वेदांता विश्वविद्यालय की यथास्थिति बनाए रखने का आदेश (लीड-1)
नई दिल्ली, 28 जनवरी (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को वेदांता विश्वविद्यालय के लिए अधिग्रहीत भूमि या अधिग्रहीत की जाने वाली भूमि की प्रकृति, चरित्र और कब्जे की यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। अदालत के इस आदेश के कारण उड़ीसा के पुरी में वेदांता विश्वविद्यालय परियोजना का काम फिलहाल रुका रहेगा।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी.के.जैन और न्यायमूर्ति एच.एल.दत्तू की पीठ ने 15,000 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले वेदांता विश्वविद्यालय के लिए अधिग्रहीत भूमि या अधिग्रहीत की जाने वाली भूमि की यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। अदालत ने इस मामले की जल्द सुनवाई का निर्देश दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश, उड़ीसा सरकार और इस परियोजना से जुड़ी संस्था अनिल अग्रवाल फाउंडेशन की ओर से उड़ीसा उच्च न्यायालय द्वारा 16 नवम्बर, 2010 को दिए गए फैसले को चुनौती दिए जाने के बाद दिया है। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में परियोजना के लिए किए गए भूमि अधिग्रहण को 17 मामलों में दोषपूर्ण ठहराया था।
वेदांता विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए उड़ीसा सरकार और अनिल अग्रवाल फाउंडेशन के बीच 16 जुलाई, 2006 को सहमति बनी थी।
उड़ीसा सरकार की ओर से अदालत में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. वेणुगोपाल ने कहा कि वेदांता विश्वविद्यालय राज्य के लिए एक बड़ी परियोजना है, जिसे पूरी करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अनिल दीवान ने कहा कि निर्माता कम्पनी का नाम कम्पनियों के रजिस्ट्रार की वेबसाइट पर पब्लिक लिमिटेड कम्पनी के रूप में सूची में दर्ज है, जबकि उड़ीसा उच्च न्यायालय इसके साथ प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी की तरह व्यवहार कर रहा है।
उत्तरदायियों की ओर से मौजूद वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने उड़ीसा सरकार और अनिल अग्रवाल फाउंडेशन की याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह भूमि हड़पने का एक प्रयास है।
उल्लेखनीय है कि उड़ीसा उच्च न्यायालय ने भूमि अधिग्रहण को अवैध बताते हुए इस पर रोक लगा दी थी और सरकार एवं वेदांता विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया था कि अधिग्रहीत भूमि, मूल भू-स्वामियों को लौटा दी जाए।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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