंका अन्य बच्चों की तुलना में 50 प्रतिशत ज्यादा, कर्जा न चुका पाने की संभावना 40 प्रतिशत ज्यादा रहती है और बेरोजगारी की संभावना 35 प्रतिशत ज्यादा रहती है।

स्मिथ का कहना है, 'राजनीतिक बहस में ईमानदारी का मौलिक अभाव है।' राजनीतिक वर्ग ने 'समस्या की पहचान' कर ली है, लेकिन 'इस समस्या का जो कारण है - परिवारों का टूटना-उस पर चर्चा करने से इनकार कर दिया है।' स्मिथ आगे कहते हैं, 'यदि हम गरीबी और सामाजिक भार के कारणों का हल निकालने के बारे में गंभीर हैं, तब हमें परिवारों की सहायता करने और विवाहों को भी समर्थन देने के उपायों पर नजर डालनी होगी, ताकि दंपत्तियों, पति-पत्नी को मिल-बैठने और साथ-साथ रहने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।'

स्मिथ के अनुसार हर नीति के लिए आसान सी परीक्षा यह होती है, 'क्या यह परिवारों की मदद करती है?' वह परंपरागत पारिवारिक मूल्यों और भरण-पोषण योग्य अर्थशास्त्र के बीच एक सीधा संबंध रखते हैं। यह एक आर्थिक प्रश्न है, जो राजनीति शास्त्र को यंत्रणा देता है, लेकिन राजनीति शास्त्र के पास इसका कोई निदान नहीं है।

स्मिथ और केमरॉन परिवारों को परंपरागत सांचे में ढालने के लिए अपनी मौन स्वीकृति देते हैं, लेकिन इस बात को खुलकर कहने से डरते हैं। ऐसे परिवार सदियों से हर जगह मौजूद रहे थे, लेकिन पिछले दस-बीस वर्षो में ये परिवार ब्रिटेन में और सामान्यत: पश्चिम में टूटने लगे। यह कैसे हुआ? क्योंकि अत्याधिक व्यक्तिगत अधिकार-केंद्रित जीवन को 'आधुनिकता' के रूप में महिमामंडित किया जाता है।

यहां पुरुषों के अपने अधिकार होते हैं, महिलाओं के अपने अधिकार हैं, इसी तरह वरिष्ठ लोगों और बच्चों के भी अपने-अपने अधिकार होते हैं, लेकिन सामूहिक रूप से सभी का प्रतिनिधित्व करनेवाले परिवार का कोई अधिकार नहीं होता और न ही समाज का कोई अधिकार है।

आधुनिक पाश्चात्य संविधानवाद में, पुरुष और स्त्री का अलग-अलग व्यक्तिगत अस्तित्व है, लेकिन परिवार और समाज का नहीं है। किंतु जब राज्य अधिकार प्रदान करता है, तब इने-गिने लोग ही यह महसूस करते हैं कि अधिकारों की कीमत परिवार और समाज को चुकानी पड़ती है। परिवार जब अपनी वैधता खो बैठते हैं और उसके कारण कमजोर हो जाते हैं तो राज्य उन परिवारों के निजी कार्यो को संभालने के लिए बाध्य हो जाता है। इस तरह परिवारों का राष्ट्रीयकरण हो जाता है और उनके कार्य सरकार के विभागीय मामले बन जाते हैं, जबकि यह एक निजी मामला होता है।

विडंबना यह है कि पश्चिम में वही देश अपने सभी सरकारी कार्यो, अर्थात जल आपूर्ति, सड़क निर्माण, नगरपालिका सेवाओं और अन्य जन-सुविधाओं आदि का निजीकरण कर रहा है तथा दूसरों को भी वैसा ही करने के लिए कह रहा है। इसी का परिणाम है कि पश्चिम में अर्थशास्त्र उलटा हो गया है और सरि के बल खड़ा है, क्योंकि वहां निजी परिवारों का राष्ट्रीयकरण और सरकारी कार्यो का निजीकरण किया जा रहा है। पश्चिम में बाजार अर्थशास्त्र का यही मूलभुत सिद्धांत है। यह व्यक्तियों को परिवारों की कीमत पर, खपत को बचत की कीमत पर और अंतत: वर्तमान को भविष्य की कीमत पर बढ़ावा देता है।

वैश्वीकरण के अभिन्न अंग के रूप में पश्चिम के इस विकृत अर्थशास्त्र को यहां भारत में बेचा जा रहा है, जहां परिवार उस बोझ को वहन करना अपनी जिम्मेदारी और निजी मामला समझते हैं, जिसे पश्चिमी देश सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत अपने ऊपर ले लेते हैं। क्या हमारे अर्थशास्त्री, बुद्धिजीवी और प्रचार-माध्यम अपनी स्थिति पर पुन: विचार करेंगे, जिससे कि भारत को ब्रिटेन और शेष विश्व की तरह पीछे की ओर न धकेला जा सके?

(प्रभात प्रकाशन प्रा. लि., दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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