एफडीआई के लिए बंद करें रोना

नई दिल्ली, 30 जनवरी (आईएएनएस)। हमारे अर्थशास्त्रियों तथा नीति निर्माताओं को विदेशी निवेश की उत्कट चाहत या सनक न पहले थी और न अब है। यह सनक हीनभावना से जुड़ी होती है। हम चीन के सामने अपने आपको छोटा समझते हैं, क्योंकि हमें चीन की तुलना में बहुत कम विदेशी निवेश प्राप्त होता है।

नीति निर्माता और मंत्रीगण ही नहीं, आर्थिक स्तंभ लेखक और संपादक भी यह सोचकर लज्जित होते हैं कि निवेश के रूप में हमें उतने डॉलर और यूरो नहीं मिल रहे हैं जितने चीनियों को मिलते हैं। इस सोच ने एक तरह से राष्ट्रीय शोक, अखंड सोच की शक्ल अख्तियार कर ली है।

लगभग एक साल पहले तक हमारे नीति निर्माताओं ने अर्थशास्त्र को अंकगणित जितना छोटा कर दिया और दावे के साथ कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में आठ प्रतिशत की वृद्धि हासिल करने के लिए हमें जी.डी.पी. के 32 प्रतिशत के बराबर निवेश करते की जरूरत होगी। चूंकि हमारी बचत दर 24 प्रतिशत है-उस समय यही थी-हमें राष्ट्रीय बचत और निवेश के बीच की खाई को पाटने कि लिए बाकी का प्रबंध विदेशी निवेश के रूप में करना होगा, ताकि अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हो सके।

एक प्रभावशाली विशेषज्ञ ने तो यहां तक कह दिया कि 8 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करने के लिए हमें हर वर्ष 10 बिलियन डॉलर का निवेश लाना होगा लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था ने ऐसे विशेषज्ञ सूत्रों को बार-बार असत्य प्रमाणित कर दिया।

वर्ष 2003-2004 में हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में 8.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। लेकिन एफ.डी.आई. विशेषज्ञों के अनुसार इस वृद्धि के लिए आवश्यक राशि का एक तिहाई था। यह 4 अरब डॉलर से भी कम था। फिर भी विदेशी निवेश के लिए हमारे विशेषज्ञों का रोना बंद नहीं हुआ है। संपादकीय लिखने वाले अभी भी इस बात को लेकर राष्ट्र को हीन भावना से पीड़ित करते आ रहे हैं कि वेदेशी निवेशकों को आकृष्ट करने में चीन हमसे आगे है।

एक रोचक खुलासा। सन् 2003-2004 में, राष्टीय बचत 24 प्रतिशत नहीं थी, जैसा कि हमें बताया गया था, बल्कि 28 प्रतिशत से भी अधिक थी। उसके पहले के वर्ष, यानी 2002-2003 में भी यह 26 प्रतिशत के ऊपर रही थी। तब तक के राष्ट्रीय इतिहास में दर्ज 25 प्रतिशत की उच्चतम बचत का रिकार्ड सन् 1995-96 के नाम है। इससे पता चलता है कि जैसे-जैसे आमदनी बढ़ी, भारतीयों ने अधिक बचत करना शुरू कर दिया, उससे भी ज्यादा जितनी पहले कभी नहीं की थी। बचत का यह हाल तब था जब सारे प्रयासों का जोर उनको अधिक खर्चीला बनाने पर लगा हुआ था।

अत: डॉ. जगदीश भगवती का वह सिद्धांत यहां काम नहीं कर पाया, जो उन्होंने सन् 1993 में भारत सरकार को अपनी लिखत सलाह में प्रस्तुत किया था कि भारतीय व्यर्थ बचत करते हैं और उन्हें खर्च करने के लिए राजी किया जाना चाहिए। डॉ. भगवती ने भारतीय महिलाओं को बहुत ही कम खर्चीला पाया और उस समय के वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को सलीह दी कि महिलाओं का तड़क भड़क वाला विदेशी माल, सौंदर्य प्रसाधन व अन्य वस्तुएं दिखाई जाएं, ताकि वे खर्च करने की आदत डालें, बेकार बचत करना छोड़ें।

लेकिन घर संभालने वाली चतुर भारतीय महिलाओं ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों से संबंधित सभी आकर्षक विज्ञापनों और सुरीले गानों का आनंद तो उठाया, पर अपनी जरूरत से ज्यादा चीजें खरीदने से इंकार कर दिया। भारत के लोग इसी तरह बचत करते हैं। उनकी आय बढ़े तो उनकी बचत भी ज्यादा होती है। वे खर्च करते हैं, लेकिन बचत हमेशा उनके व्यय से अधिक होती है। इसका कारण यह भी है कि वे अपनी वृद्धावस्था और कठिन समय की लिए बचाकर रखते हैं। वे सरकारी दान पर निर्भर नहीं रहते। इसके विपरीत पश्चिम मे बचत के लिए प्रेरित करने वाली कोई बात नहीं होती, क्योंकि उनके बुरे दिनों और बुढ़ापे में सरकार उनकी देखभाल करती है।

भारत सरकार इस मामले में भाग्यवान है कि भारत की जनता अपनी देखभाल खुद करती है और वृद्धावस्था में यहां के लोग सरकार का दरवाजा नहीं खटखटाते। यही कारण है कि भारतीय लोग बचत करते हैं और इसी कारण से उन्हें बचत करते देना चाहिए। डॉ. भगवती यद्यपि भारतीय मूल के हैं, लेकिन उनकी सलाह अमेरिका में उनके अनुभवों पर आधारित है।

यहां भी हम भारतीयों ने बचत सम्बंधी सभी आर्थिक नियमों को खारिज कर दिया है। आर्थिक नियम कहते हैं कि यदि ब्याज दर अधिक हो तो लोग अधिक बचत करते हैं और ब्याज की दर कम होने पर वे कम खर्च करते हैं। पिछले दो सालों में बचत खाते, बैंक जमा अर्थात मियादह जमा पर लागू दरों पर नजर डालें। पांच वर्षो में व्याज दरें लगभग आधी हो गई हैं। लेकिन इसके बावजूद बचतों मे वृद्धि हुई है, जो अर्थशास्त्रियों की इस धारणा को झुठलाती हैं कि ब्याज दर घटने पर बचत घट जाती है और खर्च में बढ़ोतरी होती है।

अत: उन जापानियों की तरह, जो बचत पर कोई ब्याज न मिलने पर भी नियमित रूप से बचत करते हैं, भारतीय भी बचत करने के आदी हैं। बचत कैसे की जाती है यह उनको सिखाने की जरूरत नहीं। सरकार को ऐसी जनता का शुक्रगुजार होना चाहिए और यदि सरकार को निवेश करने के लिए अधिक धन की आवश्यकता है तो उसे लोगों को बचत करने के लिए प्रेरित करना चाहिए, न कि खर्च करने की लिए।

लेकिन इसके बजाय सरकार लोगों को खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करने और विदेशी निवेश हेतु याचना की नीति पर चलना चाहती है, ताकि राष्ट्रीय बचत और अभीष्ट बचत का लक्ष्य पाने के लिए आवश्यक निवेश के बीच की खाई को पाटा जा सके। क्या आप जानना चाहते हैं यदि हमें राष्ट्रीय विकास के लिए विदेशी टेक्नोलोजी और आयातित मशीनें चाहिए तो राष्ट्रीय बचत को डॉलरों में कैसे बदलना चाहिए? इसका उत्तर आसान है।

हम नहीं जानते कि हमें निष्क्रिय विदेशी मुद्रा भंडार का क्या करना है। भारतीय व्यापारियों को विदेशी टेक्नोंलोजी लाने तथा नवीनतम मशीने आयातित करने की अनुमति दें, जिससे कि वे उद्योग स्थापित कर सकें और विदेशी मुद्रा का फलोत्पादक रूप से उपयोग हो सके। जब हमारे पास विदेशी मुद्रा का विपुल भंडार है और राष्ट्रीय बचत बहुत अधिक है, तब हमें विदेशी निवेश के लिए रोने-धोने की क्या आवश्यकता है? यह तो ऐसा ही है, जैसे रोटी बनाने के लिए आटे की लोई हाथ में होते हुए भी रोटी के लिए चीख पुकार करना। इसके अलावा हम अपनी बचतों का पूरा पूरा उपयोग निवेश के लिए नहीं कर पाए हैं।

सन् 2003-4 में हमारा राष्ट्रीय निवेश 26.3 प्रतिशत था जबकि बचत 28.1 प्रतिशत थी। इसका मतलब यह है कि हम की गई बचत का पूरा निवेश नहीं कर सके। फिर भी हम भारत में चीन के मुकाबले विदेशी निवेश की कमी पर आंसू बहाते रहते हैं। अत: अब समय आ गया है कि हमें विदेशी निवेश के लिए रोना-धोना बंद कर देना चाहिए। यदि आ जाता है तो ठीक है और यदि नहीं आता तो हमें रोने की कोई जरूरत नहीं। क्या हम विदेशी निवेश के लिए सनकी होना बंद करेंगे? क्या हमारे विशेषज्ञ यह सब सुन रहे हैं?

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार है। प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित उनकी पुस्तक 'समय भारत के सूर्योदय का' से साभार)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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